क्या ज्ञान होने के बाद भी मन भटक सकता है?
भगवद गीता 2:60 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि
चंचल इंद्रियाँ विवेकशील व्यक्ति के मन को भी
बलपूर्वक विचलित कर सकती हैं।
यह श्लोक आधुनिक जीवन की मानसिक अशांति,
डिजिटल आकर्षण और आत्मसंयम की चुनौती को
गहराई से उजागर करता है।
भगवद गीता अध्याय 2, श्लोक 60
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥
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| श्रीकृष्ण बताते हैं कि इंद्रियाँ स्वभाव से अत्यंत बलवान होती हैं और वे विवेकशील मनुष्य के मन को भी विचलित कर सकती हैं। इसलिए साधक को निरंतर अभ्यास और संयम द्वारा मन को नियंत्रित करना चाहिए। |
गीता 2:60 के बाद अर्जुन और श्रीकृष्ण का संवाद
अर्जुन:
हे श्रीकृष्ण,
आप कहते हैं कि बुद्धिमान व्यक्ति भी
अपनी इंद्रियों पर पूरा नियंत्रण नहीं रख पाता।
तो फिर साधक अपने मन को कैसे संभाले?
श्रीकृष्ण:
अर्जुन,
इंद्रियाँ स्वभाव से चंचल और बलवान होती हैं।
वे विवेकशील मनुष्य के मन को भी
बलपूर्वक विचलित कर सकती हैं।
श्रीकृष्ण:
इसलिए केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं है।
मन को बार बार अभ्यास और वैराग्य से
संयमित करना आवश्यक है।
अर्जुन:
हे केशव,
क्या इसका अर्थ यह है कि
मन पर नियंत्रण निरंतर प्रयास से ही संभव है?
श्रीकृष्ण:
हाँ अर्जुन,
जो साधक इंद्रियों को वश में रखकर
मन को मुझमें स्थिर कर देता है,
वही सच्चा स्थिर बुद्धि वाला कहलाता है।
यही गीता 2:60 का भाव है।
गीता 2:60 – भाग 1 : इंद्रियों की शक्ति और विवेक पर उनका प्रभाव
श्लोक 2:60 का संदर्भ और भूमिका
भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन को स्थितप्रज्ञ पुरुष के लक्षण समझा रहे हैं। अब तक वे यह स्पष्ट कर चुके हैं कि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति सुख-दुःख, राग-द्वेष और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में संतुलित रहता है।
इसी क्रम में गीता 2:60 एक गंभीर चेतावनी के रूप में आता है। यह श्लोक बताता है कि केवल ज्ञान प्राप्त कर लेना या साधना का मार्ग चुन लेना ही पर्याप्त नहीं, क्योंकि इंद्रियाँ अत्यंत बलवान और चंचल होती हैं।
“ज्ञानवान भी यदि सजग न रहे, तो इंद्रियाँ उसका विवेक हर सकती हैं।”
श्लोक 2:60 का भावार्थ
गीता 2:60 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन, ये चंचल इंद्रियाँ प्रयत्नशील और विवेकवान पुरुष के मन को भी बलपूर्वक खींच ले जाती हैं।
यह कथन बहुत गहरा है, क्योंकि यहाँ श्रीकृष्ण सामान्य मनुष्य की नहीं, ज्ञानी साधक की बात कर रहे हैं।
अर्थात्, जो व्यक्ति आत्मज्ञान के मार्ग पर है, जो संयम का अभ्यास कर रहा है, यदि वह सतर्क नहीं है, तो इंद्रियाँ उसे भी भ्रमित कर सकती हैं।
इंद्रियाँ इतनी शक्तिशाली क्यों हैं?
इंद्रियाँ सीधे बाहरी संसार से जुड़ी होती हैं। वे मन को तुरंत सुख या दुःख का अनुभव कराती हैं। इसके विपरीत, विवेक और बुद्धि दीर्घकालिक सत्य और हित की बात करते हैं।
यही कारण है कि क्षणिक सुख अधिक आकर्षक लगता है और विवेक की आवाज़ अक्सर धीमी पड़ जाती है।
- इंद्रियाँ – तत्काल अनुभव
- मन – प्रतिक्रिया
- बुद्धि – दीर्घकालिक निर्णय
जब इंद्रियाँ मन को खींच लेती हैं, तो बुद्धि पीछे छूट जाती है। यही विवेक का अपहरण है।
विवेक का अपहरण क्या है?
