क्या मन की अशांति, इच्छाओं की उलझन और भावनात्मक तनाव से बाहर निकलने का कोई स्थायी मार्ग है? भगवद्गीता 2:64 में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि जो व्यक्ति राग और द्वेष से मुक्त होकर इंद्रियों पर संयम रखता है, वही सच्ची शांति और संतुलित जीवन को प्राप्त करता है। यह श्लोक आज के व्यस्त और तनावपूर्ण जीवन में मानसिक स्थिरता, आत्मसंयम और आंतरिक शांति का सरल समाधान प्रस्तुत करता है।
भगवद गीता 2:64 में श्रीकृष्ण अर्जुन को शांति का वह व्यावहारिक मार्ग बताते हैं जो न संसार छोड़ने को कहता है और न इच्छाओं के पीछे अंधा होने को। यह श्लोक सिखाता है कि जब मनुष्य राग और द्वेष से मुक्त होकर इंद्रियों का संयम करता है, तब उसके भीतर स्वाभाविक शांति उत्पन्न होती है। यह शिक्षा आज के तनावपूर्ण जीवन में पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है।
भगवद गीता 2:64 – मूल श्लोक
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्। आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥
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| गीता 2:64 सिखाती है कि राग और द्वेष से मुक्त होकर इंद्रियों को संयम में रखने से मनुष्य सच्ची शांति प्राप्त करता है। |
📖 गीता 2:64 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद
अर्जुन:
हे श्रीकृष्ण, क्या ऐसा कोई मार्ग है
जिससे मनुष्य विषयों में रहते हुए भी शांति पा सके?
श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन, जो मनुष्य
राग और द्वेष से मुक्त होकर
इंद्रियों को अपने वश में रखता है,
वह अवश्य ही शांति प्राप्त करता है।
अर्जुन:
क्या संसार के बीच रहते हुए भी यह संभव है, प्रभु?
श्रीकृष्ण:
हाँ अर्जुन।
जो आत्मसंयम के साथ विषयों का अनुभव करता है,
और न आकर्षण में बहता है, न घृणा में,
वही ईश्वर की कृपा से शांति को प्राप्त होता है।
अर्जुन:
तो हे माधव, शांति का मूल क्या है?
श्रीकृष्ण:
राग और द्वेष से ऊपर उठकर
संयमित जीवन जीना ही
सच्ची शांति का मूल है।
🌿 राग-द्वेष से मुक्ति + आत्मसंयम = शांति
👉 जो विषयों को नियंत्रित करता है, वही मन को स्थिर करता है।
सरल अर्थ
जो व्यक्ति राग (अत्यधिक आसक्ति) और द्वेष (घृणा) से मुक्त होकर, अपनी इंद्रियों को नियंत्रण में रखते हुए विषयों का अनुभव करता है, वह अंततः मानसिक शांति और प्रसन्नता प्राप्त करता है।
श्रीकृष्ण इस श्लोक में क्या समझा रहे हैं?
श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि शांति पाने के लिए संसार का त्याग आवश्यक नहीं है। समस्या विषयों में नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी हमारी मानसिक प्रतिक्रिया में होती है। जब मन किसी वस्तु को लेकर अत्यधिक आकर्षित होता है, तो राग उत्पन्न होता है। जब वही वस्तु या परिस्थिति विपरीत होती है, तो द्वेष जन्म लेता है। यही दो भाव मन को अस्थिर कर देते हैं।
गीता 2:64 का संदेश है कि यदि व्यक्ति विषयों के बीच रहते हुए भी अपने मन को संतुलित रखे, तो शांति स्वतः आती है।
आज के जीवन में गीता 2:64 का अर्थ
आज का मनुष्य लगातार तुलना, अपेक्षा और असंतोष से घिरा हुआ है। सोशल मीडिया, करियर दबाव और भविष्य की चिंता मन को कभी शांत नहीं होने देती। हम या तो किसी उपलब्धि से अत्यधिक जुड़ जाते हैं या किसी असफलता से टूट जाते हैं।
गीता 2:64 हमें सिखाती है कि:
- हर अनुभव को स्वीकार करें, लेकिन उससे बंधें नहीं
- इच्छाएँ रखें, पर उनके गुलाम न बनें
- नकारात्मक परिस्थितियों से सीखें, उनसे घृणा न करें
जब यह दृष्टि विकसित होती है, तब मन धीरे-धीरे स्थिर होने लगता है।
एक व्यावहारिक उदाहरण
मान लीजिए कोई व्यक्ति नौकरी में है। यदि उसका मन केवल पदोन्नति या प्रशंसा पर टिका है, तो वह हमेशा तनाव में रहेगा। लेकिन यदि वह अपना कार्य ईमानदारी से करता है और परिणाम को स्वीकार करता है, तो वही काम मानसिक शांति देने लगता है।
