उत्तर: गीता 3:20 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जनक जैसे महापुरुषों ने कर्म के द्वारा ही सिद्धि प्राप्त की थी। इसलिए सामान्य जन को भी लोकसंग्रह, अर्थात समाज के कल्याण के लिए कर्म करना चाहिए।
अगर आत्मज्ञान हो जाए, तो क्या कर्म करना ज़रूरी रहता है?
अक्सर लोग सोचते हैं कि ज्ञान प्राप्त होने के बाद कर्तव्य, जिम्मेदारी और कर्म अपने आप समाप्त हो जाते हैं।
भगवद्गीता 3:20 इस भ्रम को तोड़ती है और नेतृत्व, आदर्श और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का एक अत्यंत व्यावहारिक सिद्धांत प्रस्तुत करती है।
गीता 3:20 – ज्ञानी व्यक्ति क्यों कर्म करता है?
गीता 3:20 कर्मयोग का नेतृत्व-आधारित श्लोक है। यह बताता है कि महापुरुष कर्म अपने लिए नहीं, बल्कि लोक-संग्रह (समाज की दिशा) के लिए करते हैं।
भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग
इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है।
📜 भगवद्गीता 3:20 – मूल संस्कृत श्लोक
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥
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| भगवद गीता 3:20 यह सिखाती है कि श्रेष्ठ व्यक्ति अपने कर्मों से समाज को दिशा देता है और लोककल्याण के लिए किया गया कर्म ही सच्चा कर्मयोग है। |
📖 गीता 3:20 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद
अर्जुन:
हे श्रीकृष्ण,
क्या कर्म करते हुए भी
सिद्धि और मुक्ति
प्राप्त की जा सकती है?
श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन,
जनक आदि राजाओं ने
कर्म करते हुए ही सिद्धि
प्राप्त की थी।
श्रीकृष्ण:
इसलिए
लोक-कल्याण की दृष्टि से भी
तुम्हें
कर्तव्य कर्म करना चाहिए।
अर्जुन:
तो क्या श्रेष्ठ व्यक्ति का कर्म
दूसरों को भी प्रभावित करता है?
श्रीकृष्ण:
हाँ अर्जुन।
श्रेष्ठ पुरुष का आचरण
ही समाज के लिए
मार्गदर्शक बनता है।
👑 कर्म करते हुए सिद्धि = सच्चा कर्मयोग
👉 जो स्वयं कर्म करता है, वही संसार को सही दिशा देता है।
🔍 श्लोक का भावार्थ (सरल भाषा में)
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं — राजा जनक जैसे ज्ञानी पुरुषों ने भी कर्म के द्वारा ही सिद्धि प्राप्त की।
इसलिए, समाज के कल्याण और सही दिशा के लिए तुम्हें भी कर्म करना चाहिए।
🧠 “लोकसंग्रह” का वास्तविक अर्थ
लोकसंग्रह का अर्थ केवल लोगों को इकट्ठा करना नहीं है।
इसका अर्थ है —
- समाज में सही उदाहरण प्रस्तुत करना
- व्यवस्था को संतुलित रखना
- कर्तव्य से लोगों को जोड़ना
जब जिम्मेदार लोग कर्म छोड़ देते हैं, तो समाज दिशाहीन हो जाता है।
⚖️ राजा जनक का उदाहरण क्यों दिया गया?
राजा जनक एक ज्ञानी और आत्मसाक्षात्कार प्राप्त व्यक्ति थे।
फिर भी उन्होंने:
- राज्य छोड़ा नहीं
- कर्तव्य से भागे नहीं
- अपने ज्ञान को आलस्य का बहाना नहीं बनाया
गीता 3:20 बताती है कि ज्ञान कर्म का अंत नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता को ऊँचा करता है।
🌍 आज के समय में गीता 3:20
आज जब कोई अनुभवी व्यक्ति कहता है — “अब मुझे कुछ करने की ज़रूरत नहीं”, तो उसका प्रभाव दूसरों पर भी पड़ता है।
गीता 3:20 स्पष्ट करती है कि जिनके पास समझ और अनुभव है, उनकी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
क्योंकि लोग उन्हें देखकर सीखते हैं।
👤 एक वास्तविक जीवन उदाहरण
एक वरिष्ठ कर्मचारी अगर ईमानदारी और संतुलन से काम करता है, तो पूरी टीम उसी दिशा में चलती है।
लेकिन अगर वही व्यक्ति जिम्मेदारी छोड़ दे, तो पूरी व्यवस्था कमजोर हो जाती है।
यही कारण है कि ज्ञानी व्यक्ति का कर्म समाज के लिए मार्गदर्शक बनता है।
🧠 श्रीकृष्ण का नेतृत्व सिद्धांत
श्रीकृष्ण कहते हैं — जो जैसा करता है, वैसा ही समाज सीखता है।
इसलिए स्वयं सिद्ध व्यक्ति भी कर्म करता है, ताकि समाज कर्तव्य से विमुख न हो।
यही सच्चा नेतृत्व है।
✨ गीता 3:20 का केंद्रीय संदेश
यह श्लोक हमें सिखाता है कि ज्ञान व्यक्तिगत मुक्ति के लिए हो सकता है, लेकिन कर्म सामूहिक संतुलन के लिए आवश्यक है।
जो समझता है, वही जिम्मेदारी निभाता है।
🧭 निष्कर्ष
गीता 3:20 हमें यह बताती है कि महानता कर्म त्याग में नहीं, कर्तव्य निभाने में है।
जो व्यक्ति स्वयं स्थिर है, वही दूसरों के लिए प्रकाश का स्रोत बनता है।
यही कर्मयोग की पराकाष्ठा है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न – भगवद गीता 3:20
भगवद गीता 3:20 का मुख्य संदेश क्या है?