विवेक का अपहरण अचानक नहीं होता। यह एक क्रमिक प्रक्रिया है:
- इंद्रिय-विषय का संपर्क
- मन में स्मृति जागृत होना
- इच्छा का जन्म
- आसक्ति का निर्माण
- विवेक का ढक जाना
इस प्रक्रिया में व्यक्ति गलत को भी सही ठहराने लगता है। यहीं से पतन की शुरुआत होती है।
“गलती तब नहीं होती जब इच्छा उठती है, गलती तब होती है जब विवेक मौन हो जाता है।”
अर्जुन के जीवन से संबंध
अर्जुन स्वयं धर्मज्ञ, शास्त्रज्ञ और महान योद्धा था। फिर भी युद्धभूमि में उसका विवेक करुणा और मोह से ढँक गया।
श्रीकृष्ण अर्जुन को यह दिखाना चाहते हैं कि यदि सजगता न हो, तो इंद्रियाँ और भावनाएँ किसी को भी भ्रमित कर सकती हैं।
इसलिए गीता 2:60 अर्जुन को ही नहीं, हर साधक को चेतावनी देता है।
भाग 1 का सार
- इंद्रियाँ अत्यंत चंचल और शक्तिशाली हैं
- केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं
- सतत सजगता आवश्यक है
- विवेक धीरे-धीरे ढँकता है
👉 गीता 2:60 हमें सावधान रहना सिखाती है, क्योंकि आत्मिक मार्ग पर भी असावधानी सबसे बड़ा शत्रु है।
गीता 2:60 – भाग 2 : इंद्रिय-विषय, स्मृति और इच्छा का सूक्ष्म जाल
इंद्रिय-विषय से मन तक की यात्रा
गीता 2:60 केवल यह नहीं बताती कि इंद्रियाँ शक्तिशाली हैं, बल्कि यह भी संकेत देती है कि वे मन को किस प्रकार अपने प्रभाव में ले लेती हैं। यह प्रक्रिया अत्यंत सूक्ष्म होती है और अक्सर मनुष्य को इसका आभास भी नहीं होता।
जब कोई इंद्रिय अपने विषय के संपर्क में आती है— जैसे आँख किसी दृश्य को देखती है, कान किसी शब्द को सुनते हैं, या जिह्वा किसी स्वाद को चखती है— तब वह अनुभव सीधे मन तक पहुँचता है।
यहीं से इंद्रियों का वास्तविक प्रभाव प्रारंभ होता है।
स्मृति की भूमिका
इंद्रिय-विषय का संपर्क होते ही मन केवल वर्तमान अनुभव तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अतीत की स्मृतियों को भी सक्रिय कर देता है। यदि पहले उस विषय से सुख मिला हो, तो वही सुख स्मृति के रूप में जाग उठता है।
यही स्मृति मन को बार-बार उसी विषय की ओर खींचती है। यहाँ तक कि विषय सामने न होने पर भी मन उसका स्वाद, रूप या अनुभव दोहराने लगता है।
“स्मृति वह द्वार है, जहाँ से इच्छा प्रवेश करती है।”
इच्छा का जन्म
स्मृति के सक्रिय होते ही मन में इच्छा जन्म लेती है। यह इच्छा प्रारंभ में बहुत हल्की होती है— एक साधारण आकर्षण या चाह।
परंतु यदि विवेक सजग न हो, तो यह इच्छा धीरे-धीरे गहरी आसक्ति में बदल जाती है। मन उस विषय को पाने के लिए तर्क गढ़ने लगता है और गलत को भी सही ठहराने लगता है।
- स्मृति → चाह
- चाह → इच्छा
- इच्छा → आसक्ति
- आसक्ति → विवेक का क्षय
यही वह क्षण है जहाँ बुद्धि का अपहरण प्रारंभ होता है।
विवेक कैसे ढँक जाता है?
