कभी ऐसा होता है कि हमें दो अलग-अलग रास्ते सही लगते हैं, लेकिन दोनों एक-दूसरे के विपरीत दिखाई देते हैं। मन चाहता है शांति, लेकिन परिस्थितियाँ कर्म की माँग करती हैं।
भगवद गीता 3:2 उसी मानसिक स्थिति को दर्शाता है, जहाँ अर्जुन श्रीकृष्ण की बातों से प्रभावित तो है, पर दिशा को लेकर अब भी असमंजस में है।
भगवद गीता 3:2 – मूल श्लोक
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे। तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्॥
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| जब मार्ग स्पष्ट न हो, तो सही प्रश्न ही पहला कदम होता है। |
📖 गीता 3:2 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद
अर्जुन:
हे श्रीकृष्ण,
आपके वचनों से
मेरा मन भ्रमित हो रहा है।
कभी आप ज्ञान की प्रशंसा करते हैं,
और कभी कर्म का उपदेश देते हैं।
अर्जुन:
कृपा करके
स्पष्ट रूप से बताइए —
वह एक मार्ग कौन-सा है
जिससे मुझे
निश्चित कल्याण प्राप्त हो?
🧭 अर्जुन की जिज्ञासा — स्पष्ट मार्ग की खोज
👉 यह प्रश्न कर्मयोग की स्पष्ट व्याख्या का द्वार खोलता है।
सरल अर्थ
अर्जुन ने कहा — हे श्रीकृष्ण! आपके मिले-जुले शब्द मेरी बुद्धि को भ्रमित कर रहे हैं। कृपया स्पष्ट रूप से एक ही मार्ग बताइए, जिससे मैं निश्चित रूप से कल्याण को प्राप्त कर सकूँ।
अर्जुन की यह उलझन क्या दर्शाती है?
अर्जुन यहाँ विरोध नहीं कर रहा, वह स्पष्टता माँग रहा है।
अध्याय 2 में श्रीकृष्ण ने ज्ञान, आत्मा और शांति की बात की, लेकिन साथ ही कर्म की आवश्यकता भी बताई।
अर्जुन के लिए यह “मिश्रित संदेश” बन गया — क्या ज्ञान का मार्ग अपनाऊँ या कर्म का?
गीता 3:2 उस स्थिति को दर्शाता है जब मन दिशा चाहता है, सिर्फ सिद्धांत नहीं।
आज के जीवन में यह प्रश्न क्यों जीवित है?
आज भी लोग कहते हैं — एक ओर कहा जाता है “मन शांत रखो, भीतर जाओ”, और दूसरी ओर जीवन कहता है “काम करो, जिम्मेदारी निभाओ”।
जब दोनों बातें साथ आती हैं, तो मन भ्रमित हो जाता है।
गीता 3:2 हमें यह सिखाता है कि आध्यात्मिक स्पष्टता का अर्थ जीवन से भागना नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देना है।
एक वास्तविक जीवन उदाहरण
मान लीजिए कोई व्यक्ति self-help, meditation और spiritual किताबें पढ़ता है। वह भीतर शांति महसूस करना चाहता है।
लेकिन साथ-साथ उसके सामने करियर के फैसले, परिवार की जिम्मेदारियाँ और आर्थिक दबाव भी हैं।
वह सोचता है — क्या शांति का अर्थ इन सब से दूर हो जाना है? या क्या मैं इन्हीं के बीच सही जीवन जी सकता हूँ?
यही अर्जुन का प्रश्न है — और यही गीता 3:2 की आत्मा है।
स्पष्ट मार्ग की माँग क्यों आवश्यक है?
