कभी ऐसा होता है कि हमें सही और गलत का ज्ञान तो मिल जाता है, लेकिन उसी ज्ञान के कारण मन और भी उलझ जाता है। हम सोचते हैं — अगर शांति ज्ञान से मिलती है, तो फिर हमें संघर्ष और कर्म की राह पर क्यों चलना पड़ता है?
भगवद गीता 3:1 इसी मानसिक उलझन से जन्म लेता है। यह अर्जुन का सीधा और ईमानदार प्रश्न है — और हर उस व्यक्ति की आवाज़ है जो जीवन में स्पष्टता चाहता है, लेकिन दिशा को लेकर भ्रमित है।
भगवद गीता 3:1 – मूल श्लोक
अर्जुन उवाच — ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन। तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥
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| जब ज्ञान और कर्म के बीच उलझन होती है, तभी अर्जुन का प्रश्न जन्म लेता है — यहीं से कर्मयोग की स्पष्ट यात्रा आरंभ होती है। |
📖 गीता 3:1 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद
अर्जुन:
हे जनार्दन,
यदि आपकी दृष्टि में
ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है,
तो फिर मुझे इस
भयानक युद्ध में
क्यों प्रवृत्त कर रहे हैं?
अर्जुन:
हे केशव,
आपके वचन
मुझे मिश्रित प्रतीत होते हैं।
कृपा करके
स्पष्ट रूप से बताइए —
अर्जुन:
वह एक मार्ग कौन-सा है
जिससे मेरा
निश्चित कल्याण हो सके?
🤔 ज्ञान बनाम कर्म — अर्जुन का पहला प्रश्न (अध्याय 3)
👉 अर्जुन का मन अब शोक से नहीं, बल्कि सही मार्ग जानने की जिज्ञासा से भरा है।
सरल अर्थ
अर्जुन ने कहा — हे जनार्दन! यदि आपके मत में ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है, तो फिर मुझे इस भयानक कर्म (युद्ध) में क्यों प्रवृत्त कर रहे हैं?
अर्जुन की उलझन वास्तव में क्या है?
अर्जुन का प्रश्न विरोध नहीं है, बल्कि भ्रम से निकला हुआ प्रश्न है।
अध्याय 2 में श्रीकृष्ण ने आत्मा, ज्ञान और शांति की गहरी बातें कीं। अर्जुन को लगा — अगर ज्ञान इतना श्रेष्ठ है, तो फिर हिंसा और युद्ध जैसे कर्म उस मार्ग से विपरीत क्यों लगते हैं?
यही वह बिंदु है जहाँ ज्ञान और व्यवहार टकराते हैं।
यह प्रश्न आज के जीवन में क्यों महत्वपूर्ण है?
आज भी बहुत लोग यही सोचते हैं — अगर मैं भीतर से शांत रहना चाहता हूँ, तो क्या मुझे जिम्मेदारियों से दूर नहीं हो जाना चाहिए?
अगर अध्यात्म सही है, तो क्या करियर, परिवार और संघर्ष गलत हैं?
गीता 3:1 इसी सोच की जड़ को छूता है। यह प्रश्न केवल अर्जुन का नहीं, हर जागरूक व्यक्ति का है।
एक वास्तविक जीवन उदाहरण
मान लीजिए कोई व्यक्ति आत्म-विकास और शांति की राह पर चल रहा है। वह किताबें पढ़ता है, ध्यान करता है, और भीतर शांति चाहता है।
लेकिन साथ ही उसके सामने नौकरी की जिम्मेदारियाँ, परिवार की अपेक्षाएँ और सामाजिक कर्तव्य भी हैं।
वह सोचता है — अगर शांति भीतर से आती है, तो फिर इतना संघर्ष क्यों?
