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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1, श्लोक 19

स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलोऽभ्यनुनादयन् ॥ 1 :19 

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हिन्दी अनुवाद

उस (पाण्डवों की ओर से बजे हुए शंखों) का भीषण नाद आकाश और पृथ्वी में गूंज उठा और उसकी गूंज ने धृतराष्ट्र के पुत्रों (कौरवों) के हृदय चीर डाले अर्थात् उनके मन को भयभीत और विचलित कर दिया।


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विस्तृत व्याख्या

1. युद्ध का आरंभिक संकेत – शंखनाद

इस श्लोक में संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि जब पाण्डवों और उनके वीर साथियों ने अपने-अपने शंख बजाए, तो उसका स्वर इतना प्रचंड और प्रचंडकारी था कि पूरा आकाश और पृथ्वी उस ध्वनि से गूंज उठा।

शंखध्वनि युद्ध का प्रतीकात्मक प्रारंभ माना जाता था।

यह न केवल युद्ध की घोषणा थी, बल्कि प्रतिद्वंद्वी को मानसिक रूप से डराने का साधन भी था।



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2. धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्

इसका शाब्दिक अर्थ है – "धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय चीर डाले।"

यहाँ “हृदय चीरना” कोई शारीरिक चोट नहीं, बल्कि मानसिक आघात और भय का प्रतीक है।

पाण्डवों की सेना का आत्मविश्वासपूर्ण शंखनाद सुनकर कौरवों के मन में अशुभ आशंका और घबराहट पैदा हो गई।



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3. नभश्च पृथिवीं चैव

यह दर्शाता है कि शंखध्वनि इतनी प्रचंड थी कि आकाश और पृथ्वी दोनों गुंजायमान हो उठे।

इससे यह संकेत मिलता है कि पाण्डवों की शक्ति केवल भौतिक ही नहीं, बल्कि दैवीय सहयोग से भी संपन्न थी।



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4. तुमुलः अभ्यनुनादयन्

"तुमुल" का अर्थ है – भीषण, अत्यधिक प्रचंड।

"अनुनादयन्" का अर्थ है – बार-बार गूंजने वाली ध्वनि।

अर्थात् शंखनाद इतना प्रबल था कि उसकी प्रतिध्वनि बार-बार गूंजकर वातावरण को हिला रही थी।



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आध्यात्मिक दृष्टि से

पाण्डवों के शंखनाद का अर्थ है धर्म और सत्य का उद्घोष।

कौरवों के हृदय का विचलित होना दर्शाता है कि अधर्म का आधार सदा कमजोर होता है।

सत्य और धर्म में जो आत्मविश्वास होता है, वह विपरीत पक्ष को स्वयं ही भयभीत कर देता है।



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संदर्भ

श्लोक 1.14 से 1.19 तक लगातार पाण्डवों द्वारा शंख बजाने का वर्णन है।

यहाँ culminate होता है (परिणति आती है) – कि पाण्डवों की शंखध्वनि इतनी प्रभावी रही कि कौरवों का मनोबल प्रारंभ में ही टूटने लगा।

युद्ध अभी शुरू नहीं हुआ था, परंतु मानसिक युद्ध (psychological war) में पाण्डव पहले ही बाज़ी मार चुके थे।



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सार 

👉 इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि धर्मबल और आत्मविश्वास से किया गया उद्घोष (शंखनाद) शत्रु के मन में भय उत्पन्न कर देता है।
👉 यह दिखाता है कि युद्ध केवल शस्त्रों का नहीं होता, बल्कि मन और आत्मा की शक्ति का भी होता है।

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