यही आत्मवश्यता है — इंद्रियों और मन पर नियंत्रण, न कि दबाव।
अर्जुन के संदर्भ में गीता 2:64
अर्जुन युद्धभूमि में इसलिए विचलित था क्योंकि उसका मन राग और द्वेष से भरा हुआ था — अपनों के प्रति मोह और युद्ध के परिणामों का भय। श्रीकृष्ण उसे यह सिखाते हैं कि जब तक मन इन द्वंद्वों में फंसा रहेगा, तब तक सही निर्णय संभव नहीं है।
राग-द्वेष से मुक्त दृष्टि अर्जुन को अपने कर्तव्य को स्पष्ट रूप से देखने में सहायता करती है।
इस श्लोक की सबसे गहरी शिक्षा
शांति कोई बाहरी उपलब्धि नहीं है, बल्कि एक आंतरिक अवस्था है। जब मन प्रतिक्रिया देना बंद करता है और विवेक से देखने लगता है, तभी सच्ची शांति जन्म लेती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: क्या गीता 2:64 विषयों के त्याग की बात करती है?
नहीं। यह श्लोक संतुलित उपयोग और मानसिक नियंत्रण की बात करता है, त्याग की नहीं।
प्रश्न 2: राग और द्वेष से मुक्त कैसे हुआ जा सकता है?
निरंतर आत्मनिरीक्षण, विवेक और अभ्यास से मन धीरे-धीरे संतुलित होता है।
प्रश्न 3: क्या यह श्लोक आज के तनाव में मदद करता है?
हाँ, यह श्लोक मानसिक शांति और भावनात्मक संतुलन का व्यावहारिक मार्ग दिखाता है।
निष्कर्ष
भगवद गीता 2:64 हमें यह सिखाती है कि शांति संसार से भागने में नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए संतुलन सीखने में है। जब इंद्रियाँ संयम में होती हैं और मन राग-द्वेष से मुक्त होता है, तब जीवन सहज, स्पष्ट और शांत हो जाता है।
गीता अध्याय 2 के महत्वपूर्ण श्लोक
Bhagavad Gita 2:64 – Control of Senses and Inner Peace
In verse 2:64 of the 0, Lord Krishna explains how true peace is achieved when a person learns to move through life with self-control and inner awareness. This verse comes after Krishna describes how attachment and anger disturb the mind. Here, he shows the solution.
Krishna teaches that a person who controls the senses, while engaging with the world without attachment or hatred, attains clarity and calmness. This does not mean running away from life or suppressing desires forcefully. Instead, it means experiencing life with balance and wisdom.
In modern life, people are constantly exposed to distractions—social media, comparisons, ambitions, and emotional triggers. When the senses control the mind, stress and confusion increase. But when the mind guides the senses, decisions become clearer and emotions stabilize.
This verse is especially relevant today. It teaches that peace is not found by avoiding experiences, but by engaging with them consciously. A balanced person enjoys success without arrogance and faces failure without despair. Such balance creates mental strength, emotional maturity, and long-term happiness.
Bhagavad Gita 2:64 reminds us that self-mastery is the foundation of freedom. When reactions are replaced by awareness, life becomes calmer, more focused, and meaningful.
Frequently Asked Questions
Q1. What is the main message of Bhagavad Gita 2:64?
The verse teaches that peace comes from controlling the senses and living
without attachment or aversion.
Q2. Does this verse promote detachment from life?
No. It promotes balanced engagement with life, not withdrawal or suppression.
Q3. How is this verse useful in modern daily life?
It helps reduce stress, improve focus, and create emotional stability amid
constant distractions.
Q4. What happens when senses are not controlled?
Lack of control leads to restlessness, poor judgment, and mental disturbance.

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