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🌿 Bhagavad Gita – Start Your Spiritual Journey

भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 39 – कर्मयोग का रहस्य और विस्तृत हिन्दी व्याख्या

श्रीमद्भगवद्गीता 2:39 – सांख्य से कर्मयोग तक की सुन्दर यात्रा श्रीमद्भगवद्गीता का दूसरा अध्याय, जिसे सांख्ययोग कहा जाता है, पूरे ग्रन्थ की नींव के समान है। इसी अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण धीरे–धीरे अर्जुन के भीतर छाए हुए मोह, शोक और भ्रम को ज्ञान के प्रकाश से दूर करते हैं। गीता 2:39 वह महत्वपूर्ण श्लोक है जहाँ तक भगवान कृष्ण ने आत्मा–देह, जीवन–मृत्यु और कर्तव्य का सिद्धान्त (Theory) समझाया और अब वे कर्मयोग की व्यावहारिक शिक्षा (Practical) की ओर प्रवेश कराते हैं। इस श्लोक में भगवान स्पष्ट संकेत देते हैं कि – “अब तक मैंने जो कहा, वह सांख्य रूप में था; अब तुम इसे योग रूप में सुनो।” साधारण भाषा में कहें तो जैसे कोई गुरु पहले छात्र को विषय का पूरा सिद्धान्त समझाता है, फिर कहता है – “अब इसे Practically कैसे लागू करना है, ध्यान से सुनो।” यही रूपांतरण 2:39 में दिखाई देता है। संस्कृत श्लोक (गीता 2:39): एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु। बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि...

भगवद गीता 2:63 – क्रोध से भ्रम और विनाश | श्रीकृष्ण का जीवन संदेश

क्रोध के बाद क्या बचता है?
गीता 2:63 बताती है कि क्रोध से भ्रम, भ्रम से स्मृति-नाश और अंततः बुद्धि का पतन होता है।

भगवद गीता 2:63

क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
भगवद गीता 2:63 का दृश्य – कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में रथ पर श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हुए, क्रोध से भ्रम, स्मृति नाश और बुद्धि के पतन का आध्यात्मिक संदेश दर्शाता हुआ चित्र
भगवद गीता 2:63 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि क्रोध से मनुष्य भ्रमित हो जाता है। भ्रम से स्मृति नष्ट होती है और स्मृति के नाश से बुद्धि का पतन होकर जीवन विनाश की ओर बढ़ जाता है।

📖 गीता 2:63 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद

अर्जुन:
हे श्रीकृष्ण, यदि मनुष्य क्रोध में बह जाए तो उसका अंतिम परिणाम क्या होता है?

श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन, क्रोध से मोह उत्पन्न होता है।

अर्जुन:
और मोह से, हे केशव?

श्रीकृष्ण:
मोह से स्मृति-भ्रंश होता है,
स्मृति-भ्रंश से बुद्धि का नाश होता है।

अर्जुन:
यदि बुद्धि नष्ट हो जाए तो मनुष्य का क्या होता है, प्रभु?

श्रीकृष्ण:
जब बुद्धि नष्ट हो जाती है,
तब मनुष्य अपने ही पतन का कारण बन जाता है।


🧠 क्रोध → मोह → स्मृति-भ्रंश → बुद्धि का नाश → पूर्ण पतन

👉 जो मन को नियंत्रित नहीं करता, वह स्वयं को ही खो देता है।

गीता 2:63 – भाग 1 : क्रोध से स्मृति-नाश और बुद्धि का पतन

श्लोक 2:63 का सीधा संदर्भ

गीता 2:62 में श्रीकृष्ण ने मनुष्य के पतन की पूरी मानसिक श्रृंखला को स्पष्ट किया था। अब गीता 2:63 उस श्रृंखला के अंतिम और सबसे विनाशकारी परिणाम को सामने रखता है। यह श्लोक बताता है कि जब मनुष्य क्रोध में डूब जाता है, तो उसका केवल व्यवहार ही नहीं, उसकी स्मृति, बुद्धि और अस्तित्व तक नष्ट होने लगते हैं।

