उत्तर: गीता 3:29 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो लोग प्रकृति के गुणों में आसक्त रहते हैं, वे उन्हीं गुणों से उत्पन्न कर्मों में फँस जाते हैं। ज्ञानी व्यक्ति को ऐसे अज्ञानियों की बुद्धि को विचलित नहीं करना चाहिए।
हम जानते हैं कि क्या सही है, फिर भी गलत में क्यों उलझ जाते हैं?
कई बार मन समझता है, फिर भी आदतें हमें वही पुराने रास्ते पर खींच ले जाती हैं।
भगवद्गीता 3:29 इसी मनोवैज्ञानिक जाल को उजागर करती है।
भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग
इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है।
गीता 3:29 – गुणों में फँसा मन और कर्म का भ्रम
गीता 3:28 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि ज्ञानी व्यक्ति कर्म को साक्षी भाव से देखता है।
गीता 3:29 उसके विपरीत स्थिति दिखाती है — जब मन गुणों में फँस जाता है, तो व्यक्ति कर्म के रहस्य को नहीं समझ पाता।
📜 भगवद्गीता 3:29 – मूल संस्कृत श्लोक
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥
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| अज्ञान में फँसे लोगों को तोड़ना नहीं, समझदारी से मार्ग दिखाना ही ज्ञान है |
📖 गीता 3:29 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद
अर्जुन:
हे श्रीकृष्ण,
यदि गुण ही कर्म करते हैं,
तो फिर मनुष्य
बंधन में क्यों पड़ जाता है?
श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन,
प्रकृति के गुणों से मोहित अज्ञानी
गुणों में ही
आसक्त हो जाते हैं।
श्रीकृष्ण:
परंतु जो तत्व को जानने वाले ज्ञानी हैं,
उन्हें चाहिए कि
ऐसे अज्ञानियों को विचलित न करें।
अर्जुन:
तो हे माधव,
ज्ञानी का कर्तव्य क्या है?
श्रीकृष्ण:
ज्ञानी को चाहिए कि
करुणा और धैर्य के साथ
स्वयं सही आचरण करके
अन्यों का मार्गदर्शन करे।
⚠️ अज्ञान = गुणों में आसक्ति 🌿 ज्ञान = करुणा के साथ मार्गदर्शन
👉 ज्ञानी टकराव नहीं करता, वह उदाहरण बनकर दिशा देता है।
🔍 श्लोक का भावार्थ (सरल भाषा में)
श्रीकृष्ण कहते हैं — जो लोग प्रकृति के गुणों से मोहित हो जाते हैं, वे गुणों से उत्पन्न कर्मों में आसक्त हो जाते हैं।
जो सम्पूर्ण सत्य को नहीं जानते, ऐसे लोगों को ज्ञानी को विचलित नहीं करना चाहिए।
🧠 “गुणसम्मूढ” होने का अर्थ
गुणसम्मूढ वह व्यक्ति है —
- जो इच्छा, भय और आलस्य से संचालित होता है
- जो कर्म को ही सब कुछ मान लेता है
- जो भीतर की चेतना से कट जाता है
ऐसा व्यक्ति कर्म करता है, लेकिन समझ के बिना।
⚖️ क्यों अज्ञानी कर्म में फँस जाता है?
क्योंकि उसका ध्यान इन पर होता है:
- क्या मिलेगा?
- क्या खोऊँगा?
- लोग क्या कहेंगे?
गीता 3:29 बताती है कि जब तक मन गुणों के स्तर पर है, वह कर्म से ऊपर नहीं उठ पाता।
🌍 आधुनिक जीवन में गीता 3:29
आज हम जानते हैं कि अत्यधिक तनाव नुकसानदायक है,
फिर भी हम उसी दौड़ में फँसे रहते हैं।
यह गुणों की पकड़ है — ज्ञान होते हुए भी मुक्ति न होना।
गीता 3:29 इसी द्वंद्व को समझाती है।
👤 एक वास्तविक जीवन उदाहरण
एक व्यक्ति जानता है कि अधिक काम उसके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
फिर भी वह लालच और भय के कारण रुक नहीं पाता।
यह अज्ञान नहीं, गुणों की गिरफ्त है।
यही गीता 3:29 का यथार्थ है।
🧠 श्रीकृष्ण का करुणा संदेश
श्रीकृष्ण यहाँ कठोर नहीं हैं।
वे कहते हैं कि जो अभी नहीं समझ पा रहे, उन्हें झकझोरना नहीं चाहिए।
ज्ञान जब समय से पहले दिया जाता है, तो वह भ्रम पैदा करता है।
इसलिए ज्ञानी को धैर्य और करुणा रखनी चाहिए।
✨ गीता 3:29 का केंद्रीय संदेश
यह श्लोक सिखाता है कि हर व्यक्ति एक ही स्तर पर नहीं होता।
गुणों से ऊपर उठना समय और समझ का विषय है।
ज्ञान का सही उपयोग दूसरों को तोड़ना नहीं, समझना है।
🧭 निष्कर्ष
गीता 3:29 हमें यह सिखाती है कि कर्म का बंधन ज्ञान की कमी से नहीं, गुणों की पकड़ से होता है।
और ज्ञानी का कर्तव्य है — धैर्य रखना, मार्ग दिखाना, लेकिन मन को विचलित नहीं करना।
यही सच्चा कर्मयोग है।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न – भगवद गीता 3:29
भगवद गीता 3:29 का मुख्य संदेश क्या है?