अर्जुन जानता है कि आधे-अधूरे ज्ञान से निर्णय नहीं लिया जा सकता।
इसलिए वह श्रीकृष्ण से कहता है — एक मार्ग बताइए, जिसे अपनाकर मैं निश्चिंत होकर आगे बढ़ सकूँ।
यह हमें सिखाता है कि जीवन में clarity माँगना कमज़ोरी नहीं, बल्कि परिपक्वता है।
यहीं से कर्मयोग स्पष्ट होता है
गीता 3:2 कर्मयोग के स्पष्टीकरण का द्वार खोलता है।
यह प्रश्न श्रीकृष्ण को अवसर देता है कि वे स्पष्ट करें — ज्ञान और कर्म अलग रास्ते नहीं, बल्कि एक ही जीवन-मार्ग के दो पहलू हैं।
निष्कर्ष: स्पष्टता ही शांति की शुरुआत है
गीता 3:2 हमें यह सिखाता है कि जब मन भ्रमित हो, तो स्पष्ट मार्ग माँगना ज़रूरी है।
अर्जुन का यह प्रश्न पूरे कर्मयोग अध्याय को दिशा देता है।
जहाँ दिशा स्पष्ट होती है, वहीं कर्म भी बोझ नहीं बनता।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न – गीता 3:2❓️
भगवद गीता 3:2 में अर्जुन क्या कहते हैं?
अर्जुन कहते हैं कि श्रीकृष्ण के मिले-जुले उपदेशों से उनकी बुद्धि भ्रमित हो रही है और वे एक स्पष्ट मार्ग जानना चाहते हैं।
अर्जुन स्पष्ट मार्ग क्यों मांगते हैं?
क्योंकि ज्ञान और कर्म की मिश्रित बातें उन्हें निर्णय लेने में असमंजस में डाल रही थीं।
गीता 3:2 का आगे के अध्याय से क्या संबंध है?
इसी प्रश्न के उत्तर में श्रीकृष्ण कर्मयोग का स्पष्ट और व्यावहारिक मार्ग बताते हैं।
आज के जीवन में गीता 3:2 का क्या संदेश है?
यह श्लोक सिखाता है कि भ्रम की स्थिति में स्पष्ट दिशा और निश्चित मार्ग आवश्यक होता है।
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ज्ञानयोग और कर्मयोग का मार्ग
यह लेख भगवद गीता के श्लोक 3:2 की जीवनोपयोगी एवं दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। यह सामग्री केवल शैक्षिक एवं आध्यात्मिक उद्देश्य से है और किसी भी प्रकार की पेशेवर सलाह का विकल्प नहीं है।
Bhagavad Gita 3:2 – Arjuna Asks for Clear and Certain Guidance
Why does spiritual advice sometimes feel confusing instead of helpful? In Bhagavad Gita 3:2, Arjuna honestly expresses this feeling. After listening to Krishna’s teachings on wisdom and detachment, his mind feels unsettled rather than peaceful. He asks Krishna to clearly tell him which path will truly lead to his highest good.
Arjuna explains that Krishna’s words appear mixed and unclear to him. At one moment, Krishna praises knowledge and inner renunciation. At another, he encourages action and duty. To Arjuna, these two paths seem different and even opposite. This creates mental conflict at a moment when Arjuna needs certainty, not complexity.
This verse highlights an important truth: partial understanding can increase confusion. When deep teachings are heard without full context, the mind struggles to apply them correctly. Arjuna does not question Krishna’s authority or wisdom. Instead, he humbly admits his confusion and asks for direct, practical guidance.
Bhagavad Gita 3:2 sets the stage for the detailed explanation of Karma Yoga. Krishna will soon clarify that knowledge and action are not enemies. True wisdom expresses itself through action performed without attachment to results. Renunciation is not escape from responsibility, but freedom from ego and expectation.
This verse is deeply relevant today. Many people feel torn between spiritual growth and worldly responsibility. Bhagavad Gita 3:2 reminds us that clarity comes from asking sincere questions and seeking complete understanding. Confusion is not failure — it is often the first step toward deeper wisdom.
Frequently Asked Questions
He asks Krishna to clearly tell him which path will truly lead to his highest good.
Because knowledge and action appear contradictory without full explanation.
No. He is respectfully seeking clarity and certainty.
It prepares for the teaching of Karma Yoga and the harmony between wisdom and action.
It reflects the confusion people feel between spiritual ideals and daily responsibilities.

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