विवेक का नाश अचानक नहीं होता। वह धीरे-धीरे ढँकता है, जैसे धुएँ से आग ढँक जाती है। मनुष्य जानता हुआ भी गलत निर्णय लेने लगता है।
इस अवस्था में व्यक्ति कहता है— “थोड़ा-सा करने में क्या हर्ज़ है?” यही वाक्य पतन की सबसे बड़ी शुरुआत बनता है।
“विवेक के पतन की पहचान यह है कि मन बहाने बनाने लगे।”
साधक के लिए विशेष चेतावनी
गीता 2:60 साधकों के लिए और भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। साधक अक्सर यह मान लेता है कि अब वह सुरक्षित है, अब उस पर विषयों का प्रभाव नहीं पड़ेगा।
पर श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि इंद्रियाँ ज्ञानी और प्रयत्नशील पुरुष को भी भ्रमित कर सकती हैं, यदि वह सजग न रहे।
अहंकार कि “मैं अब नियंत्रित हूँ” सबसे सूक्ष्म और खतरनाक बाधा है।
आधुनिक जीवन में इसका अर्थ
आज के समय में इंद्रिय-विषय पहले से कहीं अधिक प्रबल हैं— मोबाइल, सोशल मीडिया, वीडियो, खान-पान और त्वरित सुख।
हर क्षण इंद्रियाँ उत्तेजित की जा रही हैं, जिससे स्मृति और इच्छा का चक्र और भी तीव्र हो गया है।
ऐसे में गीता 2:60 हमें सिखाती है कि सिर्फ ज्ञान पढ़ लेना पर्याप्त नहीं, बल्कि सतत सजगता और आत्मनिरीक्षण आवश्यक है।
“Awareness is the shield of wisdom.”
भाग 2 का सार
- इंद्रिय-विषय स्मृति को जागृत करते हैं
- स्मृति से इच्छा जन्म लेती है
- इच्छा विवेक को ढँक देती है
- साधक को निरंतर सजग रहना चाहिए
👉 गीता 2:60 का यह भाग हमें अपने मन की सूक्ष्म प्रक्रियाओं को समझने और पहचानने की शिक्षा देता है।
गीता 2:60 – भाग 3 : संयम का भ्रम, अहंकार और सतत सजगता का महत्व
संयम का भ्रम कैसे जन्म लेता है?
गीता 2:60 का तीसरा पक्ष हमें उस सूक्ष्म भ्रम की ओर ले जाता है जो साधना के मार्ग पर चलते हुए उत्पन्न हो सकता है। जब व्यक्ति कुछ समय तक संयम का अभ्यास कर लेता है, तो उसके भीतर यह धारणा बनने लगती है कि अब वह इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण पा चुका है।
यही धारणा आगे चलकर सबसे बड़ा संकट बन जाती है। श्रीकृष्ण इस श्लोक में इसी भ्रम के प्रति अर्जुन को पूर्व-सावधान कर रहे हैं।
“संयम का अहंकार, असंयम का द्वार खोल देता है।”
अहंकार और इंद्रियों का संबंध
अहंकार स्वयं एक सूक्ष्म इंद्रिय-विषय है। जब मनुष्य यह सोचने लगता है कि “मैं दूसरों से अधिक संयमी हूँ” या “मुझ पर अब विषयों का प्रभाव नहीं पड़ता”, तब वह अनजाने में ही इंद्रियों को खुला निमंत्रण दे देता है।
इस अवस्था में इंद्रियाँ अचानक नहीं, बल्कि बहुत धीरे-धीरे मन में प्रवेश करती हैं। मनुष्य को यह आभास भी नहीं होता कि उसका विवेक कब ढीला पड़ने लगा।
“जहाँ ‘मैं’ बढ़ता है, वहाँ सजगता घटती है।”
सतत सजगता क्यों आवश्यक है?
