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यह वेबसाइट किस लिए है?

BhagwatGeetaBySun.com एक आध्यात्मिक एवं जीवन-मार्गदर्शन वेबसाइट है, जहाँ भगवद गीता के श्लोकों को सरल भाषा में समझाकर उन्हें आज के जीवन की वास्तविक समस्याओं से जोड़ा जाता है।

  • गीता के श्लोकों का व्यावहारिक अर्थ
  • तनाव, क्रोध और चिंता से मुक्ति
  • मन को शांत और स्थिर रखने की कला
  • कर्मयोग द्वारा सही निर्णय

What is BhagwatGeetaBySun.com?

BhagwatGeetaBySun.com is a spiritual and life-guidance website that explains the wisdom of the Bhagavad Gita in a simple, practical, and modern context to help people gain clarity, peace, and balance in life.

क्या वास्तव में हम कर्म के कर्ता हैं? अहंकार का भ्रम – भगवद गीता 3:27

प्रश्न: गीता 3:27 में कर्म करने वाले के बारे में क्या सत्य बताया गया है?

उत्तर: गीता 3:27 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वास्तव में सभी कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं। अहंकार से मोहित व्यक्ति यह मान लेता है कि मैं ही कर्म करने वाला हूँ।

क्या सच में हम ही सब कुछ कर रहे हैं?

हम कहते हैं – “मैंने किया”, “मेरी मेहनत”, “मेरी सफलता”।

लेकिन भगवद्गीता 3:27 इस आत्मविश्वास के भीतर छिपे एक गहरे भ्रम को उजागर करती है।

📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह):
भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग

इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है।


गीता 3:27 – कर्ता होने का भ्रम और उसका परिणाम

गीता 3:26 में श्रीकृष्ण कर्म करते हुए संतुलन की बात करते हैं।

गीता 3:27 सीधे मनुष्य की जड़ समस्या पर आती है — “मैं ही सब कुछ कर रहा हूँ” यही अहंकार बंधन का कारण बनता है।


📜 भगवद्गीता 3:27 – मूल संस्कृत श्लोक

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥


भगवद गीता 3:27 में श्रीकृष्ण समझाते हैं कि प्रकृति के गुणों द्वारा ही सभी कर्म किए जाते हैं, लेकिन अहंकार से मोहित व्यक्ति स्वयं को कर्ता मान बैठता है। यह श्लोक अहंकार, कर्तापन के भ्रम और आत्मज्ञान का गहरा संदेश देता है तथा बताता है कि जब तक ‘मैं करता हूँ’ का भाव रहता है, तब तक बंधन बना रहता है।
कर्म प्रकृति करती है, अहंकार मनुष्य को कर्ता होने का भ्रम देता है

📖 गीता 3:27 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद

अर्जुन:
हे श्रीकृष्ण, मनुष्य स्वयं को कर्त्ता क्यों मान लेता है, जबकि कर्म तो होते ही रहते हैं?

श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन, प्रकृति के गुणों द्वारा सभी कर्म किए जाते हैं, पर अहंकार से मोहित मनुष्य अपने को कर्त्ता मान लेता है।

अर्जुन:
तो हे माधव, सत्य दृष्टि क्या है?

श्रीकृष्ण:
यह जान लेना कि कर्म गुणों से होते हैं, और अहंकार का त्याग करना— यही यथार्थ ज्ञान है।


🧠 गुण करते हैं कर्म — अहंकार बनाता है कर्त्ता

👉 जब ‘मैं’ घटता है, तब सत्य दिखता है।

🔍 श्लोक का भावार्थ (सरल भाषा में)

श्रीकृष्ण कहते हैं — सभी कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं।

लेकिन अहंकार से मोहित व्यक्ति यह मान लेता है कि “मैं ही कर्ता हूँ”।

यही भ्रम उसे बाँध देता है।


🧠 “प्रकृति के गुण” का क्या अर्थ है?

