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Wednesday, October 15, 2025

भगवद गीता अध्याय 1 श्लोक 47

                   भगवद गीता अध्याय 1 श्लोक 47

संजय उवाच —
एवमुक्त्वोऽर्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥ 47॥
                              गीता 1:47
 
हिंदी अनुवाद :

संजय बोले — इस प्रकार कहकर शोक से अत्यन्त व्याकुल चित्तवाले अर्जुन ने रणभूमि में अपना धनुष-बाण त्याग दिया और रथ के पिछले भाग में बैठ गए।

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श्लोक का सारांश / व्याख्या:

इस श्लोक में संजय ने धृतराष्ट्र को बताया कि जब अर्जुन ने अपने सगे-संबंधियों को युद्धभूमि में अपने सामने खड़ा देखा, तो उसका मन करुणा और दुःख से भर गया।
उन्होंने कृष्ण से कहा कि वे युद्ध नहीं करेंगे, और यह कहकर अपना धनुष और बाण नीचे रख दिए।
अब अर्जुन की मानसिक अवस्था अत्यंत विचलित हो गई थी — वह धर्म, कर्तव्य और मोह के बीच फँस गया था।

यह अध्याय — "अर्जुन विषाद योग"  — इसी स्थिति पर समाप्त होता है, जहाँ अर्जुन का मन भ्रमित है और वह युद्ध करने में असमर्थ महसूस करता है।

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शिक्षा :
👉 यह श्लोक हमें सिखाता है कि जीवन में जब हम भावनाओं और कर्तव्य के बीच उलझते हैं, तब हमारा मन भी भ्रमित हो जाता है।
👉 ऐसे समय में हमें किसी ज्ञानी मार्गदर्शक (जैसे यहाँ भगवान श्रीकृष्ण) की आवश्यकता होती है, जो हमें सही दिशा दिखाए।

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