उत्तर: गीता 3:31 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो लोग ईर्ष्या रहित होकर, श्रद्धा के साथ उनकी इस शिक्षा का पालन करते हैं, वे कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाते हैं।
क्या किसी मार्गदर्शन को मानना कमज़ोरी है, या यही असली बुद्धिमत्ता है?
आज का इंसान आज़ादी चाहता है, लेकिन बिना दिशा की आज़ादी अक्सर तनाव और भ्रम में बदल जाती है।
भगवद्गीता 3:31 हमें बताती है कि सही मार्गदर्शन को श्रद्धा के साथ अपनाना बंधन नहीं, बल्कि मानसिक मुक्ति का मार्ग है।
भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग
इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है।
गीता 3:31 – श्रद्धा से अपनाया गया कर्म ही मुक्ति देता है
गीता 3:30 में श्रीकृष्ण कर्म को ईश्वर को अर्पित करने की बात करते हैं।
गीता 3:31 यह स्पष्ट करती है कि जो व्यक्ति इस शिक्षा को नियमित, श्रद्धा और खुले मन से अपनाता है, वह कर्म के बंधन से मुक्त हो जाता है।
📜 भगवद्गीता 3:31 – मूल संस्कृत श्लोक
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥
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| श्रद्धा और विश्वास के साथ किया गया कर्म ही मुक्ति की ओर ले जाता है |
📖 गीता 3:31 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद
अर्जुन:
हे श्रीकृष्ण,
यदि कोई आपके इस
कर्मयोग के उपदेश का
पालन करे,
तो उसे क्या फल प्राप्त होता है?
श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन,
जो मनुष्य
श्रद्धा के साथ
मेरे इस उपदेश का
अनुसरण करता है,
श्रीकृष्ण:
और
दोष-दृष्टि से रहित
होकर कर्म करता है,
वह
कर्मबंधन से मुक्त
हो जाता है।
अर्जुन:
तो हे प्रभु,
श्रद्धा ही
मुक्ति की कुंजी है?
श्रीकृष्ण:
हाँ अर्जुन।
श्रद्धा + कर्मयोग
मनुष्य को
बंधन से मुक्ति
की ओर ले जाते हैं।
🔓 श्रद्धा के साथ कर्मयोग = कर्मबंधन से मुक्ति
👉 जो विश्वास से आचरण करता है, वही कर्म में भी मुक्त होता है।
🔍 श्लोक का भावार्थ (सरल भाषा में)
श्रीकृष्ण कहते हैं — जो मनुष्य मेरी इस शिक्षा का निरंतर पालन करते हैं,
जो श्रद्धा से युक्त हैं और हर बात में दोष नहीं निकालते, वे भी कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाते हैं।
🧠 यहाँ “श्रद्धा” का सही अर्थ
श्रद्धा का अर्थ अंधविश्वास नहीं है।
यह वह मानसिक अवस्था है जहाँ व्यक्ति यह स्वीकार करता है कि —
- हर सत्य तुरंत समझ में नहीं आता
- कुछ मार्ग अनुभव से सिद्ध होते हैं
- सीखने के लिए खुला मन ज़रूरी है
श्रद्धा के बिना ज्ञान भी बोझ बन जाता है।
⚖️ “अनसूया” – हर बात में दोष न निकालना
अनसूया का अर्थ है — हर शिक्षा को संदेह की नज़र से न देखना।
जो व्यक्ति हर समय यह खोजता है कि “इसमें कमी क्या है”,
वह किसी भी मार्ग पर टिक नहीं पाता।
गीता 3:31 सिखाती है कि सीखने के लिए थोड़ा विश्वास और धैर्य आवश्यक है।
🌍 आधुनिक जीवन में गीता 3:31
आज लोग बहुत कुछ जानते हैं —
- क्या सही है
- क्या गलत है
- क्या करना चाहिए
फिर भी जीवन में अशांति बनी रहती है।
क्यों?