श्रीकृष्ण अर्जुन को चेतावनी देते हैं कि क्रोध कोई साधारण भावना नहीं, बल्कि आत्म-विनाश की शुरुआत है।

“क्रोध केवल क्रिया नहीं बदलता, वह व्यक्ति को ही बदल देता है।”


क्रोध से स्मृति-नाश का अर्थ

स्मृति केवल याददाश्त नहीं होती। स्मृति में व्यक्ति के मूल्य, उसके अनुभव, उसके जीवन के निर्णय और उसकी आत्म-पहचान शामिल होती है।

गीता 2:63 बताती है कि क्रोध की अवस्था में व्यक्ति अपने ही मूल सिद्धांतों को भूल जाता है। वह वही काम कर बैठता है जो सामान्य अवस्था में वह स्वयं कभी स्वीकार नहीं करता।

“क्रोध में व्यक्ति अपना ही परिचय भूल जाता है।”


स्मृति-नाश क्यों खतरनाक है?

स्मृति ही विवेक की नींव होती है। जब स्मृति नष्ट होती है, तो विवेक टिक नहीं पाता। व्यक्ति अपने पिछले अनुभवों से कोई सीख नहीं ले पाता।

यही कारण है कि क्रोध में लिया गया निर्णय अक्सर बाद में पछतावे का कारण बनता है।

  • स्मृति → विवेक का आधार
  • विवेक → सही निर्णय
  • स्मृति-नाश → निर्णय-विनाश

अर्जुन के जीवन में क्रोध का खतरा

अर्जुन युद्धभूमि में केवल दुखी नहीं था, उसके भीतर आक्रोश और असंतोष भी पनप रहा था। यदि वह उस अवस्था में निर्णय ले लेता, तो उसका विवेक पूरी तरह ढँक जाता।

श्रीकृष्ण अर्जुन को समय रहते रोकते हैं और बताते हैं कि भावनाओं के आवेग में लिया गया निर्णय धर्म से दूर ले जाता है।


आधुनिक जीवन में स्मृति-नाश

आज के समय में क्रोध और तनाव के कारण लोग अपने ही सिद्धांतों को भूल जाते हैं। वे वही व्यवहार करने लगते हैं जिनकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की होती।

कार्यस्थल, परिवार और रिश्तों में टूटन का सबसे बड़ा कारण क्रोध से उत्पन्न स्मृति-नाश है।

“Anger erases wisdom.”


क्रोध के प्रारंभिक संकेत

  • अत्यधिक प्रतिक्रिया
  • दूसरों को दोष देना
  • अपनी गलती न देख पाना
  • तुरंत निर्णय लेने की इच्छा

ये संकेत बताते हैं कि स्मृति-नाश की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।


भाग 1 का सार

  • क्रोध स्मृति-नाश का कारण बनता है
  • स्मृति-नाश से विवेक नष्ट होता है
  • विवेक-नाश से आत्म-पतन होता है
  • क्रोध आत्म-विनाश का द्वार है

👉 गीता 2:63 का यह पहला भाग हमें चेतावनी देता है कि क्रोध को हल्के में लेना सबसे बड़ी भूल है।

गीता 2:63 – भाग 2 : स्मृति-नाश से विवेक-नाश की प्रक्रिया

स्मृति-नाश के बाद क्या घटता है?

गीता 2:63 में श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि क्रोध के कारण जब स्मृति नष्ट होती है, तो उसका अगला और अनिवार्य परिणाम विवेक-नाश होता है। स्मृति वह आधार है जिस पर विवेक खड़ा रहता है। जब आधार ही डगमगा जाए, तो विवेक टिक नहीं पाता।

स्मृति-नाश का अर्थ केवल याददाश्त का कमजोर होना नहीं, बल्कि अपने मूल्यों, अनुभवों और आत्म-अनुशासन को भूल जाना है। यहीं से विवेक अंधकार में चला जाता है।

“जहाँ स्मृति टूटी, वहीं विवेक डगमगाया।”


विवेक क्या है और क्यों आवश्यक है?

