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यह वेबसाइट किस लिए है?

BhagwatGeetaBySun.com एक आध्यात्मिक एवं जीवन-मार्गदर्शन वेबसाइट है, जहाँ भगवद गीता के श्लोकों को सरल भाषा में समझाकर उन्हें आज के जीवन की वास्तविक समस्याओं से जोड़ा जाता है।

  • गीता के श्लोकों का व्यावहारिक अर्थ
  • तनाव, क्रोध और चिंता से मुक्ति
  • मन को शांत और स्थिर रखने की कला
  • कर्मयोग द्वारा सही निर्णय

What is BhagwatGeetaBySun.com?

BhagwatGeetaBySun.com is a spiritual and life-guidance website that explains the wisdom of the Bhagavad Gita in a simple, practical, and modern context to help people gain clarity, peace, and balance in life.

परधर्म से अपना धर्म क्यों श्रेष्ठ है, भले ही वह कठिन हो? – भगवद गीता 3:35

प्रश्न: गीता 3:35 में स्वधर्म और परधर्म के बारे में क्या शिक्षा दी गई है?

उत्तर: गीता 3:35 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि अपना स्वधर्म, भले ही अपूर्ण क्यों न हो, दूसरे के धर्म से श्रेष्ठ है। परधर्म का पालन भयावह होता है, जबकि स्वधर्म में मृत्यु भी कल्याणकारी मानी गई है।

क्या किसी और जैसा बनना वाकई सफलता का रास्ता है?

आज का इंसान लगातार तुलना में जी रहा है — किसी की नौकरी, किसी का बिज़नेस, किसी की lifestyle।

भगवद्गीता 3:35 इस तुलना की मानसिकता को सीधे जड़ से चुनौती देती है।

📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह):
भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग

इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है।


गीता 3:35 – स्वधर्म बनाम परधर्म: असली सुरक्षा कहाँ है?

गीता 3:34 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि राग और द्वेष हमारे आंतरिक शत्रु हैं।

गीता 3:35 बताती है कि इन शत्रुओं का सबसे बड़ा कारण दूसरों का मार्ग अपनाने की लालसा है।


📜 भगवद्गीता 3:35 – मूल संस्कृत श्लोक

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥


भगवद गीता 3:35 में श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि अपना स्वधर्म, भले ही अपूर्ण क्यों न हो, परधर्म से कहीं श्रेष्ठ है। दूसरों के मार्ग का अनुकरण भय और असंतुलन पैदा करता है, जबकि अपने स्वभाव और कर्तव्य के अनुसार चलना ही सुरक्षित और उन्नति का मार्ग है। यह श्लोक आत्मस्वीकृति, व्यक्तिगत कर्तव्य और जीवन में सही दिशा चुनने का गहरा संदेश देता है।
अपना मार्ग कठिन हो सकता है, पर वही सबसे सुरक्षित और सच्चा होता है

📖 गीता 3:35 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद

अर्जुन:
हे श्रीकृष्ण, यदि स्वभाव और कर्म अलग-अलग हैं, तो मनुष्य को किस मार्ग का चयन करना चाहिए?

श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन, अपने धर्म में स्थित रहना, भले ही उसमें कठिनाई हो, दूसरे के धर्म से श्रेष्ठ है।

श्रीकृष्ण:
दूसरे के धर्म का भली-भाँति पालन किया गया कर्म भी भय को उत्पन्न करता है

अर्जुन:
तो हे माधव, क्या अपने स्वधर्म में मृत्यु भी श्रेष्ठ मानी जाती है?

श्रीकृष्ण:
हाँ अर्जुन। अपने धर्म में मृत्यु भी कल्याणकारी है, क्योंकि वह आत्मा के स्वभाव के अनुकूल होती है।


🛡️ स्वधर्म = सुरक्षा ⚠️ परधर्म = भय

👉 अपनी प्रकृति के अनुसार किया गया कर्म ही सच्चा योग है।

🔍 श्लोक का सरल भावार्थ

श्रीकृष्ण कहते हैं — अपना स्वधर्म भले ही अपूर्ण हो,

लेकिन उसे निभाना दूसरे के धर्म को अच्छे से निभाने से भी श्रेष्ठ है।

अपने स्वभाव के अनुसार जीना सुरक्षित है,

जबकि दूसरों का मार्ग अपनाना भय और अस्थिरता पैदा करता है।


🧠 “स्वधर्म” का वास्तविक अर्थ

स्वधर्म का अर्थ केवल पेशा या जाति नहीं है।

स्वधर्म का अर्थ है —

  • आपकी प्राकृतिक प्रवृत्ति
  • आपकी क्षमताएँ
  • आपकी मानसिक संरचना

जो कार्य आपके स्वभाव के अनुकूल हो, वही आपका स्वधर्म है।


⚖️ परधर्म क्यों खतरनाक है?