प्रकृति के तीन गुण —

  • सत्त्व (शांति, स्पष्टता)
  • रजस (क्रिया, इच्छा)
  • तमस (आलस्य, अज्ञान)

हमारा हर कर्म इन्हीं गुणों के प्रभाव से होता है।

लेकिन अहंकार कहता है — “यह सब मैंने किया।”


⚖️ अहंकार क्यों बंधन बन जाता है?

जब व्यक्ति खुद को कर्ता मानता है:

  • सफलता पर अहंकार आता है
  • असफलता पर दुख और क्रोध आता है
  • मन कभी शांत नहीं रहता

गीता 3:27 बताती है कि बंधन कर्म से नहीं, कर्तृत्व के भ्रम से होता है।


🌍 आधुनिक जीवन में गीता 3:27

आज लोग कहते हैं — “मैंने सब अपने दम पर किया।”

लेकिन वे भूल जाते हैं:

  • परिस्थितियाँ
  • समय
  • शरीर और मन की क्षमता

सब प्रकृति का योगदान है।

यह समझ आते ही अहंकार ढीला पड़ने लगता है।


👤 एक वास्तविक जीवन उदाहरण

एक व्यक्ति प्रमोशन पाकर कहता है — “मेरी मेहनत का फल है।”

मेहनत ज़रूर थी, लेकिन सही समय, सही अवसर और सही लोग भी उतने ही कारण थे।

जब यह समझ आती है, तो विनम्रता जन्म लेती है।

यही गीता 3:27 का सार है।


🧠 श्रीकृष्ण का मनोवैज्ञानिक सत्य

श्रीकृष्ण कर्म को नकारते नहीं,

वे केवल यह कहते हैं — कर्म करो, लेकिन कर्ता मत बनो।

जब “मैं” ढीला होता है, तो मन हल्का हो जाता है।

यही आंतरिक स्वतंत्रता है।


✨ गीता 3:27 का केंद्रीय संदेश

यह श्लोक सिखाता है कि अहंकार अज्ञान से पैदा होता है।

जब व्यक्ति यह समझ लेता है कि कर्म प्रकृति से हो रहा है, तो वह परिणाम से मुक्त हो जाता है।

यही कर्मयोग की गहराई है।


🧭 निष्कर्ष

गीता 3:27 हमें यह दिखाती है कि कर्म करते हुए भी बंधन से मुक्त रहा जा सकता है।

इसके लिए केवल एक बदलाव चाहिए — कर्तृत्व का त्याग।

यही शांति का वास्तविक द्वार है।



🌟 गीता से नेतृत्व और आत्मबोध

जब मनुष्य स्वयं को कर्मकर्ता मान लेता है, तभी अहंकार और भ्रम उत्पन्न होता है। भगवद गीता हमें आत्मबोध, नेतृत्व और संतुलित कर्म की व्यावहारिक शिक्षा देती है।

🔗 इस विषय को विभिन्न प्लेटफॉर्म पर देखें:

📌 Pinterest (Visual Insight)
👉 गीता संदेश का भावार्थ देखें

💼 LinkedIn (Leadership & Self-Awareness)
👉 नेतृत्व और आत्मबोध पर विचार पढ़ें

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👉 गीता ज्ञान वीडियो देखें

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न – भगवद गीता 3:27

भगवद गीता 3:27 का मुख्य संदेश क्या है?
गीता 3:27 सिखाती है कि वास्तव में सभी कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, लेकिन अहंकार से ग्रस्त व्यक्ति स्वयं को कर्ता मान लेता है।

प्रकृति के गुणों से क्या तात्पर्य है?
प्रकृति के गुण—सत्त्व, रज और तम—ही मनुष्य के कर्म, सोच और व्यवहार को संचालित करते हैं।

अहंकार से क्या समस्या होती है?
अहंकार व्यक्ति को भ्रम में डाल देता है कि वही सब कुछ कर रहा है, जिससे बंधन और दुख बढ़ते हैं।

आज के जीवन में गीता 3:27 कैसे उपयोगी है?
यह श्लोक सिखाता है कि कर्म करते हुए अहंकार छोड़ने से तनाव कम होता है और जीवन अधिक संतुलित बनता है।


