उत्तर: गीता 3:37 में श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं कि कामना (काम) ही मनुष्य को पाप कर्म करने के लिए प्रेरित करती है। यह रजोगुण से उत्पन्न होती है, अतृप्त और अत्यंत विनाशकारी शत्रु है।
वह कौन-सी शक्ति है जो सही-गलत जानते हुए भी इंसान को गिरा देती है?
अर्जुन ने पूछा — “मैं नहीं चाहता, फिर भी गलत क्यों हो जाता है?”
अब भगवद्गीता 3:37 में श्रीकृष्ण बिना घुमाए-फिराए उस शत्रु का नाम लेते हैं।
भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग
इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है।
गीता 3:37 – काम और क्रोध: मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु
गीता 3:36 में अर्जुन गलत कर्म के कारण के बारे में पूछते हैं।
गीता 3:37 में श्रीकृष्ण सीधे उत्तर देते हैं — काम (अतृप्त इच्छा) और क्रोध (निराशा से जन्मा आवेग)।
📜 भगवद्गीता 3:37 – मूल संस्कृत श्लोक
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥
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| काम और क्रोध ही भीतर छिपे हुए असली शत्रु हैं |
📖 गीता 3:37 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद
श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन,
यह काम है,
यह क्रोध है,
जो रजोगुण से उत्पन्न होता है।
श्रीकृष्ण:
यह महाशन (कभी न तृप्त होने वाला)
और महापापी है।
श्रीकृष्ण:
इसे ही तुम
इस संसार में
सबसे बड़ा शत्रु
जानो।
अर्जुन:
तो हे माधव,
क्या काम और क्रोध ही
मनुष्य को विवश करते हैं?
श्रीकृष्ण:
हाँ अर्जुन।
जब इच्छा पूरी नहीं होती,
वही क्रोध बन जाती है,
और बुद्धि को नष्ट कर देती है।
🔥 काम → क्रोध → बुद्धि का नाश
👉 मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु बाहर नहीं, भीतर है।
🔍 श्लोक का सरल भावार्थ
श्रीकृष्ण कहते हैं — यह काम (इच्छा) ही है जो पूरी न होने पर क्रोध बन जाता है।
यह रजोगुण से उत्पन्न होता है, कभी तृप्त नहीं होता, और मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।
🧠 “काम” वास्तव में क्या है?
काम केवल शारीरिक इच्छा नहीं है।
काम का अर्थ है —
- मुझे यह हर हाल में चाहिए
- मेरी खुशी इसी पर निर्भर है
- इसके बिना मैं अधूरा हूँ
जब यह इच्छा पूरी नहीं होती, तो वही काम क्रोध में बदल जाता है।
⚖️ रजोगुण क्यों खतरनाक है?
रजोगुण सक्रियता का गुण है, लेकिन असंतुलित होने पर यह लालच, बेचैनी और तुलना पैदा करता है।
रजोगुण से जन्मा काम कभी शांत नहीं होता।
इसीलिए श्रीकृष्ण इसे महाशनः (कभी न भरने वाला) और महापाप्मा (महान विनाशक) कहते हैं।
🌍 आधुनिक जीवन में गीता 3:37
आज लोग कहते हैं —
- “बस यह मिल जाए, फिर मैं खुश हो जाऊँगा”
- “मुझे उससे आगे निकलना है”
- “मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?”
यही काम है।
और जब यह इच्छा टूटती है, तो क्रोध, निराशा और आत्म-घृणा पैदा होती है।
👤 वास्तविक जीवन का उदाहरण (गहराई से)
मान लीजिए एक व्यक्ति है जो प्रमोशन को लेकर बहुत आकांक्षी है।
वह मान लेता है — “अगर यह पद नहीं मिला, तो मेरी कोई कीमत नहीं।”
वह मेहनत करता है, लेकिन परिणाम उसकी उम्मीद के अनुसार नहीं आता।
अब उसके भीतर धीरे-धीरे असंतोष पैदा होता है।
वह बॉस से चिढ़ने लगता है, साथियों से कटु व्यवहार करता है, और घर पर भी चिड़चिड़ा रहता है।
वह कहता है — “मैं ऐसा नहीं बनना चाहता था, लेकिन मैं खुद को रोक नहीं पा रहा।”
यही गीता 3:37 है — काम ने क्रोध का रूप ले लिया है।
समस्या काम करने की नहीं, इच्छा को पहचान न पाने की है।
🧠 श्रीकृष्ण की सीधी चेतावनी
श्रीकृष्ण यहाँ बहुत स्पष्ट हैं।
वे यह नहीं कहते — “काम थोड़ा ठीक है।”
वे कहते हैं — जब काम नियंत्रण से बाहर हो जाए, तो वही सबसे बड़ा शत्रु बन जाता है।
इसे पहचानना ही पहली विजय है।
✨ गीता 3:37 का केंद्रीय संदेश
यह श्लोक सिखाता है कि मनुष्य का पतन बाहर से नहीं आता।
वह भीतर की अतृप्त इच्छाओं से शुरू होता है।
जो व्यक्ति अपने काम और क्रोध को समझ लेता है,
वही सच्चे अर्थों में आत्म-संयम की ओर बढ़ता है।
🧭 निष्कर्ष
गीता 3:37 हमें डराने नहीं, जगाने आई है।
यह बताती है कि यदि जीवन में बार-बार क्रोध, निराशा और पछतावा आ रहा है,
तो कारण बाहर नहीं, भीतर की अतृप्त इच्छा है।
अगले श्लोक में श्रीकृष्ण बताएँगे कि यह शत्रु कहाँ-कहाँ छिपा रहता है।
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मनुष्य अपनी इच्छा के विरुद्ध पाप की ओर क्यों चला जाता है? काम और क्रोध के इस गहरे प्रश्न को समझें।
👉 काम और क्रोध का प्रश्न – गीता 3:36
काम किस प्रकार ज्ञान को ढक देता है और विवेक को कमजोर कर देता है— इस गूढ़ रहस्य को जानें।
👉 ज्ञान पर काम का आवरण – गीता 3:38
📘 भगवद गीता 3:37 – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
🕉️ गीता 3:37 में श्रीकृष्ण क्या बताते हैं?
