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BhagwatGeetaBySun.com एक आध्यात्मिक एवं जीवन-मार्गदर्शन वेबसाइट है, जहाँ भगवद गीता के श्लोकों को सरल भाषा में समझाकर उन्हें आज के जीवन की वास्तविक समस्याओं से जोड़ा जाता है।

  • गीता के श्लोकों का व्यावहारिक अर्थ
  • तनाव, क्रोध और चिंता से मुक्ति
  • मन को शांत और स्थिर रखने की कला
  • कर्मयोग द्वारा सही निर्णय

What is BhagwatGeetaBySun.com?

BhagwatGeetaBySun.com is a spiritual and life-guidance website that explains the wisdom of the Bhagavad Gita in a simple, practical, and modern context to help people gain clarity, peace, and balance in life.

भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 4 व्याख्या | गुरुजनों पर शस्त्र उठाने का संकट

जब तर्क भावनाओं से हार जाए। अर्जुन अपने प्रियजनों के विरुद्ध युद्ध को पाप मानते हैं। यह श्लोक मानवीय संवेदनाओं को दर्शाता है, जहाँ सही और गलत के बीच मन उलझ जाता है।

              भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 4

अर्जुन उवाच —
कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन।।

गीता 2:4 – अर्जुन की दुविधा

अर्जुन बोले —
“हे मधुसूदन! मैं युद्ध में भीष्म और द्रोण जैसे पूज्य गुरुओं पर बाण कैसे चला सकता हूँ?”

अर्जुन का प्रश्न उसके नैतिक संघर्ष को दर्शाता है। उसके लिए यह केवल युद्ध नहीं, बल्कि गुरु-सम्मान और कर्तव्य के बीच का द्वंद्व है।

                                    गीता 2:4

हिंदी अनुवाद:

अर्जुन ने कहा —
हे मधुसूदन! हे अरिसूदन! मैं युद्धभूमि में भीष्म और द्रोण जैसे पूज्यनीय व्यक्तियों पर बाणों से कैसे प्रहार करूं?

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विस्तार से अर्थ (विवरण):

इस श्लोक में अर्जुन अपनी गहरी दुविधा और करुणा व्यक्त कर रहा है।
वह भगवान श्रीकृष्ण से कहता है कि —
“हे मधुसूदन (मधु दैत्य का वध करने वाले)! हे अरिसूदन (शत्रुओं का नाश करने वाले)! मैं अपने गुरु द्रोणाचार्य और अपने पितामह भीष्म पर, जो मेरे लिए अति पूज्य हैं, बाण कैसे चला सकता हूं? वे मेरे आदरणीय गुरु और वरिष्ठ हैं, इसलिए उनके विरुद्ध युद्ध करना अधर्म समान प्रतीत होता है।”

अर्जुन का हृदय संवेदनाओं और धर्मसंकोच से भरा हुआ है। उसे लगता है कि प्रिय और पूज्य व्यक्तियों पर शस्त्र उठाना पाप होगा।
यह श्लोक अर्जुन के कर्तव्य और भावनाओं के संघर्ष को दर्शाता है — एक ओर क्षत्रिय धर्म, दूसरी ओर पारिवारिक और गुरु के प्रति सम्मान।

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यह श्लोक हमें क्या सिखाता है:

👉 कभी-कभी जीवन में ऐसे निर्णय आते हैं जहाँ कर्तव्य  और भावना में टकराव होता है।
👉 सच्चा धर्म समझना कठिन होता है जब हमें अपने प्रियजनों से विरोध करना पड़े।
👉 यह श्लोक हमें सिखाता है कि ऐसे समय में बुद्धि और विवेक से निर्णय लेना चाहिए, न कि केवल भावनाओं में बहकर।

▶ Watch on YouTube Geeta 2:4

Geeta 2:4 – FAQ

Q1. अर्जुन की समस्या क्या है?
A. वह अपने पूजनीय गुरुओं से युद्ध नहीं करना चाहता।

Q2. यह श्लोक किस भावना को दर्शाता है?
A. अर्जुन की करुणा और दुविधा।

Geeta 2:4 – Confusion का चरम

अर्जुन अपने कर्तव्य और भावनाओं के बीच फँस जाता है। यह स्थिति आज के जीवन में भी आम है।

Career, family और personal values के बीच लोग अक्सर confused हो जाते हैं। यह श्लोक दिखाता है कि जब भावनाएँ हावी हो जाती हैं, तो निर्णय कठिन हो जाते हैं।

Life Better कैसे करें?

  • Decision लेते समय long-term सोचें
  • Emotion और responsibility में संतुलन रखें
  • स्पष्ट मूल्य तय करें

संतुलन ही सही निर्णय की कुंजी है।

अस्वीकरण (Disclaimer):

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Bhagavad Gita 2:4 – Ethics vs Responsibility

In verse 2:4, Arjuna questions how he can act against people he respects. This reflects a universal moral conflict.

Professionals, leaders, and individuals often face situations where values clash with responsibilities. Avoiding action feels safe, but creates long-term harm.

The Gita does not dismiss ethical confusion. Instead, it invites deeper understanding before choosing action.

This verse highlights that moral complexity requires wisdom, not withdrawal.

FAQ
Q: Is avoiding action morally correct?
A: Avoidance often shifts harm rather than preventing it.

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