विवेक वह आंतरिक शक्ति है जो सही और गलत, हित और अहित, तात्कालिक सुख और दीर्घकालिक कल्याण के बीच भेद करना सिखाती है।

विवेक स्मृति से पोषण पाता है— पिछले अनुभव, सीखी हुई शिक्षाएँ, और जीवन के मूल्य विवेक को दिशा देते हैं। जब स्मृति भ्रमित होती है, तो विवेक अपनी शक्ति खो देता है।

  • स्मृति → अनुभवों का संग्रह
  • विवेक → उन अनुभवों से निर्णय

विवेक-नाश की पहचान

विवेक-नाश कोई अचानक घटना नहीं, बल्कि एक स्पष्ट मानसिक अवस्था है। इसके कुछ संकेत होते हैं:

  • जल्दबाज़ी में निर्णय लेना
  • परिणामों की अनदेखी
  • अपनी गलती स्वीकार न कर पाना
  • भावनाओं को तर्क मान लेना

इन संकेतों का अर्थ है कि विवेक अब नेतृत्व नहीं कर रहा, बल्कि भावनाएँ कर रही हैं।

“जब भावना तर्क बन जाए, विवेक विदा ले लेता है।”


अर्जुन के जीवन में विवेक-नाश का खतरा

अर्जुन युद्धभूमि में अपने कर्तव्य, प्रतिज्ञा और दीर्घकालिक परिणामों को लगभग भूल चुका था। उसका ध्यान केवल वर्तमान दुःख और भावनाओं पर था।

यदि श्रीकृष्ण उसे न रोकते, तो अर्जुन का निर्णय विवेक से नहीं, भावनात्मक आवेग से होता। यही विवेक-नाश का वास्तविक रूप है।


आधुनिक जीवन में विवेक-नाश

आज के युग में विवेक-नाश बहुत सामान्य हो गया है। सोशल मीडिया की प्रतिक्रियाएँ, तात्कालिक लाभ की सोच, और तुलना का दबाव विवेक को कमजोर कर देते हैं।

लोग अक्सर जानते हुए भी गलत निर्णय लेते हैं, क्योंकि भावनाएँ उस क्षण विवेक पर हावी हो जाती हैं।

“Information is plenty, wisdom is rare.”


विवेक-नाश से बचने के उपाय

गीता 2:63 का उद्देश्य केवल चेतावनी देना नहीं, बल्कि बचाव का मार्ग दिखाना भी है। कुछ व्यावहारिक उपाय हैं:

  • क्रोध के क्षण में निर्णय टालना
  • अपने मूल्यों को बार-बार स्मरण करना
  • भावनाओं को तथ्य से अलग करना
  • अनुभवी व्यक्ति से परामर्श लेना

ये उपाय स्मृति को स्थिर रखते हैं और विवेक की रक्षा करते हैं।


विवेक-नाश और आत्म-पतन

विवेक-नाश के बाद मनुष्य अपने ही जीवन के विरुद्ध कार्य करने लगता है। वह वही करता है जो उसके दीर्घकालिक हित को नुकसान पहुँचाता है। यही अवस्था आत्म-पतन कहलाती है।

श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि आत्मिक पतन का कारण बाहरी शत्रु नहीं, बल्कि विवेक का नष्ट होना है।

“Self-destruction begins when wisdom ends.”


भाग 2 का सार

  • स्मृति-नाश से विवेक-नाश होता है
  • विवेक निर्णय की आत्मा है
  • भावनात्मक आवेग विवेक को दबाता है
  • सजगता से विवेक की रक्षा संभव है

👉 गीता 2:63 का यह भाग हमें सिखाता है कि विवेक की रक्षा आत्म-सुरक्षा के समान है।

गीता 2:63 – भाग 3 : विवेक-नाश से आत्म-पतन और जीवन का विघटन

विवेक-नाश के बाद जीवन में क्या होता है?

