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यह वेबसाइट किस लिए है?

BhagwatGeetaBySun.com एक आध्यात्मिक एवं जीवन-मार्गदर्शन वेबसाइट है, जहाँ भगवद गीता के श्लोकों को सरल भाषा में समझाकर उन्हें आज के जीवन की वास्तविक समस्याओं से जोड़ा जाता है।

  • गीता के श्लोकों का व्यावहारिक अर्थ
  • तनाव, क्रोध और चिंता से मुक्ति
  • मन को शांत और स्थिर रखने की कला
  • कर्मयोग द्वारा सही निर्णय

What is BhagwatGeetaBySun.com?

BhagwatGeetaBySun.com is a spiritual and life-guidance website that explains the wisdom of the Bhagavad Gita in a simple, practical, and modern context to help people gain clarity, peace, and balance in life.

जो कर्म-चक्र नहीं मानता उसका क्या होता है? – भगवद गीता 3:16

प्रश्न: गीता 3:16 में कर्म और यज्ञ के चक्र की अवहेलना करने वाले के बारे में क्या कहा गया है?

उत्तर: गीता 3:16 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति इस संसार में स्थापित कर्म और यज्ञ के चक्र का पालन नहीं करता, वह पापमय जीवन जीता है। ऐसा व्यक्ति इंद्रियों के सुख में फँसकर अपना जीवन व्यर्थ कर देता है।

क्या केवल अपनी इच्छा , के अनुसार जीना ही आज़ादी है?

आज बहुत से लोग नियम, जिम्मेदारी और समाज से दूर होकर “खुद के लिए जीना” चाहते हैं। लेकिन क्या ऐसा जीवन वास्तव में संतोष देता है?

भगवद्गीता 3:16 इसी सोच को सीधे चुनौती देती है और एक कठोर लेकिन सच्चा प्रश्न पूछती है।

गीता 3:16 – जीवन-चक्र से कटे व्यक्ति की वास्तविक स्थिति

गीता 3:16 कर्मयोग के पूरे सिद्धांत का चेतावनी वाला श्लोक है। यह बताता है कि जो व्यक्ति सृष्टि के कर्म-चक्र को नकारता है, वह बाहर से स्वतंत्र दिख सकता है, लेकिन भीतर से खोखला हो जाता है।


📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह):
भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग

इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है।


📜 भगवद्गीता 3:16 – मूल संस्कृत श्लोक

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥


भगवद गीता 3:16 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि जो यज्ञ से जुड़े धर्म चक्र का पालन नहीं करता, उसका जीवन व्यर्थ होता है
गीता 3:16 – यज्ञ के दिव्य चक्र की उपेक्षा करने वाला व्यक्ति इंद्रियों के लिए जीता है और जीवन व्यर्थ कर देता है

📖 गीता 3:16 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद

अर्जुन:
हे श्रीकृष्ण, यदि यह कर्म, यज्ञ और सृष्टि का एक निश्चित चक्र है, तो जो इसका पालन न करे, उसका क्या होता है?

श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन, जो मनुष्य इस लोक में चल रहे कर्म-चक्र का पालन नहीं करता, वह पापमय जीवन जीता है।

अर्जुन:
तो क्या वह स्वयं को ही हानि पहुँचाता है, प्रभु?

श्रीकृष्ण:
हाँ अर्जुन। इंद्रियों में आसक्त होकर जो केवल अपने सुख के लिए जीता है, वह वास्तव में व्यर्थ जीवन जीता है।

अर्जुन:
तो हे माधव, सार्थक जीवन का मार्ग क्या है?

