Wednesday, November 12, 2025

🌼 भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 26 🌼

   भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक26 

                      श्लोक

          अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्।
            तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि॥


                  🌻 भावार्थ

हे महाबाहो अर्जुन! यदि तुम यह मान भी लो कि आत्मा सदा जन्म लेती रहती है और सदा मरती भी रहती है, तब भी तुम्हें इस विषय में शोक नहीं करना चाहिए


             🌷 विस्तृत व्याख्या

श्रीकृष्ण यहाँ अर्जुन को एक और दृष्टिकोण से समझा रहे हैं।
उन्होंने पहले कहा कि आत्मा अविनाशी, अजर, अमर है — उसका जन्म और मरण नहीं होता।
अब वे कहते हैं —

> "ठीक है, मान लो कि आत्मा हर बार जन्म लेती है और हर बार मर जाती है (जैसे सामान्य मनुष्य सोचते हैं)। तब भी शोक करना व्यर्थ है।"



क्योंकि —

यदि आत्मा बार-बार जन्म लेती है, तो मृत्यु तो केवल एक क्षणिक परिवर्तन है।

मृत्यु अंत नहीं, बल्कि नए जीवन की शुरुआत है।

तो फिर इस प्राकृतिक क्रम (जन्म-मृत्यु के चक्र) पर शोक क्यों किया जाए?


श्रीकृष्ण का उद्देश्य यह है कि अर्जुन का मोह (attachment) समाप्त हो जाए।
उन्हें यह समझाना है कि मृत्यु कोई विनाश नहीं, बल्कि आत्मा का परिवर्तन


            🌼 जीवन के लिए संदेश


👉 जीवन में किसी का जाना अंत नहीं होता, वह केवल एक नई यात्रा की शुरुआत है।
👉 मृत्यु का शोक करना प्रकृति के नियम का विरोध करना है।
👉 हमें कर्तव्य (धर्म) का पालन करना चाहिए, शोक में डूबकर कर्म से विमुख नहीं होना चाहिए।


                      🌞 संक्षेप में

चाहे आत्मा अमर मानी जाए या बार-बार जन्म लेने वाली .
दोनों ही स्थिति में शोक का कोई कारण नहीं है।



                     🌸 शब्दार्थ

अथ — यदि, अगर

च — और

एनम् — इस आत्मा को

नित्यजातम् — सदा जन्म लेने वाला

नित्यम् — सदा

वा — या

मन्यसे — मानो

मृतम् — मरा हुआ

तथापि — फिर भी

त्वम् — तुम

महाबाहो — हे बलवान बाहुओं वाले अर्जुन

न एवम् — इस प्रकार

शोचितुम् — शोक करने योग्य

अर्हसि — योग्य नहीं हो

Bhagavad Gita Chapter 2, Verse 26

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