गीता 2:63 में श्रीकृष्ण जिस क्रम को समझा रहे हैं, उसका सबसे गंभीर चरण है विवेक-नाश। जब विवेक नष्ट हो जाता है, तो मनुष्य सही और गलत का अंतर खो बैठता है। अब उसके निर्णय न तो धर्म पर आधारित होते हैं, न ही दीर्घकालिक हित पर।

इस अवस्था में व्यक्ति क्षणिक भावनाओं और आवेगों के अनुसार अपने जीवन को चलाने लगता है। यहीं से आत्म-पतन की वास्तविक शुरुआत होती है।

“विवेक गया, तो जीवन दिशा-हीन हो गया।”


आत्म-पतन का अर्थ क्या है?

आत्म-पतन का अर्थ केवल नैतिक गिरावट नहीं, बल्कि अपने ही मूल स्वरूप से दूर हो जाना है। व्यक्ति वह नहीं रह जाता जो वह वास्तव में होना चाहता था।

वह अपने सिद्धांतों से समझौता करता है, अपने मूल्यों को त्याग देता है और धीरे-धीरे अपने ही आत्म-सम्मान को खो देता है।

“आत्म-पतन तब शुरू होता है, जब व्यक्ति अपने मूल्यों से समझौता करता है।”


विवेक-नाश और निर्णयों का पतन

विवेक-नाश का सीधा प्रभाव निर्णय-क्षमता पर पड़ता है। व्यक्ति अब यह नहीं देख पाता कि उसके निर्णय भविष्य में कौन-सा परिणाम लाएँगे।

वह तात्कालिक सुख, आवेग या दबाव में ऐसे निर्णय ले लेता है जो उसके जीवन को धीरे-धीरे अस्थिर बना देते हैं।

  • जल्दबाज़ी में निर्णय
  • परिणामों की अनदेखी
  • बार-बार पछतावा
  • आत्म-विश्वास में गिरावट

अर्जुन के संदर्भ में आत्म-पतन की आशंका

अर्जुन यदि उस अवस्था में युद्ध से पीछे हट जाता, तो उसका निर्णय धर्म के अनुरूप नहीं होता। यह निर्णय आगे चलकर उसके आत्म-सम्मान और जीवन-उद्देश्य को नष्ट कर सकता था।

श्रीकृष्ण अर्जुन को यही दिखा रहे हैं कि भावनात्मक निर्णय तुरंत राहत तो देते हैं, पर दीर्घकाल में गहरा आत्म-पतन लाते हैं।

“कर्तव्य से पलायन आत्म-पतन का पहला कदम है।”


आधुनिक जीवन में आत्म-पतन

आज के समय में आत्म-पतन अक्सर धीरे-धीरे होता है। लोग छोटे-छोटे समझौते करते हैं — सिद्धांतों से, ईमानदारी से, और आत्म-अनुशासन से।

इन समझौतों का परिणाम यह होता है कि मनुष्य बाहरी रूप से सफल दिख सकता है, पर भीतर से खोखला और असंतुष्ट हो जाता है।

“Success without values leads to inner collapse.”


आत्म-पतन के संकेत

  • अपने ही निर्णयों से असंतोष
  • बार-बार आत्म-ग्लानि
  • क्रोध और चिड़चिड़ापन
  • जीवन में अर्थ की कमी

ये संकेत बताते हैं कि विवेक-नाश के कारण आत्म-पतन की प्रक्रिया चल रही है।


क्या आत्म-पतन अपरिवर्तनीय है?

गीता 2:63 निराशा नहीं देती। यह श्लोक चेतावनी देता है, पर साथ ही संकेत करता है कि यदि समय रहते सजगता लौट आए, तो आत्म-पतन रोका जा सकता है।

जैसे ही व्यक्ति अपने विवेक के पतन को पहचान लेता है, वहीं से उत्थान की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

“Awareness is the first step to recovery.”


