Friday, November 14, 2025

भगवद्‌गीता अध्याय 2, श्लोक 29

भगवद्‌गीता अध्याय 2, श्लोक 29

श्लोक

" आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेनम्
आश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति
श्रुत्वाऽप्येनं वेद न चैव कश्चित्॥ "


भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि आत्मा इतनी अद्भुत और सूक्ष्म है कि लोग इसे अलग-अलग तरीकों से समझने की कोशिश करते हैं।
किसी को यह बड़ी आश्चर्यजनक लगती है, कोई इसकी बातें सुनकर चकित रह जाता है, और कई लोग इसके बारे में बहुत कुछ सुनते हैं—फिर भी उसकी असली प्रकृति को नहीं समझ पाते।


विस्तृत व्याख्या

भगवान कहते हैं कि आत्मा अद्भुत (अद्भुतम्) है—न जन्म लेती है, न मरती है, न बदलती है।
लेकिन यह सत्य लोगों को आसानी से समझ में नहीं आता।

1. कोई आत्मा को आश्चर्य की तरह देखता है
जब कोई व्यक्ति आध्यात्मिक अनुभव करता है—ध्यान, साधना या गहरे चिंतन में—उसे लगता है कि आत्मा की वास्तविकता बहुत अद्भुत है।
यह अनुभव साधारण बुद्धि से परे है।


2. कोई आत्मा का वर्णन आश्चर्य की तरह करता है
कुछ ज्ञानी व्यक्ति आत्मा के बारे में बताते हैं—कि वह अनंत है, अविनाशी है, सर्वव्यापक है।
लेकिन जब वे बताते हैं, तब भी श्रोता को यह आश्चर्यजनक लगता है।


3. कोई आत्मा को आश्चर्य की तरह सुनता है
कई लोग आत्मा की कहानी सुनते हैं—कि यह शरीर से अलग है, मृत्यु के बाद भी रहती है—
तो वे हैरान रह जाते हैं कि इतनी बड़ी शक्ति हमारे भीतर है।


4. और कई सुनकर भी नहीं समझ पाते
आत्मा का ज्ञान केवल सुनने से नहीं मिलता,
अनुभव, ध्यान, विवेक और साधना से ही समझ आता है।
जो लोग केवल सतही रूप से सुनते हैं, वे आत्मा की गहराई को कभी महसूस नहीं कर पाते।


सीख

आत्मा का ज्ञान सबसे महान और अद्भुत ज्ञान है।

यह केवल किताब पढ़ने से नहीं, बल्कि अनुभव और साधना से समझ आता है।

जीवन में जो भी दुख या संकट आते हैं, यदि हम अपनी आत्मा को समझ लें—तो इन सब पर विजय पा सकते हैं।

वास्तविक शक्ति और शांति अंदर है, बाहर नहीं।

Bhagavad Gita Chapter 2, Verse 29 in English

No comments:

Post a Comment

कर्म, अकर्म और विकर्म में क्या अंतर है? – भगवद गीता 4:17

प्रश्न: गीता 4:17 में कर्म, अकर्म और विकर्म के बारे में क्या कहा गया है? उत्तर: गीता 4:17 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि कर्म क्या है, अकर्म ...