श्रीकृष्ण बताते हैं कि काम (इच्छा) और क्रोध ही मनुष्य को पाप की ओर ले जाने वाले मुख्य कारण हैं।
🔥 काम और क्रोध का संबंध क्या है?
जब इच्छा पूरी नहीं होती, तो वही क्रोध में बदल जाती है और बुद्धि को भ्रमित कर देती है।
⚠️ काम को ‘महाशन’ क्यों कहा गया है?
क्योंकि इच्छा कभी तृप्त नहीं होती; जितना उसे पूरा किया जाए, वह उतनी ही बढ़ती जाती है।
🧠 गीता 3:37 का मनोवैज्ञानिक अर्थ क्या है?
यह श्लोक बताता है कि अनियंत्रित इच्छाएँ और क्रोध मनुष्य के निर्णय को कमजोर कर देते हैं।
🕊️ गीता 3:37 का मुख्य संदेश क्या है?
काम और क्रोध को पहचानकर उन पर नियंत्रण करना ही आत्म-विकास और शांति का मार्ग है।
महाभारत युद्ध से पहले पांडवों के प्रमुख योद्धाओं का परिचय भगवद गीता अध्याय 1 श्लोक 5 में दिया गया है। यह श्लोक युद्धभूमि की रणनीति और शक्ति-संतुलन को दर्शाता है।
👉 गीता 1:5 का भावार्थ विस्तार से पढ़ें
✍️ लेखक के बारे में
Bhagwat Geeta by Sun एक जीवन-दर्शन आधारित आध्यात्मिक मंच है, जहाँ श्रीमद्भगवद्गीता को मानव इच्छाओं, क्रोध और आत्म-संयम से जोड़कर सरल, प्रामाणिक और व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
इस मंच का उद्देश्य गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि आंतरिक शत्रुओं को पहचानने की मार्गदर्शिका के रूप में स्थापित करना है।
यह लेख केवल शैक्षिक, आध्यात्मिक और आत्म-विकास के उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय, कानूनी या वित्तीय सलाह नहीं है। भगवद्गीता की व्याख्या विभिन्न परंपराओं और दृष्टिकोणों के अनुसार भिन्न हो सकती है। पाठक अपने विवेक का प्रयोग करें।
Bhagavad Gita 3:37 – Desire: The Real Enemy Within
What is the invisible force that pushes people toward wrong choices, even when they know better? Bhagavad Gita 3:37 reveals the true inner enemy that silently controls human behavior.
Bhagavad Gita 3:37 – Shlok (English Letters)
Śrī-bhagavān uvāca |
Kāma eṣa krodha eṣa
rajo-guṇa-samudbhavaḥ |
Mahāśano mahā-pāpmā
viddhy enam iha vairiṇam ||
Explanation
In Bhagavad Gita 3:37, Lord Krishna gives a direct answer to Arjuna’s question about inner conflict. He identifies kāma (uncontrolled desire) as the primary force behind harmful actions. When desire is obstructed, it transforms into krodha (anger).
Krishna explains that this force arises from rajo-guṇa, the quality of restlessness and craving. Desire is never satisfied. The more it is fed, the stronger it becomes. This is why Krishna calls it insatiable and deeply destructive.
This verse shifts the focus from external blame to inner awareness. The enemy is not people, situations, or circumstances — it is uncontrolled desire operating within. Recognizing this enemy is the first step toward freedom.
For a modern global audience, this teaching feels extremely relevant. Consumer culture constantly stimulates desire — more success, more recognition, more pleasure. Bhagavad Gita 3:37 explains why frustration and anger increase when expectations are not met.
Real-Life Example
Consider a global sales professional driven by aggressive targets. When deals close, desire for higher rewards increases. When deals fail, irritation and anger arise. Stress follows both success and failure. By recognizing unchecked desire as the root cause, the professional learns to work with discipline instead of emotional craving. This shift reflects the wisdom of Bhagavad Gita 3:37.
The verse teaches that victory begins within. Identifying desire as the enemy prevents misdirected struggle and opens the path to self-mastery.
Frequently Asked Questions
Uncontrolled desire, which turns into anger when obstructed.
It is the quality of restlessness, craving, and constant activity.
Because fulfilling desire only increases the demand for more.
It explains frustration, anger, and burnout in desire-driven lifestyles.
Recognizing desire as an inner enemy, not blaming external factors.

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