गीता 2:60 यह स्पष्ट करती है कि संयम कोई स्थायी उपलब्धि नहीं, बल्कि निरंतर अभ्यास की प्रक्रिया है। जिस दिन मनुष्य सजग रहना छोड़ देता है, उसी दिन पतन की संभावना उत्पन्न हो जाती है।
सजगता का अर्थ है— अपने मन की प्रत्येक गति को देखना, इच्छा के पहले संकेत को पहचानना और वहीं उसे विवेक से रोक देना।
“इच्छा को जन्म लेते ही पहचान लेना, संयम की सच्ची कला है।”
अर्जुन के संदर्भ में श्लोक 2:60
अर्जुन केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि धर्म और नीति का ज्ञाता भी था। फिर भी युद्धभूमि में उसका विवेक करुणा और मोह से ढँक गया।
श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से यह दिखाना चाहते हैं कि ज्ञान और अनुभव के बावजूद यदि सजगता न हो, तो मन भ्रमित हो सकता है।
इसलिए गीता 2:60 अर्जुन को झिड़कता नहीं, बल्कि उसे सजग बनाता है।
आधुनिक साधक और संयम का भ्रम
आज के समय में ध्यान, योग और आत्म-विकास के अनेक साधन उपलब्ध हैं। कुछ सफलता मिलने पर व्यक्ति यह मान लेता है कि अब वह इंद्रियों से ऊपर उठ चुका है।
परंतु गीता 2:60 हमें सावधान करती है कि यह आत्म-संतोष ही असंयम का प्रारंभ बन सकता है।
इसीलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि ज्ञान, अभ्यास और विनम्रता तीनों साथ-साथ आवश्यक हैं।
“विनम्रता ही संयम की रक्षा करती है।”
सजगता के व्यावहारिक संकेत
- मन के बहानों को पहचानना
- इच्छा के पहले क्षण पर ध्यान देना
- अपने निर्णयों पर प्रश्न करना
- अहंकार के उभरते भाव को देखना
ये संकेत बताते हैं कि मन सजग है या नहीं। जहाँ ये संकेत लुप्त होने लगते हैं, वहीं से पतन का मार्ग शुरू होता है।
भाग 3 का सार
- संयम का अहंकार सबसे बड़ा खतरा है
- सतत सजगता अनिवार्य है
- अहंकार विवेक को ढँक देता है
- विनम्रता संयम की रक्षा करती है
👉 गीता 2:60 का यह भाग हमें सिखाता है कि आत्मिक मार्ग पर सबसे बड़ा शत्रु असावधानी और अहंकार है।
गीता 2:60 – भाग 4 : इंद्रिय-निग्रह के उपाय और विवेक की रक्षा
इंद्रिय-निग्रह क्यों आवश्यक है?
गीता 2:60 में श्रीकृष्ण यह स्पष्ट कर चुके हैं कि इंद्रियाँ अत्यंत चंचल होती हैं और वे साधक के विवेक को भी अपहृत कर सकती हैं। इसलिए केवल ज्ञान अर्जित करना पर्याप्त नहीं, बल्कि इंद्रियों का निग्रह करना भी आवश्यक है।
इंद्रिय-निग्रह का अर्थ इंद्रियों को दबाना नहीं, बल्कि उन्हें विवेक के अधीन करना है। जब इंद्रियाँ स्वेच्छाचारी हो जाती हैं, तब मन अस्थिर होता है और बुद्धि निर्णय लेने में भ्रमित हो जाती है।
“इंद्रियाँ यदि स्वामी बन जाएँ, तो बुद्धि दास बन जाती है।”
इंद्रिय-निग्रह और दमन में अंतर
अक्सर लोग इंद्रिय-निग्रह को इंद्रियों के दमन के रूप में समझ लेते हैं। पर श्रीकृष्ण का उपदेश दमन का नहीं, विवेकपूर्ण नियंत्रण का है।
दमन करने से इंद्रियाँ अस्थायी रूप से शांत होती हैं, पर भीतर उनका आकर्षण बना रहता है। विवेकपूर्ण नियंत्रण में मन स्वयं निर्णय करता है कि किस विषय की आवश्यकता है और किसकी नहीं।
- दमन → आंतरिक संघर्ष
- निग्रह → आंतरिक संतुलन
विवेक की रक्षा के व्यावहारिक उपाय
गीता 2:60 हमें यह सिखाती है कि विवेक की रक्षा के लिए कुछ व्यावहारिक उपाय आवश्यक हैं। ये उपाय साधारण दिखते हैं, पर इनका प्रभाव गहरा होता है।
- इंद्रिय-विषयों से अनावश्यक संपर्क से बचना
- मन की प्रतिक्रियाओं को तुरंत पहचानना
- निर्णय लेने से पहले ठहराव रखना
- दैनिक आत्म-निरीक्षण का अभ्यास
इन अभ्यासों से मन धीरे-धीरे इंद्रियों के प्रभाव से मुक्त होने लगता है।