श्रीकृष्ण:
इस दिव्य कर्म-चक्र के अनुसार कर्तव्य और यज्ञ-भाव से कर्म करना ही सार्थक और कल्याणकारी जीवन है।


🔄 कर्म-चक्र का पालन = जीवन का उद्देश्य ❌ कर्म-चक्र से विचलन = व्यर्थ जीवन

👉 जो केवल अपने लिए जीता है, वह जीते हुए भी जीवन का अर्थ खो देता है।

🔍 श्लोक का भावार्थ (सरल लेकिन गहरा)

श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं — जो व्यक्ति इस संसार के निर्धारित कर्म-चक्र का पालन नहीं करता, जो केवल इंद्रियों के सुख में डूबा रहता है, उसका जीवन उद्देश्यहीन हो जाता है।

यहाँ “मोघं जीवति” का अर्थ है — ऐसा जीवन जो चलता तो है, लेकिन भीतर से खाली रहता है।


🔄 यह “कर्म-चक्र” आखिर है क्या?

कर्म-चक्र का अर्थ कोई जटिल दर्शन नहीं है। यह जीवन की एक सरल सच्चाई है:

  • आप समाज से लेते हैं
  • आप समाज को लौटाते हैं
  • आप प्रकृति का उपयोग करते हैं
  • आप प्रकृति की रक्षा करते हैं

जब यह संतुलन टूटता है, तभी जीवन में तनाव, असंतोष और भ्रम जन्म लेता है।


⚠️ केवल “अपनी खुशी” पर जीने की समस्या

गीता 3:16 यह नहीं कहती कि खुशी गलत है।

यह कहती है कि जब जीवन का केंद्र केवल “मैं” बन जाता है, तो व्यक्ति:

  • कर्तव्य से भागने लगता है
  • जिम्मेदारी को बोझ समझने लगता है
  • और अंततः स्वयं से ही असंतुष्ट हो जाता है

इंद्रिय-सुख तुरंत अच्छा लगता है, लेकिन वह जीवन को दिशा नहीं देता।


🌍 आधुनिक जीवन में गीता 3:16 की प्रासंगिकता

आज हम “freedom” के नाम पर structure से भागना चाहते हैं।

लेकिन कुछ समय बाद वही freedom confusion, loneliness और anxiety में बदल जाती है।

गीता 3:16 स्पष्ट करती है — कर्तव्य से जुड़ा जीवन ही स्थिर और सार्थक होता है।


👤 एक वास्तविक जीवन उदाहरण

एक व्यक्ति अचानक सब कुछ छोड़कर “खुद को खोजने” निकल पड़ता है।

शुरुआत में उसे अच्छा लगता है, लेकिन धीरे-धीरे दिशा, अनुशासन और उद्देश्य की कमी उसे अंदर से तोड़ने लगती है।

यही वह स्थिति है जिसे गीता 3:16 “मोघं जीवनम्” कहती है।


🧠 श्रीकृष्ण का मनोवैज्ञानिक संदेश

श्रीकृष्ण मनुष्य को यह नहीं कहते कि वह मशीन बन जाए।

वे कहते हैं — अपनी प्रकृति के अनुसार, समाज और व्यवस्था से जुड़े रहकर जियो।

क्योंकि मनुष्य का मन अर्थ चाहता है, केवल आनंद नहीं।


✨ गीता 3:16 का केंद्रीय संदेश

यह श्लोक डराने के लिए नहीं, जगाने के लिए है।

यह कहता है — अगर जीवन में शांति चाहिए, तो कर्म-चक्र से मत कटो।

उसी में रहते हुए संतुलन सीखो।


🧭 निष्कर्ष

गीता 3:16 हमें यह सिखाती है कि स्वतंत्रता और जिम्मेदारी एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।

जो व्यक्ति जीवन-चक्र के साथ चलता है, वही भीतर से स्थिर रहता है।


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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न – गीता 3:16❓️

भगवद गीता 3:16 का मुख्य संदेश क्या है?
यह श्लोक सिखाता है कि जो व्यक्ति सृष्टि के कर्म-चक्र का पालन नहीं करता, उसका जीवन उद्देश्यहीन हो जाता है।

यहाँ कर्म-चक्र से क्या तात्पर्य है?
कर्म-चक्र का अर्थ है यज्ञ, सेवा, कर्तव्य और समाज के प्रति जिम्मेदारी से किया गया कर्म।

