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यह वेबसाइट किस लिए है?

BhagwatGeetaBySun.com एक आध्यात्मिक एवं जीवन-मार्गदर्शन वेबसाइट है, जहाँ भगवद गीता के श्लोकों को सरल भाषा में समझाकर उन्हें आज के जीवन की वास्तविक समस्याओं से जोड़ा जाता है।

  • गीता के श्लोकों का व्यावहारिक अर्थ
  • तनाव, क्रोध और चिंता से मुक्ति
  • मन को शांत और स्थिर रखने की कला
  • कर्मयोग द्वारा सही निर्णय

What is BhagwatGeetaBySun.com?

BhagwatGeetaBySun.com is a spiritual and life-guidance website that explains the wisdom of the Bhagavad Gita in a simple, practical, and modern context to help people gain clarity, peace, and balance in life.

भगवद गीता 2:72 – ब्रह्म-स्थिति और जीवन की परम शांति

कभी-कभी जीवन में ऐसा क्षण आता है जब व्यक्ति को कुछ नया जोड़ने की ज़रूरत नहीं होती, बल्कि जो समझ चुका है, उसी में टिक जाने की ज़रूरत होती है।

भगवद गीता 2:72 उसी अवस्था का वर्णन करती है — जहाँ व्यक्ति भ्रम से बाहर आ चुका होता है और जीवन को स्पष्ट दृष्टि से देखने लगता है। यह श्लोक अध्याय 2 का निष्कर्ष है, लेकिन इसके संदेश की शुरुआत यहीं से होती है।


भगवद गीता 2:72 – मूल श्लोक

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥
भगवद गीता 2:72 का दृश्य जिसमें श्रीकृष्ण शांत भाव में हैं, अर्जुन पूर्ण स्थिरता और संतुलन की अवस्था में दिखाई देते हैं, वातावरण शांत और प्रकाशमय है जो ब्रह्म स्थिति का संकेत देता है
यह ब्रह्म स्थिति है —जिसे प्राप्त करके मनुष्य न भ्रमित होता है,न विचलित।
जीवन के अंतिम क्षणों में भी इसी में स्थित रहने वाला परम शांति को प्राप्त करता है।

📖 गीता 2:72 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद

अर्जुन:
हे श्रीकृष्ण, आपने स्थिर बुद्धि, शांति और इच्छा-त्याग की बात कही। क्या यही जीवन की अंतिम अवस्था है?

श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन, यही अवस्था ब्रह्मी स्थिति कहलाती है। जो इसे प्राप्त कर लेता है, वह फिर कभी मोह को प्राप्त नहीं होता।

अर्जुन:
यदि मनुष्य इस अवस्था में स्थित हो जाए, तो उसका अंत कैसा होता है, प्रभु?

श्रीकृष्ण:
अर्जुन, जो मनुष्य अंत समय तक इस ब्रह्मी स्थिति में स्थित रहता है, वह परमात्मा में लीन हो जाता है और मोक्ष को प्राप्त करता है।

अर्जुन:
तो हे माधव, जीवन का सार क्या है?

श्रीकृष्ण:
अहंकार, आसक्ति और भय से मुक्त होकर कर्तव्य करते हुए ईश्वर-स्मरण में स्थित रहना ही जीवन की पूर्णता है।


🕉️ ब्रह्मी स्थिति → मोह से मुक्ति → परम शांति → मोक्ष

👉 जो जीवन में शांत रहा, वही मृत्यु में भी मुक्त हुआ।


सरल अर्थ

हे पार्थ! यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त करने के बाद मनुष्य फिर कभी भ्रम में नहीं पड़ता। और यदि जीवन के अंत समय में भी इस अवस्था में स्थित हो, तो वह परम शांति को प्राप्त करता है।


ब्राह्मी स्थिति का वास्तविक अर्थ

अक्सर “ब्राह्मी स्थिति” सुनते ही लोग इसे किसी रहस्यमयी या अलौकिक अवस्था से जोड़ देते हैं। लेकिन गीता 2:72 इसे बहुत सरल रूप में प्रस्तुत करती है।

ब्राह्मी स्थिति का अर्थ है — ऐसी मानसिक अवस्था जहाँ:

  • मन भ्रम में नहीं भटकता
  • निर्णय डर से नहीं लिए जाते
  • अहंकार और आसक्ति ढीली पड़ जाती है
  • व्यक्ति अपने कर्तव्य में स्थिर रहता है

यह कोई एक दिन में मिलने वाली उपलब्धि नहीं, बल्कि धीरे-धीरे विकसित होने वाली परिपक्वता है।


एक वास्तविक जीवन उदाहरण

मान लीजिए कोई व्यक्ति जीवन के उस चरण में है जहाँ उसने बहुत कुछ देख लिया है — सफलता भी, असफलता भी।

अब वह हर परिस्थिति पर अति-प्रतिक्रिया नहीं देता। वह जानता है कि हर स्थिति अस्थायी है।

वह न अत्यधिक उत्साहित होता है, न अत्यधिक निराश। उसके निर्णय शांत होते हैं, और व्यवहार संतुलित।

यही व्यवहारिक रूप में ब्राह्मी स्थिति है।


भ्रम से मुक्ति और मानसिक स्पष्टता

इस श्लोक का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है — भ्रम से मुक्ति

