क्या आपने कभी ऐसे व्यक्ति को देखा है जिसके पास सब कुछ पाने की क्षमता है, फिर भी वह भीतर से शांत और संतुलित रहता है? न वह बेचैन दिखता है, न ही लगातार कुछ और पाने की दौड़ में।
भगवद गीता 2:71 उसी मानसिक परिपक्वता की बात करती है। यह श्लोक बताता है कि जिसने इच्छाओं को नहीं, बल्कि इच्छा-ग्रस्त मन को छोड़ दिया, वही सच्ची शांति को प्राप्त करता है।
भगवद गीता 2:71 – मूल श्लोक
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः। निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति॥
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| जब मन इच्छाओं, ममता और अहंकार से मुक्त हो जाता है, तभी जीवन में वास्तविक शांति उतरती है |
📖 गीता 2:71 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद
अर्जुन:
हे श्रीकृष्ण, आपने इच्छाओं और शांति की बात कही।
क्या ऐसा जीवन संभव है जिसमें मनुष्य
सच में शांत रह सके?
श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन, जो मनुष्य
सभी कामनाओं का त्याग कर देता है
और बिना ‘मैं’ तथा ‘मेरा’ के भाव के जीवन जीता है,
वही परम शांति को प्राप्त करता है।
अर्जुन:
क्या इच्छाओं का त्याग ही शांति का मार्ग है, प्रभु?
श्रीकृष्ण:
हाँ अर्जुन।
जब मनुष्य
न किसी वस्तु की लालसा करता है,
न किसी पर अधिकार जताता है,
तब उसका मन पूर्णतः शांत हो जाता है।
अर्जुन:
तो हे माधव, शांति का अंतिम रहस्य क्या है?
श्रीकृष्ण:
इच्छा, अहंकार और ममता से मुक्त होकर
कर्तव्य का पालन करना ही
सच्ची शांति और मुक्ति का मार्ग है।
🕊️ इच्छा-त्याग + अहंकार-मुक्ति = परम शांति
👉 जहाँ ‘मैं’ और ‘मेरा’ समाप्त हो जाता है, वहीं शांति का जन्म होता है।
सरल अर्थ
जो व्यक्ति सभी कामनाओं को त्यागकर, निःस्पृह होकर, ‘मेरा’ और ‘मैं’ के भाव से मुक्त होकर जीवन में चलता है, वही वास्तविक शांति को प्राप्त करता है।
यह श्लोक वास्तव में क्या सिखाता है?
गीता 2:71 इच्छाओं के अस्तित्व को नकारती नहीं है। यह श्लोक उस आसक्ति को छोड़ने की बात करता है जो इच्छाओं को ज़रूरत से ज़्यादा ताकत दे देती है।
जब ‘मुझे ही चाहिए’, ‘मेरा ही होना चाहिए’, और ‘मैं ही सही हूँ’ — ये भाव हावी हो जाते हैं, तब मन कभी शांत नहीं हो पाता।
श्रीकृष्ण यहाँ तीन बातें छोड़ने को कहते हैं:
- अंधी कामना
- ‘मेरा-पन’
- अहंकार
इनके हटते ही, मन अपने आप हल्का हो जाता है।
एक वास्तविक जीवन उदाहरण
मान लीजिए कोई व्यक्ति अपने करियर में अच्छे पद पर पहुँच चुका है। अब भी उसके पास आगे बढ़ने के मौके हैं।
एक रास्ता यह है कि वह हर समय और ऊपर जाने की चिंता में जिए — दूसरों से तुलना करे, खुद को साबित करने में थक जाए।
दूसरा रास्ता यह है कि वह अपना कार्य ईमानदारी से करे, सीखे, आगे बढ़े, लेकिन अपने अस्तित्व को पद और पहचान से न बाँधे।
दूसरा व्यक्ति वही करता है जो गीता 2:71 सिखाती है — वह इच्छाओं को रखता है, लेकिन उन्हें अपने मन का मालिक नहीं बनने देता।
निःस्पृहता और मानसिक स्वतंत्रता
इस श्लोक की सबसे गहरी बात है — निःस्पृहता।
निःस्पृह होने का अर्थ कुछ भी न चाहना नहीं है। इसका अर्थ है — इच्छा पूरी न होने पर भी खुद को टूटा हुआ न महसूस करना।
यही मानसिक स्वतंत्रता है। और जहाँ स्वतंत्रता है, वहीं शांति है।
अर्जुन के संदर्भ में गीता 2:71
अर्जुन का संकट केवल युद्ध का नहीं था, बल्कि ‘अपनों’ से जुड़ा हुआ था — मेरा परिवार, मेरे गुरु, मेरे संबंध।
श्रीकृष्ण उसे यह समझा रहे हैं कि कर्तव्य निभाते समय ‘मेरा’ और ‘मैं’ अगर हावी हो गए, तो शांति संभव नहीं।
यह श्लोक अर्जुन को कर्तव्य में रहते हुए अहंकार और आसक्ति से मुक्त होने की शिक्षा देता है।
निष्कर्ष: हल्का मन ही शांत मन है
गीता 2:71 हमें यह नहीं कहती कि जीवन को त्याग दो। यह कहती है — जीवन को पकड़े रखने की ज़िद छोड़ दो।
जब इच्छाएँ, अहंकार और ‘मेरा-पन’ ढीले पड़ जाते हैं, तो मन में जगह बनती है — शांति के लिए।
📘 भगवद गीता 2:71 – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
🕉️ गीता 2:71 में श्रीकृष्ण क्या सिखाते हैं?
