📘 श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 28
🔹 श्लोक
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत |
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ||
व्याख्या
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं —
हे भारत (अर्जुन)! सभी प्राणी जन्म से पहले अदृश्य होते हैं, फिर जन्म लेकर दिखाई देने लगते हैं, और मृत्यु के बाद फिर से अदृश्य हो जाते हैं। जब प्राणियों का आरम्भ और अंत दोनों ही अदृश्य है, तो बीच में दिखाई देने वाले इस शरीर के लिए शोक करना उचित नहीं है।
विस्तृत हिंदी व्याख्या
हमारा शरीर जन्म से पहले दिखाई नहीं देता — यानी वह प्रकृति में सूक्ष्म रूप में मौजूद होता है।
जन्म होने पर ही वह दिखने लगता है।
मृत्यु के बाद फिर से वह अदृश्य हो जाता है।
इसका मतलब यह जीवन एक अस्थायी अवस्था है, जैसे बादलों का आना और जाना।
आत्मा न तो पहले नष्ट होती है, न बाद में — सिर्फ शरीर बदलता है।
इसलिए किसी के जन्म या मृत्यु पर अत्यधिक शोक करना सही नहीं, क्योंकि यह प्रकृति का नियम है।
सीख
जीवन और मृत्यु प्रकृति का चक्र है।
शरीर नश्वर है लेकिन आत्मा अमर है।
किसी भी अस्थायी चीज को लेकर ज़्यादा दुख नहीं करना चाहिए।
जो चीज़ बदलने वाली है, उसके लिए दुखी होना ज्ञान नहीं है।
हमें स्थायी चीज़— आत्मज्ञान और कर्म — पर ध्यान देना चाहिए।
Bhagavad Gita Chapter 2, Verse 28
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