🌟 आगे क्या पढ़ें (गीता कर्मयोग)

⬅️ Previous श्लोक

ज्ञानी व्यक्ति का कर्तव्य क्या है और वह समाज में कैसे संतुलन बनाए रखता है— इस व्यावहारिक मार्गदर्शन को समझें।

👉 ज्ञानी का कर्तव्य – गीता 3:26
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तत्त्वज्ञान के अभाव में मनुष्य कर्म में कैसे आसक्त हो जाता है— इस गहरे आध्यात्मिक सत्य को जानें।

👉 तत्त्वज्ञान और आसक्ति – गीता 3:28

🌟 कर्म और कर्तव्य – गीता का मूल संदेश

कर्म क्या है, कर्तव्य क्या है, और मनुष्य को जीवन में कैसे कर्म करना चाहिए— इन सभी प्रश्नों का उत्तर भगवद गीता के कर्मयोग में मिलता है। यह संग्रह कर्म, जिम्मेदारी और जीवन-धर्म को सरल और व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत करता है।

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✍️ लेखक के बारे में

Bhagwat Geeta by Sun एक आध्यात्मिक और जीवन-दर्शन आधारित मंच है, जहाँ भगवद्गीता को मानव मनोविज्ञान, अहंकार और आंतरिक शांति से जोड़कर सरल भाषा में समझाया जाता है।

इस वेबसाइट का उद्देश्य गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन और जीवन-बोध की व्यावहारिक मार्गदर्शिका बनाना है।


Disclaimer:
यह लेख केवल शैक्षिक, आध्यात्मिक और आत्म-विकास के उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय, कानूनी या वित्तीय सलाह नहीं है। भगवद्गीता की व्याख्या परंपराओं और दृष्टिकोणों के अनुसार भिन्न हो सकती है।

Bhagavad Gita 3:27 – Why the Ego Thinks “I Am the Doer”

Why do people feel stressed by responsibility and proud of success? Bhagavad Gita 3:27 explains a hidden illusion that controls human behavior.


Bhagavad Gita 3:27 – Shlok

Prakṛteḥ kriyamāṇāni guṇaiḥ karmāṇi sarvaśaḥ |
Ahaṅkāra-vimūḍhātmā kartāham iti manyate ||


Explanation

In Bhagavad Gita 3:27, Lord Krishna reveals a deep psychological truth. He explains that all actions are performed by the qualities of nature — the forces that shape body, mind, and behavior. Yet the ego-confused individual believes, “I am the sole doer.”

Krishna is not denying personal effort. He is exposing misunderstanding. Abilities, tendencies, energy, and circumstances are shaped by nature. When success occurs, the ego claims ownership. When failure occurs, stress and guilt arise. This false sense of control becomes the root of anxiety.

The verse teaches that recognizing nature’s role reduces arrogance and fear. When action is seen as a process rather than personal domination, the mind becomes lighter. Responsibility remains, but emotional burden decreases.

For a modern global audience, this insight is extremely relevant. People often identify completely with work, results, and roles. Bhagavad Gita 3:27 explains why burnout and ego clashes occur. Understanding this verse creates humility, balance, and emotional resilience.

Real-Life Example

Consider an international athlete who trains with discipline but understands that performance also depends on health, coaching, and external conditions. When she wins, she remains grounded. When she loses, she learns without self-destruction. By not identifying fully as the “doer,” she maintains mental stability. This reflects the wisdom of Bhagavad Gita 3:27.

The verse teaches that freedom begins when effort is separated from ego. Action continues, but stress decreases.


Frequently Asked Questions

What is the main teaching of Bhagavad Gita 3:27?

It teaches that actions are performed by nature, while ego falsely claims authorship.

Does this verse deny human effort?

No. It explains that effort exists within natural forces and conditions.

Why does ego create suffering?

Because it assumes total control over outcomes beyond its power.

Is this teaching relevant today?

Yes. It helps reduce stress, ego conflicts, and burnout in modern life.

What inner change does this verse encourage?

Humility, balance, and freedom from ego-based identity.

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