कभी-कभी हम काम को बोझ समझने लगते हैं। हमें लगता है कि अगर जिम्मेदारियाँ कम हो जाएँ, तो शायद जीवन सरल और शांत हो जाएगा।
लेकिन क्या बिना काम किए वास्तव में संतोष मिलता है? भगवद गीता 3:8 इसी भ्रम को व्यवहारिक सच्चाई से तोड़ती है।
भगवद गीता 3:8 – मूल श्लोक
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः। शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥
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| नियत कर्म करना श्रेष्ठ है, कर्म के बिना जीवन भी संभव नहीं। |
📖 गीता 3:8 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद
श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन,
तू अपने नियत कर्म को कर।
कर्म न करने की अपेक्षा
कर्म करना ही श्रेष्ठ है।
अर्जुन:
हे प्रभु,
क्या कर्म न करने से
हानि होती है?
श्रीकृष्ण:
हाँ अर्जुन।
कर्म के बिना
तो शरीर का निर्वाह भी
संभव नहीं है।
अर्जुन:
तो क्या कर्तव्य से
कभी पीछे नहीं हटना चाहिए?
श्रीकृष्ण:
अर्जुन,
आसक्ति रहित कर्तव्य कर्म
ही जीवन को
व्यवस्थित और
पवित्र बनाता है।
🛠️ नियत कर्म करो — कर्म के बिना जीवन भी संभव नहीं
👉 कर्तव्य से भागना नहीं, कर्तव्य को योग बनाना ही गीता का संदेश है।
सरल अर्थ
अपने नियत कर्तव्य का पालन करो, क्योंकि कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है। कर्म के बिना तो शरीर का निर्वाह भी संभव नहीं है।
श्रीकृष्ण यहाँ क्या स्पष्ट कर रहे हैं?
गीता 3:8 किसी को ज़बरदस्ती काम में नहीं धकेलती, बल्कि जीवन की वास्तविकता दिखाती है।
काम केवल आर्थिक आवश्यकता नहीं है, यह आत्म-सम्मान और संतुलन से भी जुड़ा है।
जब व्यक्ति अपने कर्तव्य से भागता है, तो वह केवल जिम्मेदारियाँ नहीं छोड़ता, वह अपने भीतर की स्थिरता भी खो देता है।
आज के जीवन में यह शिक्षा क्यों महत्वपूर्ण है?
आज बहुत से लोग काम से थककर कहते हैं — बस अब कुछ नहीं करना।
लेकिन थोड़े समय बाद वे स्वयं को उद्देश्यहीन, असंतुष्ट और खाली महसूस करने लगते हैं।
गीता 3:8 हमें बताती है कि नियत कर्म जीवन को दिशा देता है।
एक वास्तविक जीवन उदाहरण
मान लीजिए कोई व्यक्ति नौकरी छोड़ देता है सिर्फ इसलिए कि उसे काम का दबाव पसंद नहीं।
शुरुआत में उसे आज़ादी महसूस होती है, लेकिन कुछ महीनों बाद उसका आत्मविश्वास और दिनचर्या दोनों कमजोर पड़ने लगते हैं।
क्योंकि काम केवल आय नहीं, बल्कि पहचान और संतुलन भी देता है।
यही बात गीता 3:8 समझाती है — कर्म जीवन का आधार है।
“नियत कर्म” का सही अर्थ
नियत कर्म का अर्थ हर काम करना नहीं, बल्कि वह काम करना है जो आपकी स्थिति और जिम्मेदारी से जुड़ा है।
जब व्यक्ति अपने नियत कर्म को ईमानदारी से करता है, तो वह मन को स्थिर रखता है।
यही कर्मयोग की व्यावहारिक शुरुआत है।
अर्जुन के संदर्भ में यह श्लोक
अर्जुन युद्ध से पीछे हटना चाहता था।
श्रीकृष्ण उसे यह नहीं कह रहे कि युद्ध आसान है, बल्कि यह समझा रहे हैं कि उसका कर्तव्य टालना उसे भीतर से कमजोर करेगा।
अर्जुन को कर्म से भागना नहीं, कर्म में संतुलन सीखना था।
निष्कर्ष: कर्म जीवन की रीढ़ है
गीता 3:8 हमें यह सिखाती है कि कर्म कोई दंड नहीं, बल्कि जीवन की आवश्यकता है।
जब कर्म नियत और ईमानदार होता है, तो वही कर्म जीवन को अर्थ देता है।
काम से भागना समाधान नहीं, काम को समझना ही मार्ग है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न – गीता 3:8❓️
भगवद गीता 3:8 का मुख्य संदेश क्या है?
यह श्लोक सिखाता है कि मनुष्य को अपना नियत कर्म अवश्य करना चाहिए, क्योंकि कर्म के बिना जीवन संभव नहीं है।
नियत कर्म का क्या अर्थ है?
नियत कर्म का अर्थ है अपने स्वभाव, भूमिका और परिस्थितियों के अनुसार कर्तव्य का पालन करना।
क्या कर्म न करने से आध्यात्मिक उन्नति होती है?
नहीं, गीता 3:8 के अनुसार कर्म का त्याग नहीं, बल्कि सही भावना से कर्म करना आवश्यक है।
आज के जीवन में गीता 3:8 कैसे उपयोगी है?
यह श्लोक सिखाता है कि जिम्मेदारियों से भागने के बजाय, उन्हें समझदारी और संतुलन के साथ निभाना चाहिए।
यह लेख भगवद गीता के श्लोक 3:8 की जीवनोपयोगी एवं दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। यह सामग्री केवल शैक्षिक और आध्यात्मिक उद्देश्य से है और किसी भी प्रकार की पेशेवर सलाह का विकल्प नहीं है।
Bhagavad Gita 2:8 – Arjuna Admits He Cannot Overcome His Grief
What happens when success, power, and comfort fail to remove inner pain? Bhagavad Gita 2:8 captures a deeply human moment. Arjuna admits that even if he gains wealth, a powerful kingdom, or complete victory, his inner sorrow would not disappear.
This verse reveals the depth of Arjuna’s emotional crisis. He realizes that external solutions cannot heal internal suffering. No achievement, pleasure, or authority can remove grief that arises from confusion and attachment. This realization marks a turning point in Arjuna’s journey.
Arjuna openly confesses his helplessness. He no longer tries to justify his emotions or hide behind logic. He accepts that his intellect cannot find a solution to his inner turmoil. This honesty makes him ready to receive true guidance.
Bhagavad Gita 2:8 teaches a powerful lesson. Real problems are often internal, not external. People frequently believe that happiness will come after success, recognition, or comfort. But Arjuna’s words show that without inner clarity, outer gains cannot bring peace.
This verse is deeply relevant today. Many people feel empty or anxious even after achieving their goals. Bhagavad Gita 2:8 reminds us that lasting peace begins when we acknowledge our inner confusion and seek wisdom beyond material solutions. True healing starts with humility and awareness.
Frequently Asked Questions
He expresses that no external success can remove his inner grief and confusion.
It shows honest acceptance of inner pain and the limits of material solutions.
That happiness cannot come from external achievements alone.
By making him humble and open to receiving higher wisdom.
It reflects modern emotional struggles where success does not guarantee inner peace.

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