अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥ 1:16 ॥
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शब्दार्थ
अनन्तविजयम् — अनन्त विजय नामक शंख
राजा कुन्तीपुत्रः युधिष्ठिरः — कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर
नकुलः सहदेवः च — नकुल और सहदेव दोनों भाई
सुघोष-मणिपुष्पकौ — सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख
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अनुवाद (सरल हिन्दी में)
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक शंख बजाया।
उनके भाई नकुल ने सुघोष और सहदेव ने मणिपुष्पक नामक शंख बजाए।
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व्याख्या
यह श्लोक कुरुक्षेत्र युद्धभूमि में शंखनाद का वर्णन कर रहा है।
युधिष्ठिर, जो धर्मराज कहलाते थे, ने अनन्तविजय शंख बजाया। "अनन्तविजय" का अर्थ है असीम विजय – यह उनके सत्य, धर्म और न्यायप्रिय स्वभाव का प्रतीक है।
नकुल और सहदेव, जो सहदेव कुंती और माद्री के पुत्र थे, उन्होंने क्रमशः सुघोष और मणिपुष्पक नाम के शंख बजाए।
सुघोष = मधुर, सुरीली ध्वनि वाला।
मणिपुष्पक = मणियों की तरह चमकता और पुष्प की तरह सुगंधमय।
👉 यहाँ शंखनाद का उद्देश्य केवल युद्ध की घोषणा करना ही नहीं है, बल्कि यह आध्यात्मिक प्रतीक भी है।
शंख बजाना एक प्रकार से दैवीय ऊर्जा को जगाना और धर्म की स्थापना के लिए संकल्प करना है।
प्रत्येक योद्धा का शंख उनके व्यक्तित्व और गुणों को भी दर्शाता है।
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भावार्थ
इस श्लोक से यह संदेश मिलता है कि धर्म की रक्षा के लिए जब कोई युद्ध करता है, तो उसकी विजय असीम (अनन्त) होती है। साथ ही, शंखध्वनि आंतरिक जागरण और साहस का प्रतीक है।
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