गीता 3:20 सिखाती है कि राजा जनक जैसे ज्ञानी पुरुष भी लोक-संग्रह (समाज कल्याण) के लिए कर्म करते थे।
लोक-संग्रह का क्या अर्थ है?
लोक-संग्रह का अर्थ है समाज के लिए आदर्श बनना और व्यवस्था को सही दिशा में बनाए रखना।
क्या ज्ञानी को कर्म करने की आवश्यकता होती है?
हाँ, गीता के अनुसार ज्ञानी व्यक्ति भी दूसरों को प्रेरणा देने के लिए कर्म करता है।
आज के जीवन में गीता 3:20 कैसे उपयोगी है?
यह श्लोक सिखाता है कि जिम्मेदार और प्रभावशाली लोगों को समाज के हित में सक्रिय रहना चाहिए।
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महापुरुषों के आचरण से समाज कैसे दिशा पाता है, इसे जानें।
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✍️ लेखक के बारे में
Bhagwat Geeta by Sun एक ज्ञान-आधारित आध्यात्मिक मंच है, जहाँ श्रीमद्भगवद्गीता को आधुनिक जीवन की चुनौतियों — कैरियर, नेतृत्व, निर्णय और मानसिक शांति — से जोड़कर समझाया जाता है।
इस वेबसाइट का उद्देश्य गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन और कर्मयोग की व्यावहारिक मार्गदर्शिका के रूप में प्रस्तुत करना है।
यह लेख केवल शैक्षिक, आध्यात्मिक और आत्म-विकास के उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय, कानूनी या वित्तीय सलाह नहीं है। भगवद्गीता की व्याख्या विभिन्न परंपराओं और दृष्टिकोणों के अनुसार भिन्न हो सकती है।
Bhagavad Gita 3:20 – Leadership Through Action, Not Withdrawal
Does personal freedom mean stepping away from responsibility? Bhagavad Gita 3:20 answers this by showing why great people act for the good of the world, even when they need nothing for themselves.
Bhagavad Gita 3:20 – Shlok
Karmaṇaiva hi saṁsiddhim
āsthitā janakādayaḥ |
Loka-saṅgraham evāpi
sampaśyan kartum arhasi ||
Explanation
In Bhagavad Gita 3:20, Lord Krishna reminds Arjuna that great leaders of the past, such as King Janaka, attained perfection not by abandoning action, but by performing their duties fully. Their motivation was not personal gain, but the well-being and stability of society.
Krishna introduces a powerful idea here: loka-saṅgraha — acting to uphold social balance. Even a person who is inwardly free continues to act because their behavior influences others. Action becomes a form of leadership.
This verse explains why responsible action matters. People observe and imitate those in visible positions. If leaders withdraw from duty, confusion spreads. But when they act with integrity and selflessness, order and trust are strengthened. Krishna urges Arjuna to act, not for himself, but for the collective good.
For a global audience, this message feels deeply relevant. In times of social uncertainty, ethical leadership is more powerful than personal withdrawal. Bhagavad Gita 3:20 shows that true freedom expresses itself through responsibility, not escape.
Real-Life Example
Consider a former business executive in Japan who achieves financial independence but chooses to mentor young entrepreneurs. He no longer needs recognition or income, yet he continues contributing because his guidance shapes future leaders. His action is not obligation — it is responsibility rooted in awareness. This reflects the essence of Bhagavad Gita 3:20.
The verse teaches a timeless principle: when capable individuals act with selflessness, society remains stable. Personal fulfillment and social responsibility are not opposites — they support each other.
Frequently Asked Questions
It teaches that even enlightened people should act for the welfare and stability of society.
He is an example of a ruler who achieved perfection through responsible action.
Acting to maintain social order, balance, and collective well-being.
Yes. It speaks directly to leadership, ethics, and social responsibility in modern life.
Leadership through example, integrity, and selfless action.

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