भाग 3 का सार

  • विवेक-नाश से आत्म-पतन होता है
  • आत्म-पतन जीवन को दिशाहीन बनाता है
  • भावनात्मक निर्णय सबसे खतरनाक होते हैं
  • सजगता से पतन रोका जा सकता है

👉 गीता 2:63 का यह भाग हमें सिखाता है कि विवेक की रक्षा करना अपने पूरे जीवन की रक्षा करना है।

गीता 2:63 – भाग 4 : पतन से उबरने का मार्ग और विवेक की पुनर्स्थापना

क्या पतन के बाद भी सुधार संभव है?

गीता 2:63 केवल पतन का चित्रण नहीं करती, बल्कि यह संकेत भी देती है कि पतन के बाद भी मनुष्य के पास उबरने और सुधरने का अवसर रहता है। यदि पतन अपरिवर्तनीय होता, तो गीता का उपदेश निरर्थक हो जाता।

श्रीकृष्ण का उद्देश्य अर्जुन को डराना नहीं, बल्कि समय रहते विवेक की ओर लौटने का मार्ग दिखाना है।

“जहाँ चेतना लौटती है, वहीं से सुधार शुरू होता है।”


विवेक की पुनर्स्थापना कैसे होती है?

विवेक की पुनर्स्थापना का पहला चरण है — स्वीकार। जब व्यक्ति यह स्वीकार कर लेता है कि उसके निर्णय आवेग या क्रोध से प्रेरित थे, तभी विवेक के लौटने की संभावना बनती है।

इसके बाद स्मृति का पुनः जागरण होता है — अपने मूल्यों, अपने अनुभवों और अपने जीवन-उद्देश्य को याद करना।

  • स्वीकार → जागरूकता
  • जागरूकता → स्मृति का लौटना
  • स्मृति → विवेक की वापसी

सजगता का महत्व

गीता 2:63 अप्रत्यक्ष रूप से सजगता (Awareness) का महत्व सिखाती है। जब मनुष्य अपने विचारों, भावनाओं और प्रतिक्रियाओं को देखने लगता है, तो वे उसे नियंत्रित नहीं कर पातीं।

सजगता का अर्थ है — क्रोध के क्षण में भी अपने भीतर घट रही प्रक्रिया को देख पाना। यही देखने की क्षमता पतन को रोकती है।

“जो देख सकता है, वह डूबता नहीं।”


अर्जुन के लिए यह शिक्षा

अर्जुन युद्धभूमि में भावनाओं के प्रवाह में बह रहा था। यदि वह उसी अवस्था में निर्णय ले लेता, तो उसका विवेक पूर्णतः नष्ट हो जाता।

श्रीकृष्ण अर्जुन को रुककर सोचने, सुनने और समझने का अवसर देते हैं। यही ठहराव अर्जुन के विवेक को पुनः सक्रिय करता है।

“रुकना हार नहीं, विवेक की शुरुआत है।”


आधुनिक जीवन में विवेक की वापसी

आज के जीवन में लोग अक्सर यह मान लेते हैं कि एक बार गलती हो गई, तो अब सुधार संभव नहीं। पर गीता 2:63 इस धारणा को तोड़ती है।

यदि व्यक्ति अपने व्यवहार के कारणों को समझ ले, तो वह भविष्य में वही गलती दोहराने से बच सकता है। यही विवेक की वास्तविक वापसी है।

ध्यान, आत्म-निरीक्षण, और शांत संवाद विवेक को पुनः स्थापित करने के आधुनिक साधन हैं।


पतन को दोहराने से कैसे बचें?

