क्या कभी ऐसा लगता है कि जीवन में समस्याएँ कम नहीं हो रहीं, लेकिन उन्हें सहने की आपकी ताकत धीरे-धीरे बढ़ रही है?
अक्सर हम सोचते हैं कि जब हालात ठीक होंगे, तभी मन शांत होगा। लेकिन भगवद गीता 2:65 एक बिल्कुल अलग सत्य बताती है — जब मन शांत होता है, तभी हालात अपना असर खोने लगते हैं।
यह श्लोक अर्जुन की उसी मानसिक अवस्था से जुड़ा है जहाँ डर, भ्रम और भविष्य की चिंता मन को जकड़ लेती है। और श्रीकृष्ण उसे यह समझाते हैं कि शांति कोई परिणाम नहीं, बल्कि सही सोच की शुरुआत है।
भगवद गीता 2:65 – मूल श्लोक
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते। प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते॥
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| जब मन को शांति प्राप्त हो जाती है, तो सभी दुःख समाप्त हो जाते हैं — यही भगवद गीता 2:65 का शाश्वत संदेश है। |
📖 गीता 2:65 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद
अर्जुन:
हे श्रीकृष्ण, यदि मनुष्य को शांति प्राप्त हो जाए
तो उसके जीवन में क्या परिवर्तन आता है?
श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन, जब मनुष्य को शांति प्राप्त होती है,
तब उसके सभी दुःख स्वतः नष्ट हो जाते हैं।
अर्जुन:
क्या केवल शांति से ही दुःख समाप्त हो जाते हैं, प्रभु?
श्रीकृष्ण:
हाँ अर्जुन।
शांत चित्त वाले मनुष्य की
बुद्धि शीघ्र ही स्थिर हो जाती है।
अर्जुन:
और स्थिर बुद्धि का क्या फल है, हे माधव?
श्रीकृष्ण:
जिसकी बुद्धि स्थिर होती है,
वह जीवन के सुख-दुःख में विचलित नहीं होता।
वही सच्चे ज्ञान और आत्मिक संतोष को प्राप्त करता है।
🕊️ शांति → दुःखों का अंत → स्थिर बुद्धि → संतुलित जीवन
👉 जहाँ शांति है, वहीं सच्चा सुख है।
सरल अर्थ
जब मन में शांति (प्रसाद) उत्पन्न होती है, तब सभी प्रकार के दुख धीरे-धीरे नष्ट होने लगते हैं। और शांत चित्त वाले व्यक्ति की बुद्धि शीघ्र ही स्थिर और स्पष्ट हो जाती है।
श्रीकृष्ण इस श्लोक में क्या सिखा रहे हैं?
यह श्लोक एक बहुत बड़ा भ्रम तोड़ता है। अक्सर हम सोचते हैं कि पहले समस्याएँ खत्म हों, तब हमें शांति मिलेगी। लेकिन श्रीकृष्ण यहाँ बिल्कुल उल्टा सिद्धांत बताते हैं।
वे कहते हैं: पहले शांति आती है, फिर दुख कम होते हैं।
जब मन अशांत होता है, तो वही दुख बार-बार मन में घूमते रहते हैं। लेकिन जब मन शांत होता है, तो वही दुख अपनी शक्ति खो देते हैं।
एक वास्तविक जीवन उदाहरण
मान लीजिए कोई व्यक्ति अपने करियर को लेकर बहुत परेशान है। वह रोज़ यही सोचता है — अगर यह फैसला गलत हो गया तो? अगर मैं पीछे रह गया तो? अगर लोग मुझसे आगे निकल गए तो?
इस स्थिति में उसका मन लगातार अशांत रहता है। वह कोई भी निर्णय ले, उसमें डर शामिल होता है।
लेकिन जिस दिन वही व्यक्ति थोड़ी देर रुककर, तुलना और डर से हटकर, अपने भीतर शांति महसूस करता है — उसी दिन उसे स्पष्ट दिखने लगता है कि उसके लिए सही कदम क्या है।
गीता 2:65 यही कहती है: शांत मन से लिया गया निर्णय अक्सर सही दिशा दिखाता है।
शांत मन और स्थिर बुद्धि का संबंध
इस श्लोक का सबसे महत्वपूर्ण भाग है — बुद्धि का स्थिर होना।
अशांत मन में बुद्धि:
- डर से प्रभावित होती है
- अतीत में अटकी रहती है
- भविष्य की चिंता में उलझ जाती है
लेकिन शांत मन में बुद्धि:
- वर्तमान में रहती है
- तथ्यों को स्पष्ट देखती है
- भावनाओं से नहीं, विवेक से निर्णय लेती है
अर्जुन के लिए गीता 2:65 क्यों महत्वपूर्ण थी?