गीता 3:29 सिखाती है कि जो लोग प्रकृति के गुणों में आसक्त होते हैं, उन्हें अज्ञानी समझकर ज्ञानी व्यक्ति को उनके कर्मों में विचलित नहीं करना चाहिए।
प्रकृति के गुणों में आसक्ति से क्या तात्पर्य है?
इसका अर्थ है इंद्रिय सुख, भोग और अहंकार से प्रेरित कर्मों में फँसे रहना।
ज्ञानी को अज्ञानियों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए?
ज्ञानी को करुणा और धैर्य के साथ व्यवहार करना चाहिए, न कि उन्हें तिरस्कार या भ्रम में डालना चाहिए।
आज के जीवन में गीता 3:29 कैसे उपयोगी है?
यह श्लोक सिखाता है कि हर व्यक्ति की समझ अलग होती है, इसलिए दूसरों को जबरदस्ती बदलने के बजाय समझदारी से मार्गदर्शन करना चाहिए।
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✍️ लेखक के बारे में
Bhagwat Geeta by Sun एक आध्यात्मिक और जीवन-दर्शन आधारित मंच है, जहाँ भगवद्गीता को मानव मनोविज्ञान, आदतों और चेतना से जोड़कर सरल भाषा में प्रस्तुत किया जाता है।
इस मंच का उद्देश्य गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि आत्मिक समझ और व्यावहारिक जीवन की मार्गदर्शिका बनाना है।
यह लेख केवल शैक्षिक, आध्यात्मिक और आत्म-विकास के उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय, कानूनी या वित्तीय सलाह नहीं है। भगवद्गीता की व्याख्या परंपराओं और दृष्टिकोणों के अनुसार भिन्न हो सकती है।
Bhagavad Gita 3:29 – Why Confusion Grows from Attachment to Action
Why do some people feel stuck and confused, even while working hard? Bhagavad Gita 3:29 explains how lack of understanding turns action into inner bondage.
Bhagavad Gita 3:29 – Shlok
Prakṛter guṇa-sammūḍhāḥ
sajjante guṇa-karmasu |
Tān akṛtsna-vido mandān
kṛtsna-vin na vicālayet ||
Explanation
In Bhagavad Gita 3:29, Lord Krishna explains why many people become mentally trapped by their work. Those who do not understand the forces of nature (guṇas) become deeply attached to actions and their results. This attachment creates confusion and emotional dependence.
Krishna points out an important distinction. The ignorant identify completely with action and believe that success or failure defines their worth. Because of this limited understanding, they cling tightly to outcomes, which leads to anxiety, jealousy, and frustration.
The verse also offers guidance to the wise. Krishna advises those with deeper understanding not to disturb or criticize people who are still attached to action. Change cannot be forced. Growth happens gradually, through experience and example.
For a modern global audience, this teaching is extremely relevant. Work culture often rewards attachment — targets, metrics, comparisons. Bhagavad Gita 3:29 explains why this leads to burnout. Without understanding the nature of action, effort turns into emotional pressure.
Real-Life Example
Consider a junior financial analyst working in a global investment firm. She ties her self-worth completely to daily performance numbers. Small losses cause stress, while gains bring temporary relief. A senior mentor helps her understand market forces, uncertainty, and long-term perspective. As attachment reduces, clarity and confidence improve. This shift reflects the teaching of Bhagavad Gita 3:29.
The verse reminds us that action itself is not the problem. Confusion arises when understanding is incomplete and attachment takes control.
Frequently Asked Questions
It explains that attachment to action, without understanding, leads to confusion and mental bondage.
Those who do not understand the forces of nature and become attached to action and results.
Not to disturb or judge others, but to allow gradual understanding to develop.
It explains stress, burnout, and emotional overinvestment in modern work culture.
Better understanding, reduced attachment, and compassionate guidance of others.

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