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Wednesday, October 15, 2025

भगवद् गीता अध्याय 1 श्लोक 46

           भगवद् गीता अध्याय 1 श्लोक 46

संजय उवाच ।
एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥ 1.46 ॥
                                 गीता 1:46

हिन्दी अनुवाद :
संजय ने कहा — इस प्रकार कहकर शोक और करुणा से व्याकुल चित्त वाले अर्जुन ने रणभूमि में अपना धनुष-बाण त्याग दिया और रथ के पिछले भाग में बैठ गए।

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शब्दार्थ:

एवम् उक्त्वा — इस प्रकार कहकर

अर्जुनः — अर्जुन ने

संख्ये — युद्धभूमि में

रथ-उपस्थे — रथ के पिछले भाग में

उपाविशत् — बैठ गए

विसृज्य — त्याग कर

स-शरं चापं — बाण सहित धनुष को

शोक-संविग्न-मानसः — शोक से व्याकुल चित्त वाला

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भावार्थ (विस्तार से):
जब अर्जुन ने अपने स्वजनों को मारने की इच्छा से इंकार कर दिया और करुणा से भर गए, तब वे अत्यन्त दुःख और शोक से व्याकुल हो उठे। उन्होंने अपना धनुष-बाण नीचे रख दिया और युद्ध न करने का निश्चय कर लिया।
यह स्थिति अर्जुन के मोह (भ्रम) की चरम अवस्था को दर्शाती है — जहाँ बुद्धि और कर्तव्य का विवेक खो जाता है, और व्यक्ति अपने धर्म के मार्ग से विचलित हो जाता है।

भगवान श्रीकृष्ण ने इसी अवस्था में अर्जुन को ज्ञान देकर कर्मयोग और आत्मबोध का उपदेश देना प्रारंभ किया — जो अगले अध्याय (द्वितीय अध्याय) से आरंभ होता है।

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सीख:

यह श्लोक बताता है कि जब मन शोक, मोह और करुणा में डूब जाता है, तब व्यक्ति अपने कर्तव्य से विमुख हो जाता है। इसलिए जीवन में संतुलित मन और आत्मज्ञान का होना अत्यंत आवश्यक है।




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