अर्जुन युद्धभूमि में इसलिए विचलित नहीं था कि युद्ध कठिन था, बल्कि इसलिए कि उसका मन अशांत था।
डर, मोह और कर्तव्य — तीनों एक साथ उसे खींच रहे थे। श्रीकृष्ण जानते थे कि जब तक अर्जुन का मन शांत नहीं होगा, वह सही निर्णय नहीं ले पाएगा।
इसलिए यह श्लोक अर्जुन को सिखाता है — पहले भीतर स्थिर हो जाओ, फिर कर्म अपने आप सही दिशा में होगा।
निष्कर्ष
भगवद गीता 2:65 हमें यह याद दिलाती है कि शांति कोई विलास नहीं, बल्कि जीवन की मूल आवश्यकता है।
जब मन शांत होता है:
- दुख कमजोर पड़ जाते हैं
- निर्णय स्पष्ट हो जाते हैं
- जीवन हल्का महसूस होने लगता है
शांति लक्ष्य नहीं है — शांति से ही सही लक्ष्य दिखाई देता है।
📘 भगवद गीता 2:65 – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
🕉️ गीता 2:65 में श्रीकृष्ण क्या सिखाते हैं?
श्रीकृष्ण बताते हैं कि जब मनुष्य को शांति प्राप्त होती है, तो उसके सभी दुःख समाप्त हो जाते हैं और उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है।
🕊️ शांति प्राप्त होने पर क्या होता है?
शांति मिलने पर मन अशांत नहीं रहता, व्यक्ति सुख-दुःख में समान भाव रखता है और सही निर्णय ले पाता है।
🧠 स्थिर बुद्धि का क्या अर्थ है?
स्थिर बुद्धि का अर्थ है ऐसी समझ जो परिस्थितियों से डगमगाती नहीं और भावनाओं के वश में नहीं होती।
🌿 क्या आज के जीवन में गीता 2:65 उपयोगी है?
हाँ, यह श्लोक तनाव, चिंता और मानसिक अशांति से जूझ रहे आधुनिक मनुष्य के लिए अत्यंत उपयोगी है।
🙏 गीता 2:65 का मुख्य संदेश क्या है?
शांति ही स्थायी सुख का आधार है और शांत मन से ही सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है।
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यह लेख भगवद गीता के श्लोक 2:65 की आध्यात्मिक और जीवनोपयोगी व्याख्या प्रस्तुत करता है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सकीय, मानसिक या कानूनी सलाह का विकल्प नहीं है। पाठक अपने विवेक के अनुसार इसे अपनाएँ।
Bhagavad Gita 2:65 – How Inner Peace Removes Sorrow
In Bhagavad Gita 2:65, Lord Krishna explains the natural result of inner peace. When the mind becomes calm and balanced, all forms of inner suffering slowly fade away, and the intellect gains stability. This verse reveals a deep psychological truth: peace is not just comfort — it is the foundation of wisdom.
In daily life, most suffering does not come directly from situations, but from mental disturbance. Worry, fear, regret, overthinking, and emotional reactions create continuous stress. Krishna teaches that when the mind settles into calm awareness, these disturbances lose their power.
This verse follows a clear inner process. First comes self-control of the senses. From self-control arises inner peace. From peace, sorrow dissolves. And when sorrow disappears, the intellect becomes steady and reliable. A steady intellect allows a person to take thoughtful decisions, remain emotionally strong, and move forward without confusion.
Krishna does not say that problems vanish from life. Challenges still exist, but the mind no longer panics. A peaceful mind does not exaggerate pain, does not collapse under pressure, and does not lose direction during difficulties.
In the modern world filled with constant noise, digital overload, and emotional pressure, this verse is deeply relevant. It reminds us that clarity does not come from endless thinking, but from inner stillness. When peace is established within, life becomes lighter, decisions become clearer, and emotional suffering naturally reduces.
Frequently Asked Questions
It teaches that inner peace removes sorrow and creates a stable, clear intellect.
No. It teaches how to face problems with calmness instead of fear and anxiety.
Peace stops overreaction, emotional resistance, and mental chaos, which are the real causes of suffering.
Yes. It supports emotional balance, mental clarity, and stress reduction in daily life.
A person makes wiser decisions, stays emotionally strong, and lives with greater inner confidence.

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