इस श्लोक में बताया गया है कि जो व्यक्ति सभी कामनाओं का त्याग कर, ‘मैं’ और ‘मेरा’ के भाव से मुक्त होकर जीवन जीता है, वही परम शांति को प्राप्त करता है।
🧠 क्या गीता 2:71 इच्छा-त्याग की बात करता है?
हाँ, यह श्लोक इच्छाओं के दास बनने के बजाय उनसे मुक्त होने की शिक्षा देता है, ताकि मन स्थिर और शांत रह सके।
🙏 ‘मैं’ और ‘मेरा’ का त्याग क्यों आवश्यक है?
‘मैं’ और ‘मेरा’ का भाव अहंकार और आसक्ति को जन्म देता है। इनके त्याग से मन हल्का होता है और शांति प्राप्त होती है।
🌿 क्या गीता 2:71 आधुनिक जीवन में उपयोगी है?
हाँ, यह श्लोक आज के तनावपूर्ण जीवन में अहंकार, लालसा और मानसिक अशांति से मुक्त होने का मार्ग दिखाता है।
🕊️ गीता 2:71 का मुख्य संदेश क्या है?
कामनाओं और अहंकार से मुक्त होकर कर्तव्य का पालन करना ही सच्ची शांति और मुक्ति का मार्ग है।
यह लेख भगवद गीता के श्लोक 2:71 की जीवनोपयोगी एवं दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। यह सामग्री केवल शैक्षिक उद्देश्य से है और किसी भी प्रकार की चिकित्सीय, कानूनी या पेशेवर सलाह का विकल्प नहीं है।
Bhagavad Gita 2:71 – Freedom from Desire Leads to True Peace
What happens when a person stops chasing desires? Bhagavad Gita 2:71 gives a powerful and peaceful answer. Lord Krishna explains that a person who abandons all selfish desires, who lives free from craving, ego, and possessiveness, attains lasting peace.
This verse describes the final stage of inner maturity. Desire itself is not the main problem — attachment, ego, and the sense of “this is mine” create bondage. When actions are driven by ego and ownership, the mind remains restless and dissatisfied. Krishna teaches that peace arises when the heart releases this inner clinging.
A desire-free person does not mean someone inactive or indifferent. Such a person still acts, works, and lives fully, but without inner demand or expectation. There is no constant hunger for results, no emotional dependence on outcomes, and no identity built on possessions or status.
In modern life, this teaching feels deeply relevant. People are encouraged to want more — more success, more recognition, more control. Yet the more the ego expands, the more fragile happiness becomes. This verse explains that true peace is not created by gaining, but by letting go of inner ownership.
Bhagavad Gita 2:71 reminds us that freedom is internal. When desire, ego, and possessiveness fall away, the mind becomes light and steady. Such a person lives with quiet confidence, natural contentment, and an unshakable sense of peace that does not depend on external conditions.
Frequently Asked Questions
It teaches that giving up selfish desires, ego, and possessiveness leads to lasting peace.
No. It teaches acting without attachment, not abandoning responsibility or life.
It means not defining oneself by possessions, roles, or achievements.
Because attachment creates fear of loss and constant mental tension.
By reducing inner craving, letting go of ego-based identity, and living with simplicity and awareness.

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