यही अर्जुन का प्रश्न है — और यहीं से कर्मयोग की शुरुआत होती है।
ज्ञान और कर्म का टकराव नहीं, संतुलन
गीता 3:1 यह स्पष्ट करता है कि ज्ञान और कर्म विरोधी नहीं हैं।
अर्जुन को जो भ्रम है, वह यह है कि ज्ञान का अर्थ कर्म से दूर जाना है।
लेकिन श्रीकृष्ण आगे चलकर स्पष्ट करते हैं कि सच्चा ज्ञान कर्म से भागने में नहीं, बल्कि कर्म को सही दृष्टि से करने में प्रकट होता है।
अध्याय 3 की दिशा यहीं से तय होती है
गीता 3:1 पूरे कर्मयोग अध्याय की नींव रखता है।
यह प्रश्न पूछे बिना कर्मयोग का उत्तर अधूरा होता।
इसलिए यह श्लोक हमें सिखाता है कि स्पष्टता की शुरुआत सही प्रश्न पूछने से होती है।
निष्कर्ष: प्रश्न ही मार्ग बनाता है
गीता 3:1 हमें यह सिखाता है कि जब मन उलझन में हो, तो प्रश्न पूछना कमजोरी नहीं, बल्कि समझ की शुरुआत है।
अर्जुन का प्रश्न श्रीकृष्ण को कर्मयोग का मार्ग खोलने का अवसर देता है।
जहाँ प्रश्न ईमानदार होता है, वहीं उत्तर जीवन बदल देता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न – गीता 3:1❓️
भगवद गीता 3:1 में अर्जुन क्या प्रश्न पूछते हैं?
अर्जुन पूछते हैं कि जब श्रीकृष्ण ज्ञान को कर्म से श्रेष्ठ मानते हैं, तो उन्हें युद्ध जैसे कठिन कर्म में क्यों प्रवृत्त किया जा रहा है।
यह प्रश्न क्यों महत्वपूर्ण है?
यह प्रश्न कर्म और ज्ञान के बीच के भ्रम को दर्शाता है, जो आगे चलकर कर्मयोग की गहरी शिक्षा का आधार बनता है।
गीता अध्याय 3 की शुरुआत इस प्रश्न से क्यों होती है?
क्योंकि इसी प्रश्न के उत्तर में श्रीकृष्ण कर्मयोग का स्पष्ट और व्यावहारिक मार्ग समझाते हैं।
आज के जीवन में गीता 3:1 का क्या महत्व है?
यह श्लोक सिखाता है कि केवल ज्ञान नहीं, बल्कि कर्तव्य के साथ किया गया कर्म भी जीवन में आवश्यक है।
अध्याय 2 के महत्वपूर्ण श्लोक
गीता अध्याय 2सांख्य योग का संपूर्ण सार भगवद गीता 2:72
ब्रह्म स्थिति और परम शांति भगवद गीता 2:71
इच्छा और अहंकार का त्याग
भगवद गीता 3:2 – कर्मयोग पर श्रीकृष्ण का उत्तर
यह लेख भगवद गीता के श्लोक 3:1 की जीवनोपयोगी एवं दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। यह सामग्री केवल शैक्षिक और आध्यात्मिक उद्देश्य से है और किसी भी प्रकार की पेशेवर सलाह का विकल्प नहीं है।
Bhagavad Gita 3:1 – Arjuna’s Confusion Between Knowledge and Action
If knowledge is superior to action, why should one engage in difficult and painful duties? This is the honest question Arjuna asks in Bhagavad Gita 3:1. After hearing Krishna’s deep teachings on wisdom and detachment in Chapter 2, Arjuna feels confused. He wants clarity, not contradiction.
Arjuna respectfully addresses Krishna and asks why he is being encouraged to fight if wisdom and renunciation of desire lead to peace and liberation. From Arjuna’s perspective, action seems to bind the mind, while knowledge appears to free it. This confusion reflects a struggle that many people face in real life.
At this moment, Arjuna is not weak — he is sincere. He wants to understand the right path. Should one withdraw from action and focus on inner knowledge, or should one perform duty even when it brings conflict and hardship? Arjuna asks Krishna to clearly tell him which path leads to true well-being.
This verse marks an important turning point in the Gita. Chapter 2 established inner wisdom. Chapter 3 now begins the explanation of Karma Yoga — the path of selfless action. Krishna will clarify that true renunciation is not abandoning work, but abandoning attachment to results.
Bhagavad Gita 3:1 reminds us that confusion often arises when partial understanding is mistaken for the whole truth. This verse encourages honest questioning, clarity of purpose, and guidance from higher wisdom. It shows that doubt, when sincere, can become the doorway to deeper understanding.
Frequently Asked Questions
He is confused between the path of knowledge and the path of action.
Because the teachings of wisdom and action seem contradictory to him.
No. He is seeking clarity about the best path to follow.
It introduces Chapter 3 and the deeper teaching of Karma Yoga.
It reflects modern confusion between spiritual understanding and practical responsibility.

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