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Saturday, October 4, 2025

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 श्लोक 34

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 श्लोक 34


आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा।। 1.34 ।।

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हिंदी भावार्थ (विस्तार से):

इस श्लोक में अर्जुन अपने सामने खड़े युद्ध में शामिल लोगों की ओर संकेत करते हैं। वे कहते हैं –
हे कृष्ण! इस युद्ध में मुझे अपने आचार्य (गुरुजन), पितर (बड़े-बुजुर्ग), पुत्र, पितामह (दादा-परदादा समान), मातुल (मामा), श्वशुर (ससुर), पौत्र (पोते-पोतियाँ), श्याल (साले), और अन्य सम्बन्धी दिखाई देते हैं।

अर्जुन की स्थिति बहुत दुविधापूर्ण हो रही है। उनका मन करुणा से भर गया है और वे सोचते हैं कि यदि इस युद्ध में विजय पाने के लिए उन्हें अपने ही गुरुओं, बड़ों और परिवार के प्रिय सदस्यों का वध करना पड़े, तो ऐसी विजय का क्या लाभ होगा?


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विस्तृत व्याख्या:

1. आचार्य: यहाँ द्रोणाचार्य की ओर संकेत है, जो अर्जुन के गुरु थे।


2. पितरः: बड़े-बुजुर्ग या पिता समान।


3. पुत्राः: युद्ध में भाग लेने वाले कौरव और पांडव कुल के पुत्र।


4. पितामहाः: भीष्म पितामह, जो दोनों कुलों के पूज्यनीय थे।


5. मातुलाः: शकुनि जैसे मामा।


6. श्वशुराः: दुर्योधन आदि के पक्ष में जुड़े श्वसुर।


7. पौत्राः: संतानों की संतानें।


8. श्यालाः: बहनों के पति।


9. सम्बन्धिनः: अन्य रिश्तेदार व मित्रगण।



अर्जुन यह देखकर और भी अधिक विचलित हो जाते हैं कि इस युद्ध में केवल शत्रु ही नहीं, बल्कि उनके अपने प्रिय और पूजनीय संबंधी भी सम्मिलित हैं। इसलिए उनका हृदय करुणा से भर जाता है और वे युद्ध करने की इच्छा खो देते हैं।

Sunday, September 28, 2025

भगवद्गीता अध्याय 1, श्लोक 12

तस्य संजनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान्।।1:12

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हिंदी अनुवाद

कौरवों के वृद्ध पितामह भीष्म, दुर्योधन के हृदय में उत्साह उत्पन्न करने के लिए, सिंह के समान गर्जना करके उच्च स्वर में शंख बजाते हैं।


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श्लोक का प्रसंग

पिछले श्लोक (1:10–11) में दुर्योधन ने गुरु द्रोणाचार्य से अपनी सेना और पांडवों की सेना की स्थिति का वर्णन किया।

दुर्योधन को यह चिंता थी कि पांडवों की सेना भले ही संख्या में कम हो, लेकिन भीम और अर्जुन जैसे महायोद्धाओं के कारण शक्तिशाली है।

ऐसे समय में भीष्म पितामह ने आगे बढ़कर दुर्योधन का मनोबल बढ़ाया।



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मुख्य बिंदु

1. भीष्म पितामह का कर्तव्यभाव

भीष्म ने प्रतिज्ञा कर रखी थी कि वे हस्तिनापुर के सिंहासन और उसकी रक्षा के लिए जीवनभर समर्पित रहेंगे।

यद्यपि भीष्म जानते थे कि धर्म की ओर पांडव हैं, लेकिन अपनी प्रतिज्ञा के कारण वे कौरवों की ओर से युद्ध कर रहे थे।



2. शंखनाद का महत्व

प्राचीन काल में युद्ध का आरंभ शंखनाद से होता था।

शंख की ध्वनि सैनिकों के मन में उत्साह, शक्ति और साहस भर देती थी।

भीष्म के शंख की आवाज़ सिंह की गर्जना के समान प्रबल थी, जिससे कौरवों की सेना में आत्मविश्वास बढ़ा।



3. दुर्योधन को आश्वासन

भीष्म का यह कार्य दुर्योधन को यह विश्वास दिलाने के लिए था कि वे पूरी तरह उसके साथ हैं और पूरी शक्ति से युद्ध करेंगे।



4. प्रतीकात्मक अर्थ

यह शंखनाद केवल ध्वनि नहीं, बल्कि आने वाले धर्मयुद्ध का उद्घोष था।

यह संकेत था कि अब युद्ध टालने योग्य नहीं है, और धर्म तथा अधर्म के बीच निर्णायक टकराव शुरू हो चुका है।





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सरल भाषा में समझें

इस श्लोक में बताया गया है कि जब दुर्योधन चिंता और असुरक्षा में था, तब भीष्म पितामह ने सिंह की तरह गर्जना करके शंख बजाया। यह कार्य दुर्योधन और उसकी सेना को आत्मविश्वास देने तथा युद्ध की शुरुआत का संकेत करने के लिए किया गया।

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