परधर्म का अर्थ है — किसी और जैसा बनने की कोशिश।

ऐसा करने पर:

  • लगातार तुलना बनी रहती है
  • आत्मविश्वास धीरे-धीरे टूटता है
  • मन हमेशा असंतुष्ट रहता है

गीता 3:35 कहती है — परधर्म बाहर से आकर्षक लगता है, लेकिन भीतर से अस्थिर करता है।


🌍 आधुनिक जीवन में गीता 3:35

आज युवा कहते हैं —

  • “सब IT में जा रहे हैं”
  • “सब business कर रहे हैं”
  • “यह field ज्यादा पैसा देती है”

बिना यह देखे कि क्या यह उनके स्वभाव से मेल खाता है या नहीं।

यहीं से frustration शुरू होता है।


👤 वास्तविक जीवन का उदाहरण (कहानी के साथ)

मान लीजिए एक व्यक्ति है जिसे पढ़ाना, समझाना और मार्गदर्शन देना पसंद है।

उसका स्वभाव शांत है, वह चीज़ों को गहराई से समझता है।

लेकिन वह देखता है कि उसके दोस्त corporate job में तेज़ी से पैसा कमा रहे हैं।

वह भी वही रास्ता चुन लेता है — भले ही वह उसके स्वभाव के विरुद्ध हो।

शुरुआत में सब ठीक लगता है, लेकिन कुछ समय बाद उसे घुटन महसूस होने लगती है।

वह खुद से पूछता है — “मैं इतना थका क्यों रहता हूँ, जबकि काम ज़्यादा कठिन भी नहीं है?”

समस्या काम की नहीं, स्वधर्म से दूरी की है।

जब वह व्यक्ति धीरे-धीरे अपने स्वभाव के अनुरूप शिक्षा या मार्गदर्शन के क्षेत्र में लौटता है,

तो भले ही शुरुआत साधारण हो, लेकिन मन स्थिर हो जाता है।

यही गीता 3:35 का जीवन्त अर्थ है।


🧠 श्रीकृष्ण का आत्म-विश्वास सूत्र

श्रीकृष्ण सफलता को दूसरों से आगे निकलने में नहीं,

अपने स्वभाव के अनुरूप जीने में देखते हैं।

वे कहते हैं — अपने रास्ते पर ईमानदारी से चलना सबसे बड़ी सुरक्षा है।


✨ गीता 3:35 का केंद्रीय संदेश

यह श्लोक सिखाता है कि खुद जैसा होना कमज़ोरी नहीं,

बल्कि सबसे बड़ी शक्ति है।

तुलना छोड़कर स्वधर्म अपनाना जीवन को स्थिर बनाता है।


🧭 निष्कर्ष

गीता 3:35 हमें यह याद दिलाती है कि हर व्यक्ति का मार्ग अलग होता है।

दूसरों का रास्ता देखकर अपना रास्ता छोड़ना आंतरिक संघर्ष को जन्म देता है।

अपने स्वभाव के अनुरूप कर्म करना ही सच्ची सुरक्षा और शांति देता है।



🌟 गीता 3:35 – अपने धर्म पर अडिग रहने की शिक्षा

दूसरों के धर्म का पालन करने से बेहतर है अपने धर्म का अपूर्ण पालन करना। भगवद गीता 3:35 जीवन में आत्म-विश्वास, स्वधर्म और साहस का गहरा संदेश देती है।

🔗 इस विषय को अलग-अलग माध्यमों पर समझें:

📌 Pinterest (Visual Insight)
👉 गीता श्लोक का भावार्थ देखें

▶️ YouTube (गीता वीडियो)
👉 गीता 3:35 पर वीडियो देखें

💼 LinkedIn (Life Lessons)
👉 स्वधर्म और आत्मविश्वास पर विचार पढ़ें

📘 भगवद गीता 3:35 – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

🕉️ गीता 3:35 में श्रीकृष्ण क्या सिखाते हैं?
श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि अपने स्वभाव के अनुसार किए गए कर्म (स्वधर्म) का पालन करना, चाहे वह कठिन ही क्यों न हो, दूसरों के धर्म का अनुसरण करने से श्रेष्ठ है।

🛡️ स्वधर्म क्या होता है?
स्वधर्म वह कर्तव्य है जो व्यक्ति के स्वभाव, गुण और जीवन-भूमिका के अनुरूप होता है।

⚠️ परधर्म को भयकारी क्यों कहा गया है?
क्योंकि परधर्म व्यक्ति के स्वभाव के अनुकूल नहीं होता, जिससे भ्रम, असंतुलन और भय उत्पन्न होता है।