“ठहराव विवेक को शक्ति देता है।”
अर्जुन के जीवन में इंद्रिय-निग्रह
अर्जुन के लिए युद्धभूमि सिर्फ शारीरिक युद्ध नहीं थी, बल्कि आंतरिक संघर्ष का क्षेत्र भी थी। उसकी आँखें अपने संबंधियों को देखकर करुणा से भर गईं, कान अपने ही तर्क सुनकर धर्म से हटने लगे।
श्रीकृष्ण अर्जुन को इंद्रिय-निग्रह का महत्व समझाते हैं, ताकि वह भावनाओं से नहीं, विवेक से निर्णय ले सके।
आधुनिक जीवन में इंद्रिय-निग्रह
आज के युग में इंद्रिय-निग्रह और भी चुनौतीपूर्ण हो गया है। हर ओर आकर्षण हैं— स्क्रीन, विज्ञापन, तुलना और इच्छाएँ।
ऐसे में गीता 2:60 हमें यह सिखाती है कि यदि इंद्रियों को दिशा न दी जाए, तो वे जीवन की दिशा बदल सकती हैं।
सजग उपभोग, सीमाएँ तय करना और आत्म-अनुशासन आज के समय में इंद्रिय-निग्रह के आधुनिक रूप हैं।
“Self-control is self-respect.”
विवेक की पुनः स्थापना
जब इंद्रियाँ नियंत्रित होने लगती हैं, तब विवेक पुनः स्पष्ट होने लगता है। निर्णय अधिक संतुलित होते हैं और मन हल्का महसूस करता है।
यही वह अवस्था है जहाँ साधक आत्मिक मार्ग पर स्थिरता का अनुभव करता है।
भाग 4 का सार
- इंद्रिय-निग्रह विवेक की रक्षा करता है
- निग्रह और दमन में अंतर समझना आवश्यक है
- ठहराव और सजगता से संयम बढ़ता है
- आधुनिक जीवन में यह और भी आवश्यक है
👉 गीता 2:60 का यह भाग हमें सिखाता है कि संयम विवेक का स्वाभाविक फल है, बलपूर्वक किया गया प्रयास नहीं।
गीता 2:60 – भाग 5 (अंतिम) : स्थिर बुद्धि की स्थापना और जीवन में संतुलन
श्लोक 2:60 का अंतिम निष्कर्ष
गीता 2:60 का समग्र संदेश यह है कि आत्मिक मार्ग पर सबसे बड़ी चुनौती बाहरी संसार नहीं, बल्कि इंद्रियों की चंचलता है। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि ज्ञान, अभ्यास और साधना के बावजूद यदि इंद्रियाँ विवेक से नियंत्रित न हों, तो वे बुद्धि का अपहरण कर सकती हैं।
इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण यह नहीं कहते कि मनुष्य कमजोर है, बल्कि यह बताते हैं कि सजगता के बिना कोई भी सुरक्षित नहीं।
“सजगता ही ज्ञान की ढाल है।”
स्थिर बुद्धि की स्थापना कैसे होती है?
स्थिर बुद्धि किसी एक क्षण में प्राप्त नहीं होती। यह निरंतर अभ्यास, आत्म-निरीक्षण और विवेकपूर्ण निर्णयों का परिणाम होती है। जब मनुष्य बार-बार इंद्रियों के आकर्षण को पहचानकर उसे विवेक से रोकता है, तब बुद्धि स्थिर होने लगती है।
इस प्रक्रिया में मन का परिष्कार होता है और इच्छाओं की तीव्रता धीरे-धीरे कम होने लगती है।
- सजगता → स्पष्टता
- स्पष्टता → सही निर्णय
- सही निर्णय → स्थिर बुद्धि
अर्जुन का आंतरिक रूपांतरण
गीता 2:60 का उपदेश अर्जुन के भीतर एक गहरे रूपांतरण की नींव रखता है। अब वह समझने लगता है कि उसकी समस्या बाहरी युद्ध नहीं, बल्कि भीतर की अस्थिरता है।
श्रीकृष्ण के उपदेश से अर्जुन यह सीखता है कि भावनाएँ यदि अनियंत्रित हों, तो वे धर्म के मार्ग से भी भटका सकती हैं। इसी समझ से उसकी बुद्धि स्थिर होने लगती है।
“भीतर की विजय, बाहरी विजय से पहले आती है।”
आधुनिक जीवन में गीता 2:60
आज का मनुष्य लगातार इंद्रिय-उत्तेजना के बीच जी रहा है। मोबाइल स्क्रीन, सोशल मीडिया, विज्ञापन और तुलना मन को निरंतर खींचते रहते हैं।
ऐसे समय में गीता 2:60 हमें यह सिखाती है कि यदि हम अपनी इंद्रियों को दिशा न दें, तो वे हमारे जीवन की दिशा तय कर देंगी।
सचेत उपभोग, सीमाएँ तय करना, और डिजिटल संयम आज के युग में इंद्रिय-निग्रह के आवश्यक उपाय हैं।
“Control your senses, or they will control you.”
