भाग 1: अर्जुन–कृष्ण संवाद, श्लोक और गहरा भाव भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्। व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥ गीता 2:44 – भोग और ऐश्वर्य की इच्छा बुद्धि को स्थिर मार्ग से भटका देती है। गीता 2:44 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद रणभूमि में अर्जुन का मन सांसारिक सुख, ऐश्वर्य और भविष्य की चिंताओं से घिरा हुआ था। उसने श्रीकृष्ण से व्याकुल होकर कहा — “हे माधव, जब मन भोग और ऐश्वर्य की बातों में उलझ जाता है, तब धर्म और कर्तव्य का मार्ग स्पष्ट नहीं दिखता। ऐसे मन से स्थिर बुद्धि कैसे प्राप्त हो?” तब श्रीकृष्ण ने गंभीर और करुण स्वर में अर्जुन को समझाया — “अर्जुन, जिनका मन भोग और ऐश्वर्य में आसक्त हो जाता है, उनकी बुद्धि स्थिर नहीं रह पाती।” अर्जुन ने विनम्रता से पूछा — “प्रभु, फिर स्थिर बुद्धि का मार्ग क्या है?” श्रीकृष्ण ने स्पष्ट उत्तर दिया — “जिसका मन इंद्रिय-सुख की लालसा से मुक्त हो, वही निश्चयात्मक बुद्धि को प्राप्त करता है।” श्रीकृष्ण ने समझाया कि सुख-सुविधा और पद-प्रतिष्ठा की आसक्ति मनुष्य को लक्ष्य से भटका देत...