अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि संयम का अर्थ है — कुछ न करना। लेकिन जीवन का अनुभव बताता है कि बिना काम किए मन और भी अशांत हो जाता है।
भगवद गीता 3:7 इसी गलत धारणा को सुधारती है। यह श्लोक बताता है कि सच्चा संयम कर्म से दूर भागने में नहीं, बल्कि कर्म को सही दिशा में करने में है।
भगवद गीता 3:7 – मूल श्लोक
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन। कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥
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| मन का संयम और कर्म की शुद्धता—यही गीता 3:7 में बताए गए सच्चे योग का मार्ग है। |
📖 गीता 3:7 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद
अर्जुन:
हे श्रीकृष्ण,
यदि केवल बाहरी त्याग
मिथ्याचार है,
तो फिर सच्चा कर्मयोग
कैसा होता है?
श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन,
जो मनुष्य
मन से इंद्रियों को संयम में रखकर
कर्मेंद्रियों द्वारा
आसक्ति रहित कर्म करता है,
वही श्रेष्ठ कहलाता है।
अर्जुन:
तो क्या कर्म करते हुए भी
संयम संभव है, प्रभु?
श्रीकृष्ण:
हाँ अर्जुन।
मन का संयम रखकर
कर्तव्य कर्म करना ही
सच्चा कर्मयोग है।
🌿 मन का संयम + कर्तव्य कर्म = श्रेष्ठ कर्मयोग
👉 जो भीतर संयमित है, वही कर्म करते हुए भी मुक्त रहता है।
सरल अर्थ
हे अर्जुन! जो व्यक्ति मन के द्वारा इंद्रियों को नियंत्रित करके कर्मेंद्रियों से बिना आसक्ति के कर्मयोग का आचरण करता है, वही वास्तव में श्रेष्ठ है।
यह श्लोक क्या सिखाता है?
गीता 3:7 हमें कर्मयोग की सही परिभाषा देता है। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि संयम और कर्म एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
मन से इंद्रियों का नियंत्रण और कर्मेंद्रियों से कार्य — यही संतुलन मनुष्य को श्रेष्ठ बनाता है।
यह श्लोक बाहरी त्याग की नहीं, आंतरिक अनुशासन के साथ सक्रिय जीवन की शिक्षा देता है।
आज के जीवन में यह शिक्षा कैसे लागू होती है?
आज कई लोग सोचते हैं कि आध्यात्मिक बनने के लिए काम से दूरी बनानी होगी।
लेकिन गीता 3:7 बताती है कि काम से दूरी नहीं, काम में संतुलन आध्यात्मिकता है।
जब हम काम करते हुए भी मन को लालच, तुलना और भय से मुक्त रखते हैं, तभी कर्म शुद्ध होता है।
एक वास्तविक जीवन उदाहरण
मान लीजिए कोई व्यक्ति अपने कार्यक्षेत्र में ईमानदारी से काम करता है।
वह लक्ष्य रखता है, लेकिन हर परिणाम को अपनी पहचान से नहीं जोड़ता।
वह प्रयास करता है, पर असफलता आने पर खुद को टूटने नहीं देता।
यही व्यवहार गीता 3:7 के कर्मयोग को दर्शाता है — कर्म, पर आसक्ति नहीं।
कर्मयोग में “श्रेष्ठता” का अर्थ
श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसा व्यक्ति “विशिष्यते” — अर्थात श्रेष्ठ कहलाता है।
श्रेष्ठता यहाँ पद, धन या सम्मान से नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन से मापी जाती है।
जो व्यक्ति कर्म करते हुए अपने मन को नियंत्रित कर लेता है, वही वास्तव में स्वतंत्र होता है।
अर्जुन के लिए यह श्लोक क्यों निर्णायक था?
अर्जुन सोच रहा था कि युद्ध से दूर जाना ही संयम का मार्ग है।
श्रीकृष्ण उसे दिखा रहे हैं कि उसकी प्रकृति कर्मशील है, और उसी कर्म में रहते हुए उसे संयम और मुक्ति सीखनी होगी।
यह श्लोक अर्जुन को भागने नहीं, सही ढंग से खड़े होने की शिक्षा देता है।
निष्कर्ष: सक्रिय जीवन ही सच्चा योग है
गीता 3:7 हमें यह सिखाती है कि संयम का अर्थ निष्क्रियता नहीं है।
जब मन नियंत्रित हो और कर्म निष्काम हो, तब वही कर्म योग बन जाता है।
जो कर्म में रहते हुए मन को साध लेता है, वही सच्चा योगी है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न – गीता 3:7❓️
भगवद गीता 3:7 का मुख्य संदेश क्या है?
यह श्लोक सिखाता है कि इंद्रियों को नियंत्रित करके और आसक्ति छोड़े बिना किया गया कर्म ही सच्चा कर्मयोग है।
गीता 3:7 में श्रेष्ठ व्यक्ति किसे कहा गया है?
जो व्यक्ति मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हुए कर्तव्य करता है, वही श्रेष्ठ माना गया है।
कर्मयोग और इंद्रिय संयम का क्या संबंध है?
कर्मयोग तभी संभव है जब कर्म करते समय इंद्रियाँ नियंत्रण में हों और मन आसक्ति से मुक्त हो।
आज के जीवन में गीता 3:7 कैसे उपयोगी है?
यह श्लोक सिखाता है कि काम, परिवार और समाज की जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी आत्मसंयम और संतुलन रखा जा सकता है।
यह लेख भगवद गीता के श्लोक 3:7 की जीवनोपयोगी एवं दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। यह सामग्री केवल शैक्षिक और आध्यात्मिक उद्देश्य से है और किसी भी प्रकार की पेशेवर सलाह का विकल्प नहीं है।
Bhagavad Gita 3:7 – Selfless Action Is Better Than Inaction
What is the right way to live when desires still exist? Bhagavad Gita 3:7 provides a clear and practical answer. Lord Krishna explains that one who controls the senses with the mind and engages in action through the organs of action, without attachment, is superior and truly disciplined.
This verse directly follows Krishna’s warning against false renunciation. Here, he presents the positive alternative. Instead of suppressing action, a wise person regulates the senses internally and performs necessary duties sincerely. Action guided by self-control purifies the mind and supports inner growth.
Krishna emphasizes balance. The senses should not dominate the mind, but they also should not be forcefully suppressed. When the mind is steady, actions become purposeful rather than impulsive. Such action does not create bondage because it is free from selfish desire and ego.
This teaching is extremely relevant in daily life. People often struggle between indulgence and withdrawal. Bhagavad Gita 3:7 shows a middle path — active engagement with life, combined with inner discipline. Work, responsibility, and service become means of self-purification when performed with awareness.
The verse also clarifies the essence of Karma Yoga. True renunciation is not avoiding work, but working without inner attachment. When action is aligned with duty and self-control, it strengthens clarity, confidence, and peace. Such a person lives responsibly in the world while progressing steadily on the spiritual path.
Frequently Asked Questions
It teaches that self-controlled action is superior to inactivity or suppression.
False renunciation avoids action outwardly, while true discipline controls desire inwardly.
The mind guides and controls the senses, ensuring balanced and purposeful action.
Yes. It teaches how to work responsibly without stress, guilt, or inner conflict.
Act with discipline and awareness — this leads to clarity, balance, and inner freedom.

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