🧠 क्या अपने स्वधर्म में त्रुटि भी स्वीकार्य है?
हाँ, गीता 3:35 के अनुसार अपने स्वधर्म में की गई त्रुटि भी परधर्म की पूर्णता से बेहतर मानी गई है।

🕊️ गीता 3:35 का मुख्य संदेश क्या है?
अपने स्वभाव के अनुसार कर्तव्य का पालन करना ही सच्चा और कल्याणकारी मार्ग है।


🌟 आगे क्या पढ़ें (गीता कर्मयोग)

⬅️ Previous श्लोक

राग-द्वेष और इंद्रियों पर नियंत्रण क्यों आवश्यक है, और असंयम से जीवन कैसे भटकता है— इस व्यावहारिक शिक्षा को समझें।

👉 राग-द्वेष और इंद्रिय-नियंत्रण – गीता 3:34
➡️ Next श्लोक

कर्म में बाधा बनने वाले काम और क्रोध का मूल कारण क्या है— इस गहरे प्रश्न का उत्तर जानें।

👉 काम और क्रोध का प्रश्न – गीता 3:36

🌟 कर्म और कर्तव्य – भगवद गीता का मूल संदेश

कर्म क्या है, कर्तव्य क्या है और जीवन में सही कर्म कैसे किया जाए— इन सभी प्रश्नों का उत्तर भगवद गीता के कर्मयोग में मिलता है। यह संग्रह जीवन, जिम्मेदारी और आत्म-विकास से जुड़े गीता के प्रमुख संदेशों को एक साथ प्रस्तुत करता है।

👉 कर्म और कर्तव्य से जुड़े सभी गीता लेख पढ़ें

✍️ लेखक के बारे में

Bhagwat Geeta by Sun एक जीवन-दर्शन आधारित आध्यात्मिक मंच है, जहाँ श्रीमद्भगवद्गीता को आधुनिक जीवन, करियर, निर्णय और आत्म-विश्वास से जोड़कर व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

इस मंच का उद्देश्य गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन-निर्णय की विश्वसनीय मार्गदर्शिका के रूप में स्थापित करना है।


Disclaimer:
यह लेख केवल शैक्षिक, आध्यात्मिक और आत्म-विकास के उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय, कानूनी या वित्तीय सलाह नहीं है। भगवद्गीता की व्याख्या विभिन्न परंपराओं और दृष्टिकोणों के अनुसार भिन्न हो सकती है। पाठक अपने विवेक का प्रयोग करें।

Bhagavad Gita 3:35 – Why Your Own Path Is Better Than a Perfect Imitation

Why does copying others often lead to frustration, even when they seem successful? Bhagavad Gita 3:35 explains why living your own nature is safer and wiser than imitating someone else.


Bhagavad Gita 3:35 – Shlok (English Letters)

Śreyān sva-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt svanuṣṭhitāt |
Sva-dharme nidhanaṁ śreyaḥ para-dharmo bhayāvahaḥ ||


Explanation

In Bhagavad Gita 3:35, Lord Krishna delivers a timeless lesson about authenticity and self-alignment. He explains that following one’s own path imperfectly is better than following another person’s path perfectly. Living according to one’s own nature brings stability, while imitation creates fear and confusion.

Krishna introduces the idea of sva-dharma — one’s natural role, abilities, and tendencies. Every individual is wired differently. When people abandon their nature to copy others’ success, lifestyle, or values, inner conflict grows. What looks impressive externally often feels unbearable internally.

This verse does not promote mediocrity. It promotes alignment. Growth happens faster when effort flows through natural strengths. Imitation may bring short-term approval, but long-term dissatisfaction. Krishna calls following another’s path dangerous because it disconnects a person from inner clarity.

For a modern global audience, this teaching is extremely relevant. Social media constantly pushes comparison — careers, habits, personalities. Bhagavad Gita 3:35 explains why comparison-driven living leads to anxiety and loss of direction.

Real-Life Example

Consider a creative professional in Europe who forces himself into a corporate role because it looks stable and respected. Despite good performance, stress and dissatisfaction rise. When he later shifts to a design-based career that suits his temperament, income grows slowly but peace returns. This realignment reflects the wisdom of Bhagavad Gita 3:35.

The verse teaches that fulfillment comes from coherence between inner nature and outer action. Your path does not need to be perfect — it needs to be yours.


Frequently Asked Questions

What is the main teaching of Bhagavad Gita 3:35?

It teaches that following one’s own path, even imperfectly, is better than imitating others.

What does sva-dharma mean?

It means one’s natural role, abilities, and inner disposition.

Why is imitation considered dangerous?

Because it creates inner conflict and disconnects a person from their true nature.

Is this verse relevant today?

Yes. It directly addresses comparison culture and identity confusion in modern life.

What practical guidance does this verse offer?

To build life and work choices around authentic strengths rather than borrowed ideals.

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