क्योंकि ज्ञान को निरंतरता और श्रद्धा के साथ जीवन में नहीं उतारा जाता।
गीता 3:31 बताती है — सिर्फ जानना नहीं, अपनाना ही मुक्ति देता है।
👤 वास्तविक जीवन का उदाहरण (विस्तार से)
मान लीजिए एक व्यक्ति लगातार मानसिक तनाव, नींद की कमी और थकान से जूझ रहा है।
वह इंटरनेट पर बहुत कुछ पढ़ता है, वीडियो देखता है और जानता है कि उसे अपनी दिनचर्या बदलनी चाहिए।
अंततः वह एक अनुभवी डॉक्टर या काउंसलर से मिलता है। डॉक्टर उसे बहुत साधारण बातें बताते हैं — समय पर सोना, मोबाइल कम इस्तेमाल करना, हल्का व्यायाम और नियमित भोजन।
अब यहाँ दो स्थितियाँ बनती हैं।
पहली स्थिति में व्यक्ति हर सलाह पर सवाल करता है — “क्या सच में इससे फर्क पड़ेगा?” “सब लोग तो ऐसा नहीं करते।” “आज नहीं, कल से शुरू करूँगा।”
वह जानता सब कुछ है, लेकिन श्रद्धा और अनुशासन के बिना किसी भी बात को लगातार अपनाता नहीं। परिणामस्वरूप उसकी समस्या बनी रहती है।
दूसरी स्थिति में वही व्यक्ति डॉक्टर की सलाह को समझ और भरोसे के साथ अपनाता है।
वह हर बात का कारण पूरी तरह नहीं समझता, लेकिन यह मानकर चलता है कि जिसने यह मार्ग बताया है, वह अनुभव से बोल रहा है।
कुछ ही हफ्तों में उसकी नींद सुधरने लगती है, तनाव कम होता है और मन हल्का महसूस करता है।
यही गीता 3:31 का जीवंत अर्थ है — श्रद्धा, निरंतरता और दोष-दृष्टि के बिना अपनाया गया मार्ग ही मुक्ति देता है।
✨ गीता 3:31 का केंद्रीय संदेश
यह श्लोक हमें सिखाता है कि बंधन कर्म से नहीं, गलत दृष्टि से होता है।
जब कर्म श्रद्धा और समर्पण से किया जाता है, तो वही कर्म बंधन नहीं, मुक्ति का साधन बन जाता है।
🧭 निष्कर्ष
गीता 3:31 हमें यह याद दिलाती है कि हर मार्ग तुरंत समझ में नहीं आता,
लेकिन जो मार्ग श्रद्धा और ईमानदारी से अपनाया जाए, वह अंततः शांति देता है।
यही कर्मयोग की वास्तविक सफलता है।
📘 भगवद गीता 3:31 – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
🕉️ गीता 3:31 में श्रीकृष्ण क्या कहते हैं?
श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति श्रद्धा के साथ उनके कर्मयोग के उपदेश का पालन करता है, वह कर्मबंधन से मुक्त हो जाता है।
🙏 यहाँ ‘श्रद्धा’ का क्या अर्थ है?
श्रद्धा का अर्थ है विश्वास, समर्पण और बिना दोष खोजे गीता के उपदेशों को जीवन में उतारना।
⚖️ कर्मबंधन से मुक्ति कैसे मिलती है?
जब मनुष्य अहंकार और स्वार्थ छोड़कर, श्रद्धा से कर्म करता है, तब कर्म बंधन नहीं बनते।
🌿 क्या गीता 3:31 गृहस्थ जीवन के लिए उपयोगी है?
हाँ, यह श्लोक बताता है कि सामान्य जीवन में भी कर्तव्य कर्म करते हुए मुक्ति प्राप्त की जा सकती है।
🕊️ गीता 3:31 का मुख्य संदेश क्या है?