केवल इंद्रिय भोग में लगे रहना क्यों गलत है?
क्योंकि इससे व्यक्ति आत्मिक विकास से दूर हो जाता है और उसका जीवन सारहीन बन जाता है।

आज के जीवन में गीता 3:16 कैसे उपयोगी है?
यह श्लोक सिखाता है कि जीवन को केवल भोग नहीं, बल्कि कर्तव्य और योगदान से अर्थपूर्ण बनाना चाहिए।

क्या अपमान का भय जीवन को भीतर से तोड़ देता है? — भगवद गीता 2:36

जब लोग हमारे बारे में गलत सोचते हैं, तब मन क्यों टूट जाता है? गीता 2:36 आत्म-सम्मान और भय के गहरे सत्य को उजागर करता है।

पूरा श्लोक और अर्थ पढ़ें →

✍️ लेखक के बारे में

Bhagwat Geeta by Sun एक आध्यात्मिक और जीवन-दर्शन आधारित प्लेटफॉर्म है, जहाँ श्रीमद्भगवद्गीता को आधुनिक जीवन की समस्याओं से जोड़कर समझाया जाता है।

इस वेबसाइट का उद्देश्य गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ के रूप में नहीं, बल्कि निर्णय, मानसिक शांति और जीवन-संतुलन की मार्गदर्शिका के रूप में प्रस्तुत करना है।

यहाँ प्रकाशित लेख व्यावहारिक जीवन, मनोविज्ञान और शाश्वत दर्शन तीनों को ध्यान में रखकर लिखे जाते हैं।


Disclaimer:
यह लेख केवल शैक्षिक, आध्यात्मिक और आत्म-विकास के उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय, कानूनी या वित्तीय सलाह नहीं है। भगवद्गीता की व्याख्या विभिन्न परंपराओं और दृष्टिकोणों के अनुसार भिन्न हो सकती है। पाठक अपने विवेक का प्रयोग करें।

Bhagavad Gita 3:16 – Why Ignoring the Natural Law Leads to a Meaningless Life

Why do some lives feel busy yet empty? Why does effort sometimes feel disconnected from purpose? Bhagavad Gita 3:16 answers this with a powerful warning about ignoring the natural order of life.


Sanskrit Shloka – Bhagavad Gita 3:16

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥


English Explanation

In Bhagavad Gita 3:16, Lord Krishna explains what happens when a person refuses to live in harmony with the natural cycle of duty, action, and balance. He states that one who does not follow this cycle lives a life driven by the senses, and such a life is ultimately wasted.

This verse is direct and uncompromising. Krishna is not condemning enjoyment itself, but uncontrolled, self-centered living. When actions are guided only by desire, comfort, or pleasure, they break the rhythm that sustains life. The result is inner emptiness, restlessness, and lack of purpose.

Krishna calls such a life mogham — meaningless. Why? Because effort without alignment to responsibility does not create growth. A person may remain active, successful, or busy, yet feel disconnected from fulfillment. This verse explains the root cause: disregard for duty and contribution.

For a global, modern audience, this teaching is extremely relevant. Many people feel trapped in routine, chasing stimulation, while ignoring responsibility toward society, nature, or inner discipline. Bhagavad Gita 3:16 reveals that true satisfaction comes when action supports balance, not when it feeds indulgence.

This verse is not meant to frighten, but to awaken. Krishna invites us to examine our direction. When life is lived in alignment with ethical action, self-control, and contribution, effort becomes meaningful. Ignoring this rhythm may feel free, but it slowly drains purpose and peace.


Frequently Asked Questions

What is the main warning in Bhagavad Gita 3:16?

It warns that ignoring duty and natural order leads to a meaningless, unfulfilled life.

What does “life driven by the senses” mean?

A life controlled by pleasure, comfort, and desire without responsibility or discipline.

Is Krishna rejecting enjoyment?

No. He is rejecting selfish enjoyment that ignores balance and duty.

Why does Krishna call such a life meaningless?

Because effort without purpose does not lead to inner growth or peace.

How can Bhagavad Gita 3:16 be applied today?

By aligning work with responsibility, ethical values, and contribution beyond personal pleasure.

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