Skip to main content

Posts

Showing posts with the label श्लोक व्याख्या

यह वेबसाइट किस लिए है?

BhagwatGeetaBySun.com एक आध्यात्मिक एवं जीवन-मार्गदर्शन वेबसाइट है, जहाँ भगवद गीता के श्लोकों को सरल भाषा में समझाकर उन्हें आज के जीवन की वास्तविक समस्याओं से जोड़ा जाता है।

  • गीता के श्लोकों का व्यावहारिक अर्थ
  • तनाव, क्रोध और चिंता से मुक्ति
  • मन को शांत और स्थिर रखने की कला
  • कर्मयोग द्वारा सही निर्णय

What is BhagwatGeetaBySun.com?

BhagwatGeetaBySun.com is a spiritual and life-guidance website that explains the wisdom of the Bhagavad Gita in a simple, practical, and modern context to help people gain clarity, peace, and balance in life.

भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 44: निःस्वार्थ कर्म का रहस्य और आसान व्याख्या

भाग 1: अर्जुन–कृष्ण संवाद, श्लोक और गहरा भाव भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्। व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥ गीता 2:44 – भोग और ऐश्वर्य की इच्छा बुद्धि को स्थिर मार्ग से भटका देती है। गीता 2:44 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद रणभूमि में अर्जुन का मन सांसारिक सुख, ऐश्वर्य और भविष्य की चिंताओं से घिरा हुआ था। उसने श्रीकृष्ण से व्याकुल होकर कहा — “हे माधव, जब मन भोग और ऐश्वर्य की बातों में उलझ जाता है, तब धर्म और कर्तव्य का मार्ग स्पष्ट नहीं दिखता। ऐसे मन से स्थिर बुद्धि कैसे प्राप्त हो?” तब श्रीकृष्ण ने गंभीर और करुण स्वर में अर्जुन को समझाया — “अर्जुन, जिनका मन भोग और ऐश्वर्य में आसक्त हो जाता है, उनकी बुद्धि स्थिर नहीं रह पाती।” अर्जुन ने विनम्रता से पूछा — “प्रभु, फिर स्थिर बुद्धि का मार्ग क्या है?” श्रीकृष्ण ने स्पष्ट उत्तर दिया — “जिसका मन इंद्रिय-सुख की लालसा से मुक्त हो, वही निश्चयात्मक बुद्धि को प्राप्त करता है।” श्रीकृष्ण ने समझाया कि सुख-सुविधा और पद-प्रतिष्ठा की आसक्ति मनुष्य को लक्ष्य से भटका देत...

भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 27

भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 27 श्लोक जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥ हिंदी अनुवाद: जो जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है, और जिसकी मृत्यु हो जाती है उसका पुनर्जन्म निश्चित है। इसलिए जिस घटना को रोकना मनुष्य के बस में नहीं है, उसके लिए शोक करना उचित नहीं है। विस्तृत हिंदी व्याख्या इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को जीवन का सबसे बड़ा सत्य समझाते हैं — जन्म और मृत्यु का चक्र। 1. जन्म और मृत्यु एक प्राकृतिक नियम हैं भगवान कहते हैं कि जिस किसी का भी जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है। यह प्रकृति का अटल नियम है जिसे कोई नहीं बदल सकता। इसी प्रकार, मृत्यु होने के बाद आत्मा नया शरीर धारण करती है — यह पुनर्जन्म भी निश्चित है। 2. यह चक्र मनुष्य के नियंत्रण में नहीं है अर्जुन अपने प्रियजनों की मृत्यु की कल्पना करके दुखी हो रहा था। भगवान उसे समझाते हैं कि मृत्यु को कोई रोक नहीं सकता। जब हम किसी ऐसी चीज़ के लिए दुख करते...