श्रद्धा के साथ किया गया कर्मयोग मनुष्य को बंधन से मुक्त कर देता है।
श्रीकृष्ण अर्जुन को पूर्ण समर्पण और आसक्ति-रहित कर्म का मार्ग बताते हैं। इस दिव्य शिक्षा को यहाँ समझें।
👉 कृष्ण का संपूर्ण समर्पण – गीता 3:30
जब मनुष्य ईश्वर की आज्ञा की उपेक्षा करता है, तो विनाश का कारण कैसे बनता है— इस कठोर सत्य को जानें।
👉 आज्ञा और विनाश का कारण – गीता 3:32
महाभारत के युद्ध से पहले कौरव पक्ष की शक्ति और प्रमुख योद्धाओं का वर्णन भगवद गीता अध्याय 1 श्लोक 8 में किया गया है। यह श्लोक युद्धभूमि की मानसिक तैयारी और रणनीतिक दृष्टि को दर्शाता है।
👉 गीता 1:8 का भावार्थ विस्तार से पढ़ें
✍️ लेखक के बारे में
Bhagwat Geeta by Sun एक जीवन-दर्शन आधारित आध्यात्मिक मंच है, जहाँ श्रीमद्भगवद्गीता को आधुनिक जीवन की मानसिक, भावनात्मक और नैतिक चुनौतियों से जोड़कर सरल भाषा में प्रस्तुत किया जाता है।
इस वेबसाइट का उद्देश्य गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानसिक शांति, निर्णय क्षमता और संतुलित जीवन की व्यावहारिक मार्गदर्शिका बनाना है।
यह लेख केवल शैक्षिक, आध्यात्मिक और आत्म-विकास के उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय, कानूनी या वित्तीय सलाह नहीं है। भगवद्गीता की व्याख्या विभिन्न परंपराओं और दृष्टिकोणों के अनुसार भिन्न हो सकती है। पाठक अपने विवेक का प्रयोग करें।
Bhagavad Gita 3:31 – Freedom Comes From Trusting the Teaching
Why do some people feel lighter and more focused after following a clear philosophy, while others remain tense despite effort? Bhagavad Gita 3:31 explains the role of trust and consistency.
Bhagavad Gita 3:31 – Shlok
Ye me matam idaṁ nityam
anutisṭhanti mānavāḥ |
Śraddhāvanto ’nasūyanto
mucyante te ’pi karmabhiḥ ||
Explanation
In Bhagavad Gita 3:31, Lord Krishna explains who truly benefits from his teaching. Those who practice these principles regularly, with trust and without resistance, become free from the inner bondage of action.
Krishna highlights three essential qualities: consistency, trust, and openness. The teaching does not work as a one-time idea. It works when lived daily. When actions are guided by understanding rather than doubt or cynicism, mental tension reduces naturally.
The phrase “free from bondage” does not mean freedom from responsibility. It means freedom from anxiety, guilt, and emotional pressure created by action. Work continues, but it no longer exhausts the mind.
For a modern global audience, this verse speaks directly to skepticism culture. People often try ideas half-heartedly while mentally resisting them. Bhagavad Gita 3:31 explains why such effort feels ineffective. Trust aligns intention with action, creating clarity and inner ease.
Real-Life Example
Consider a healthcare professional in the UK working long shifts under pressure. When she applies principles of focused effort, detachment from outcomes, and trust in disciplined practice, her stress levels decrease. She continues working hard, but mental exhaustion reduces. This inner freedom reflects the message of Bhagavad Gita 3:31.
The verse teaches that freedom is not accidental. It arises when effort is guided by trust, understanding, and regular practice.
Frequently Asked Questions
It teaches that consistent practice with trust frees a person from inner bondage of action.
It means trust and openness toward the teaching, not blind belief.
No. It discourages resistance and negativity, not healthy inquiry.
It explains why commitment and trust reduce stress in modern work life.
Freedom from anxiety, mental burden, and emotional exhaustion caused by action.

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