गीता 2:63 के अनुसार पतन को दोहराने से बचने के लिए कुछ आदतों का विकास आवश्यक है:

  • भावनाओं पर तुरंत प्रतिक्रिया न देना
  • निर्णय से पहले ठहराव रखना
  • अपने मूल्यों को स्पष्ट रखना
  • आत्म-निरीक्षण की आदत

ये आदतें विवेक को मजबूत बनाती हैं और भविष्य के पतन से रक्षा करती हैं।


पतन और उत्थान का अंतर

पतन तब होता है जब व्यक्ति अपनी भावनाओं का दास बन जाता है। उत्थान तब होता है जब वही व्यक्ति उन भावनाओं को समझकर उनसे ऊपर उठने लगता है।

गीता 2:63 का संदेश है कि मनुष्य में दोनों संभावनाएँ हमेशा मौजूद रहती हैं। चयन विवेक का है।

“वही परिस्थिति किसी को गिराती है, किसी को उठाती है।”


भाग 4 का सार

  • पतन के बाद भी सुधार संभव है
  • स्वीकार और सजगता से विवेक लौटता है
  • ठहराव विवेक की पुनर्स्थापना करता है
  • आत्म-निरीक्षण पतन से बचाव है

👉 गीता 2:63 का यह भाग हमें आशा देता है कि विवेक कभी स्थायी रूप से नष्ट नहीं होता, यदि हम समय रहते सजग हो जाएँ।

गीता 2:63 – भाग 5 (अंतिम) : आत्म-पतन से आत्म-उत्थान और स्थिर बुद्धि

श्लोक 2:63 का समग्र संदेश

गीता 2:63 पतन की प्रक्रिया का अंत नहीं, बल्कि चेतना का आरंभ है। श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि क्रोध → स्मृति-नाश → विवेक-नाश → आत्म-पतन यह श्रृंखला यदि समझ में आ जाए, तो उसी क्षण उससे बाहर निकलने का मार्ग भी खुल जाता है।

यह श्लोक हमें दोषारोपण से हटाकर आत्म-निरीक्षण की ओर ले जाता है। पतन किसी बाहरी घटना का परिणाम नहीं, बल्कि आंतरिक असजगता का फल है।

“समस्या बाहर नहीं, समाधान भीतर है।”


आत्म-उत्थान कहाँ से शुरू होता है?

आत्म-उत्थान का पहला चरण है — सजग स्वीकार। जब व्यक्ति यह स्वीकार कर लेता है कि उसके निर्णय आवेग और क्रोध से प्रेरित थे, तभी विवेक पुनः सक्रिय होने लगता है।

स्वीकार के बाद स्मृति लौटती है — अपने मूल्यों, अनुभवों और उद्देश्य की स्मृति। यहीं से बुद्धि फिर से स्पष्ट होने लगती है।

  • स्वीकार → स्मृति का जागरण
  • स्मृति → विवेक की वापसी
  • विवेक → आत्म-उत्थान

स्थित बुद्धि की स्थापना

स्थित बुद्धि वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति भावनाओं से संचालित नहीं, विवेक से संचालित होता है। यह कोई भावनाशून्यता नहीं, बल्कि भावनाओं के बीच संतुलन है।

गीता 2:63 का अंतिम संकेत यही है कि यदि विवेक को पुनः स्थापित कर लिया जाए, तो पतन स्थायी नहीं रहता।

“स्थिर बुद्धि अस्थिर परिस्थितियों में भी स्थिर रहती है।”


अर्जुन का निर्णायक परिवर्तन

अर्जुन का परिवर्तन तभी शुरू होता है जब वह अपने भावनात्मक प्रवाह को पहचानता है। श्रीकृष्ण का उपदेश उसे दोषी नहीं ठहराता, बल्कि जागरूक बनाता है।

यही जागरूकता आगे चलकर अर्जुन को कर्तव्य, धर्म और स्थिर बुद्धि की ओर ले जाती है। गीता 2:63 इस परिवर्तन की मनोवैज्ञानिक नींव रखता है।


आधुनिक जीवन में गीता 2:63

आज के जीवन में क्रोध, तनाव और जल्दबाज़ी आम समस्याएँ बन गई हैं। लोग अक्सर जानते हुए भी गलत निर्णय ले लेते हैं, क्योंकि उस क्षण विवेक ढँक जाता है।

गीता 2:63 हमें सिखाती है कि निर्णय से पहले ठहरना, भावनाओं को देखना और स्मृति को जागृत रखना आधुनिक जीवन की अनिवार्य कला है।

“Pause is the power of wisdom.”


