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BhagwatGeetaBySun.com एक आध्यात्मिक एवं जीवन-मार्गदर्शन वेबसाइट है, जहाँ भगवद गीता के श्लोकों को सरल भाषा में समझाकर उन्हें आज के जीवन की वास्तविक समस्याओं से जोड़ा जाता है।

  • गीता के श्लोकों का व्यावहारिक अर्थ
  • तनाव, क्रोध और चिंता से मुक्ति
  • मन को शांत और स्थिर रखने की कला
  • कर्मयोग द्वारा सही निर्णय

What is BhagwatGeetaBySun.com?

BhagwatGeetaBySun.com is a spiritual and life-guidance website that explains the wisdom of the Bhagavad Gita in a simple, practical, and modern context to help people gain clarity, peace, and balance in life.

भगवद गीता 2:70 – इच्छाओं के बीच भी शांति कैसे संभव है

क्या आपने कभी देखा है कि कुछ लोग कितनी ही बातें सुन लें, कितनी ही जिम्मेदारियाँ उठा लें, फिर भी भीतर से शांत रहते हैं? जबकि कुछ लोग थोड़ी-सी बात पर भी अंदर से भर जाते हैं और टूटने लगते हैं।

भगवद गीता 2:70 इसी अंतर को बहुत सुंदर उदाहरण से समझाती है। यह श्लोक बताता है कि जिस व्यक्ति का मन विशाल और स्थिर होता है, वह इच्छाओं की बाढ़ से भी विचलित नहीं होता।


भगवद गीता 2:70 – मूल श्लोक

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥
भगवद गीता 2:70 का प्रतीकात्मक दृश्य जिसमें श्रीकृष्ण शांत भाव में अर्जुन को समझा रहे हैं, चारों ओर इच्छाओं का प्रवाह दिखाया गया है लेकिन मन स्थिर और अडिग बना हुआ है
जिस प्रकार नदियाँ समुद्र में मिलती रहती हैं फिर भी समुद्र स्थिर रहता है,
उसी प्रकार इच्छाओं के बीच जो शांत रहता है, वही सच्ची शांति पाता है

📖 गीता 2:70 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद

अर्जुन:
हे श्रीकृष्ण, इच्छाओं से भरा संसार मनुष्य को अशांत क्यों कर देता है?

श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन, जैसे अनेक नदियाँ समुद्र में प्रवेश करती हैं, फिर भी समुद्र अचल और शांत रहता है।

अर्जुन:
क्या ज्ञानी भी उसी समुद्र के समान होता है, प्रभु?

श्रीकृष्ण:
हाँ अर्जुन। जिस मनुष्य में इच्छाएँ आती तो हैं, परंतु उसे विचलित नहीं करतीं, वही सच्ची शांति को प्राप्त करता है।

अर्जुन:
और जो इच्छाओं के पीछे दौड़ता है?

श्रीकृष्ण:
जो इच्छाओं को ही जीवन का लक्ष्य बना लेता है, वह कभी संतोष नहीं पा सकता। इच्छा-रहित नहीं, बल्कि इच्छा-नियंत्रित जीवन ही शांति का मार्ग है।


🌊 इच्छाएँ आएँ, पर मन न डगमगाए — यही स्थिर शांति है

👉 जो समुद्र जैसा बन गया, वही जीवन की हलचल में भी शांत रहा।


सरल अर्थ

जिस प्रकार नदियाँ समुद्र में मिलती रहती हैं फिर भी समुद्र अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता, उसी प्रकार जिस व्यक्ति में अनेक इच्छाएँ प्रवेश करती हैं पर उसका मन स्थिर रहता है, वही सच्ची शांति को प्राप्त करता है।


यह श्लोक वास्तव में क्या सिखाता है?

गीता 2:70 इच्छाओं को पूरी तरह मिटाने की बात नहीं करती। यह श्लोक यह समझाता है कि इच्छाएँ समस्या नहीं हैं — इच्छाओं से भर जाना समस्या है।

जब मन छोटा होता है, तो थोड़ी-सी चाह भी उसे भर देती है। लेकिन जब मन विशाल होता है, तो इच्छाएँ आती-जाती रहती हैं, मन अपनी गहराई नहीं खोता।

समुद्र का उदाहरण यही सिखाता है — नदियाँ आती हैं, लेकिन समुद्र डगमगाता नहीं।


एक वास्तविक जीवन उदाहरण

मान लीजिए दो लोग एक ही कंपनी में काम करते हैं। दोनों मेहनती हैं, दोनों के सामने मौके भी आते हैं।

पहला व्यक्ति हर प्रमोशन, हर तुलना, हर अपेक्षा को अपने मन में भर लेता है। अगर कुछ नहीं मिला, तो भीतर अशांति फैल जाती है।

दूसरा व्यक्ति अपना काम ईमानदारी से करता है, पर हर इच्छा को अपनी शांति पर हावी नहीं होने देता। वह जानता है — हर चीज़ मिलना जरूरी नहीं, पर भीतर संतुलन जरूरी है।

दूसरा व्यक्ति समुद्र की तरह है — इच्छाएँ आती हैं, पर मन की सीमा नहीं तोड़तीं।


इच्छाएँ और मानसिक क्षमता

इस श्लोक की गहराई यह है कि यह मन की क्षमता (mental capacity) की बात करता है।

अगर मन कमजोर है, तो इच्छाएँ बोझ बन जाती हैं। अगर मन स्थिर है, तो वही इच्छाएँ प्रेरणा बन सकती हैं।

गीता 2:70 हमें सिखाती है कि मन को बड़ा बनाओ, इच्छाएँ अपने आप छोटी हो जाएँगी।


अर्जुन के लिए यह श्लोक क्यों महत्वपूर्ण था?