भ्रम का अर्थ केवल गलत ज्ञान नहीं, बल्कि भावनात्मक उलझन भी है।

जब व्यक्ति अपनी पहचान, अपेक्षाओं और भय को स्पष्ट रूप से देख लेता है, तब भ्रम टूटने लगता है।

गीता 2:72 बताती है कि एक बार यह स्पष्टता आ जाए, तो मन फिर उसी पुराने भ्रम में नहीं लौटता।


अर्जुन के लिए अध्याय 2 का निष्कर्ष

अर्जुन अध्याय 2 की शुरुआत में अत्यंत भ्रमित, भयभीत और टूटे हुए मन से खड़ा था।

इस अंतिम श्लोक तक आते-आते श्रीकृष्ण ने उसे यह दिखा दिया कि शांति बाहर नहीं, भीतर की स्थिति है।

यह श्लोक अर्जुन को आश्वस्त करता है कि यदि वह इस दृष्टि में स्थित हो जाए, तो जीवन का कोई भी निर्णय उसे भ्रमित नहीं कर पाएगा।


निष्कर्ष: अध्याय का अंत, यात्रा की शुरुआत

गीता 2:72 केवल अध्याय का समापन नहीं है, यह एक नई जीवन-दृष्टि का आरंभ है।

यह हमें याद दिलाती है कि सच्ची शांति किसी उपलब्धि में नहीं, बल्कि स्पष्टता में है।

जब मन भ्रम से मुक्त हो जाता है, तो जीवन अपने आप सरल, संतुलित और अर्थपूर्ण हो जाता है।

स्पष्टता ही शांति है — और वही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि।

📘 भगवद गीता 2:72 – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

🕉️ गीता 2:72 में श्रीकृष्ण क्या सिखाते हैं?
इस श्लोक में श्रीकृष्ण बताते हैं कि स्थिर बुद्धि और शांति की अंतिम अवस्था को ब्रह्मी स्थिति कहते हैं, जिसे प्राप्त करने पर मनुष्य मोह में नहीं पड़ता।

🧠 ब्रह्मी स्थिति क्या होती है?
ब्रह्मी स्थिति वह अवस्था है जहाँ मनुष्य अहंकार, भय और आसक्ति से पूर्णतः मुक्त होकर परमात्मा में स्थित हो जाता है।

🙏 गीता 2:72 में मोक्ष का क्या अर्थ है?
इस श्लोक के अनुसार, जो व्यक्ति जीवन के अंत तक ब्रह्मी स्थिति में स्थित रहता है, वही परमात्मा में लीन होकर मोक्ष को प्राप्त करता है।

🌿 क्या गीता 2:72 आधुनिक जीवन में उपयोगी है?
हाँ, यह श्लोक बताता है कि जीवन भर शांत, संतुलित और अहंकार-मुक्त रहना ही सच्ची सफलता और शांति का मार्ग है।

🕊️ गीता 2:72 का मुख्य संदेश क्या है?
ब्रह्मी स्थिति में स्थित रहना और अंत समय तक उसी में बने रहना ही जीवन की पूर्णता और मुक्ति का मार्ग है।


Disclaimer:
यह लेख भगवद गीता के श्लोक 2:72 की आध्यात्मिक एवं जीवनोपयोगी व्याख्या प्रस्तुत करता है। यह सामग्री केवल शैक्षिक उद्देश्य से है और किसी भी प्रकार की चिकित्सीय, कानूनी या पेशेवर सलाह का विकल्प नहीं है।

Bhagavad Gita 2:72 – The Final State of Inner Peace and Liberation

What is the ultimate state of spiritual maturity? Bhagavad Gita 2:72 answers this by describing the final and stable condition of a person established in divine awareness. Lord Krishna explains that one who attains this state is never again deluded, and even at the moment of death remains peaceful and liberated.

This verse concludes Krishna’s teachings on self-control, wisdom, and inner stability. It describes a mind that has fully awakened to truth and clarity. Such a person no longer identifies with restless desires, fear, or ego. Confusion disappears because understanding is complete.

Krishna emphasizes that this state is permanent. It is not a temporary calm or a passing spiritual experience. Once established in this awareness, the mind does not fall back into ignorance. Life may continue with activity and responsibility, but the inner foundation remains unshaken.

The verse also carries a powerful message about death. For most people, death brings fear and uncertainty. But one who lives with inner clarity faces death with peace, because attachment and illusion have already been dissolved during life. Liberation is not postponed — it begins with right understanding.

Bhagavad Gita 2:72 reminds us that spiritual wisdom is not meant only for theory. It is a lived state of freedom, calm, and awareness. By practicing self-control, letting go of ego and attachment, and cultivating steady wisdom, a person gradually moves toward this final peace — a peace that remains untouched by change, loss, or time.


Frequently Asked Questions

What does Bhagavad Gita 2:72 describe?

It describes the final state of spiritual realization, where the mind is free from illusion and fully peaceful.

Does this verse talk about liberation after death?

It teaches that liberation begins in life and continues even at the time of death.

Is this state temporary or permanent?

It is permanent. Once established, the mind does not return to confusion.

Can a normal person reach this state?

Yes. Through discipline, awareness, and steady wisdom, anyone can progress toward it.

Why is this verse important?

It concludes the teaching on inner mastery and shows the ultimate goal of human life — lasting peace and freedom.

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