व्यावहारिक जीवन के लिए सूत्र

  • क्रोध के क्षण में निर्णय न लें
  • अपने मूल्यों को लिखित रखें
  • दैनिक आत्म-निरीक्षण करें
  • परिणामों को दीर्घकालिक दृष्टि से देखें

ये सूत्र विवेक को सशक्त रखते हैं और आत्म-पतन से रक्षा करते हैं।


पतन और प्रगति का चयन

गीता 2:63 का अंतिम संदेश यह है कि मनुष्य के पास हर क्षण दो विकल्प होते हैं — भावनाओं के पीछे बहना या विवेक के साथ आगे बढ़ना।

एक ही परिस्थिति किसी को गिरा सकती है और उसी परिस्थिति में कोई दूसरा व्यक्ति उठ सकता है। चयन मनुष्य का है।

“Choice defines destiny.”


गीता 2:63 की अंतिम सीख

गीता 2:63 हमें भयभीत नहीं करती, बल्कि सशक्त बनाती है। यह बताती है कि विवेक का नाश सबसे बड़ा खतरा है, और विवेक की वापसी सबसे बड़ी विजय।

जो व्यक्ति इस श्लोक को समझ लेता है, वह अपने जीवन में पतन की श्रृंखला को समय रहते तोड़ सकता है।

“विवेक की रक्षा ही जीवन की रक्षा है।”


भाग 5 (अंतिम) का सार

  • पतन असजगता से होता है
  • सजगता से विवेक लौटता है
  • विवेक से आत्म-उत्थान संभव है
  • स्थित बुद्धि ही स्थायी समाधान है

👉 इसी के साथ गीता 2:63 पूर्ण होती है।

📌 भगवद गीता 2:63 – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

📘 गीता 2:63 में भगवान श्रीकृष्ण क्या समझाते हैं

गीता 2:63 में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि क्रोध से मोह उत्पन्न होता है, मोह से स्मृति भ्रमित होती है, स्मृति भ्रमित होने से बुद्धि नष्ट होती है और बुद्धि नष्ट होने पर मनुष्य का पतन हो जाता है।

📘 गीता 2:63 का मुख्य संदेश क्या है

इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि क्रोध और मोह मनुष्य की सोचने-समझने की शक्ति को नष्ट कर देते हैं।

📘 गीता 2:63 में स्मृति भ्रंश का क्या अर्थ है

स्मृति भ्रंश का अर्थ है सही-गलत का ज्ञान भूल जाना और अपने जीवन मूल्यों से दूर हो जाना।

📘 गीता 2:63 का आज के जीवन में क्या महत्व है

आज के समय में यह श्लोक सिखाता है कि क्रोध और भावनात्मक असंतुलन गलत निर्णयों का कारण बनते हैं।

📘 गीता 2:63 के अनुसार पतन से कैसे बचा जाए

आत्मसंयम, धैर्य, ध्यान और विवेकपूर्ण सोच अपनाकर मनुष्य अपने पतन से बच सकता है।

Disclaimer:

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Bhagavad Gita 2:63 — From Desire to Destruction

Krishna explains the chain reaction of mental collapse. When desire is obstructed, it turns into anger. Anger leads to confusion, loss of memory, destruction of judgment, and finally self-destruction.

This verse maps emotional breakdown with precision. Once intelligence is clouded, decisions become harmful and impulsive.

Gita 2:63 warns that unchecked emotions can destroy even a capable person.

FAQ

What happens when desire is blocked?
Anger arises.

Why is anger dangerous?
It destroys judgment.

What is lost first?
Memory and clarity.

Final outcome?
Self-destruction.

Main warning?
Control emotions early.

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