अर्जुन युद्धभूमि में अपेक्षाओं और भावनाओं से भर चुका था। कर्तव्य, करुणा और भय — सब एक साथ मन में उमड़ रहे थे।

श्रीकृष्ण अर्जुन को यह दिखा रहे हैं कि यदि मन स्थिर और विशाल हो जाए, तो कोई भी भावना उसे डुबो नहीं सकती।

यह श्लोक अर्जुन को भीतर से मजबूत बनने की शिक्षा देता है।


निष्कर्ष: मन समुद्र जैसा बनाइए

गीता 2:70 हमें यह नहीं कहती कि इच्छाएँ छोड़ दो। यह कहती है — मन इतना विशाल बनाओ कि इच्छाएँ आपको डगमगा न सकें।

जब मन समुद्र जैसा हो जाता है, तो सुख-दुःख, लाभ-हानि, सब अपनी जगह आकर शांत हो जाते हैं।

जो भीतर से विशाल है, वही सच्ची शांति को जानता है।

📘 भगवद गीता 2:70 – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

🕉️ गीता 2:70 में श्रीकृष्ण क्या सिखाते हैं?
इस श्लोक में श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि जैसे अनेक नदियाँ समुद्र में मिलकर भी उसे विचलित नहीं करतीं, वैसे ही ज्ञानी मनुष्य इच्छाओं के बीच रहते हुए भी शांत रहता है।

🌊 समुद्र और नदियों का उदाहरण क्यों दिया गया है?
यह उदाहरण बताता है कि इच्छाएँ आती रहें, पर यदि मन स्थिर है तो शांति बनी रहती है—जैसे समुद्र अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता।

🧠 क्या गीता 2:70 इच्छा-त्याग की शिक्षा देता है?
नहीं। यह श्लोक इच्छा-त्याग नहीं, बल्कि इच्छा-नियंत्रण की शिक्षा देता है।

🌿 इच्छाओं के पीछे दौड़ने से क्या होता है?
इच्छाओं के पीछे दौड़ने वाला व्यक्ति कभी संतोष नहीं पाता और उसका मन सदा अशांत रहता है।

🙏 गीता 2:70 का मुख्य संदेश क्या है?
इच्छाओं से प्रभावित हुए बिना, स्थिर और संतुलित रहना ही सच्ची शांति का मार्ग है।


Disclaimer:
यह लेख भगवद गीता के श्लोक 2:70 की आध्यात्मिक एवं जीवनोपयोगी व्याख्या प्रस्तुत करता है। यह सामग्री केवल शैक्षिक उद्देश्य से है और किसी भी प्रकार की पेशेवर सलाह का विकल्प नहीं है।

Bhagavad Gita 2:70 – Desire Comes and Goes, Peace Remains

Why a calm mind stays fulfilled even when desires arise

Bhagavad Gita 2:70 – Desire Enters, Peace Does Not Leave

Why do some people remain calm even when desires surround them, while others feel restless no matter how much they achieve? Bhagavad Gita 2:70 answers this through a powerful metaphor. Lord Krishna compares a wise person to the ocean, which remains full and steady even as countless rivers flow into it.

Desires continuously arise in human life. Objects, ambitions, expectations, and attractions keep approaching the mind. Krishna does not say that desires must completely disappear. Instead, he explains that peace depends on how the mind responds to them. A wise person allows desires to come and go without becoming disturbed or overwhelmed.

Just as the ocean does not overflow when rivers enter it, a person of steady wisdom is not shaken by the arrival of new desires or experiences. The mind remains grounded, complete, and content within itself. Such a person does not chase satisfaction outward, because inner fullness is already present.

In contrast, a restless mind constantly seeks fulfillment. Each desire creates another, leading to dissatisfaction and inner noise. This verse explains why unlimited desire can never bring peace. Happiness based on acquisition is fragile, but happiness rooted in inner stability is lasting.

Bhagavad Gita 2:70 teaches that true peace comes from inner completeness, not from controlling the external world. When desires lose the power to disturb, life becomes balanced and calm. Such a person moves through success and failure, gain and loss, with quiet strength and unshaken clarity.


Frequently Asked Questions

What is the main teaching of Bhagavad Gita 2:70?

It teaches that peace remains intact when desires do not disturb the mind.

What does the ocean metaphor represent?

It represents inner fullness and stability that is not shaken by incoming desires.

Does this verse say desires are wrong?

No. It teaches freedom from being controlled by desires, not suppression of them.

Why do desires create restlessness?

Because chasing fulfillment externally prevents the experience of inner completeness.

How can this verse be applied in daily life?

By observing desires without attachment and cultivating inner contentment and balance.

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