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Sunday, October 5, 2025

भगवद् गीता अध्याय 1 श्लोक 35

भगवद् गीता अध्याय 1 श्लोक 35


एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥

                                  गीता 1:35

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हिन्दी अर्थ:
हे मधुसूदन (कृष्ण)! मैं इन अपने संबंधियों को मारना नहीं चाहता, भले ही वे मुझे मार डालें। तीनों लोकों के राज्य के लिए भी मैं इन्हें नहीं मारना चाहता, तो फिर इस पृथ्वी के राज्य के लिए तो और भी नहीं।


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विस्तृत व्याख्या:
इस श्लोक में अर्जुन की करुणा और मोह स्पष्ट झलकती है। वह देखता है कि युद्ध में उसे अपने ही गुरु, बंधु, और मित्रों का वध करना होगा। इसलिए उसका हृदय द्रवित हो जाता है।

वह भगवान श्रीकृष्ण से कहता है —
"हे मधुसूदन! चाहे वे मुझे युद्ध में मार डालें, पर मैं उन्हें मारने की इच्छा नहीं रखता। अगर मुझे तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) का भी राज्य क्यों न मिल जाए, तब भी मैं अपने ही संबंधियों को मारकर यह राज्य प्राप्त नहीं करना चाहता।"

अर्जुन के इस कथन से यह पता चलता है कि उसका मन धर्म और कर्तव्य से भटक चुका है। वह अपने क्षत्रिय धर्म को भूलकर मोह और दया में डूब गया है। जबकि युद्ध धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए था, अर्जुन केवल अपने परिवारजनों के प्रति मोहवश निर्णय नहीं ले पा रहा था।


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भावार्थ:
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के मोह और करुणा के भाव को सुनते हैं, ताकि आगे वे उसे ज्ञान देकर उसके भ्रम को दूर करें। यहाँ अर्जुन बताता है कि उसे किसी भी मूल्य पर अपने संबंधियों का वध स्वीकार नहीं है — चाहे स्वर्ग मिले या पृथ्वी का राज्य।


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संक्षेप में:
अर्जुन का हृदय करुणा से भर गया है। वह कहता है — “हे कृष्ण! मैं अपने प्रियजनों को नहीं मार सकता, भले ही मुझे तीनों लोकों का राज्य मिल जाए।”

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