संतुलित जीवन की पहचान
जब इंद्रियाँ विवेक के अधीन हो जाती हैं, तो जीवन में एक नया संतुलन प्रकट होता है। मनुष्य न तो अत्यधिक आकर्षण में बहता है, और न ही कठोर दमन में जीता है।
- निर्णयों में स्पष्टता
- भावनाओं में संतुलन
- कर्म में स्थिरता
- मन में शांति
यही संतुलन स्थितप्रज्ञ अवस्था की ओर ले जाता है।
गीता 2:60 से मिलने वाली अंतिम सीख
गीता 2:60 हमें यह सिखाती है कि आत्मिक उन्नति का मार्ग केवल ज्ञान से नहीं, बल्कि सजग जीवन से खुलता है। इंद्रियों का संयम किसी कठोर नियम का पालन नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की अभिव्यक्ति है।
जब मनुष्य यह सीख लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर, चित्त शांत और जीवन सार्थक हो जाता है।
“सजगता से जीया गया जीवन ही सच्चा योग है।”
भाग 5 (अंतिम) का सार
- इंद्रियों का संयम अनिवार्य है
- स्थिर बुद्धि अभ्यास से बनती है
- सजगता आत्मिक सुरक्षा है
- यही संतुलित और सफल जीवन का मार्ग है
👉 इसी के साथ **गीता 2:60 ** की संपूर्ण व्याख्या पूर्ण होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न – गीता 2:60
प्रश्न 1: भगवद गीता 2:60 का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: गीता 2:60 में बताया गया है कि चंचल इंद्रियां विवेकशील व्यक्ति के मन को भी बलपूर्वक विचलित कर सकती हैं, इसलिए आत्मसंयम अत्यंत आवश्यक है।
प्रश्न 2: क्या ज्ञान होने के बाद भी मन भटक सकता है?
उत्तर: हाँ, इस श्लोक के अनुसार केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं है। जब तक इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं होता, मन भटक सकता है।
प्रश्न 3: गीता 2:60 आज के जीवन में कैसे लागू होती है?
उत्तर: आज के डिजिटल युग में इंद्रियां अधिक आकर्षण में रहती हैं। यह श्लोक सिखाता है कि आत्मसंयम और सजगता से ही मानसिक शांति संभव है।
प्रश्न 4: गीता 2:60 और 2:61 में क्या संबंध है?
उत्तर: गीता 2:60 समस्या बताती है कि मन कैसे भटकता है, जबकि गीता 2:61 उसका समाधान देती है – इंद्रियों को वश में करना।
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Bhagavad Gita 2:60
delivers a powerful and practical message about the nature of the human mind. In this verse, Lord Krishna explains that the senses are extremely restless and forceful. Even a wise person, who understands what is right, can have their mind carried away by the pull of the senses. This teaching highlights an important truth: knowledge alone is not enough to maintain inner stability.In daily life, people often believe that once they understand what is good or harmful, their actions will naturally follow that understanding. However, the Gita reveals a deeper reality. The senses constantly seek pleasure through sights, sounds, tastes, and experiences. When the mind follows these attractions without awareness, it loses its balance. This is why intelligent and well-intentioned individuals may still struggle with distraction, temptation, and emotional disturbance.
Verse 2:60 reminds us that self-control is an ongoing practice, not a one-time achievement. Modern life, filled with digital stimulation, social pressure, and endless information, makes this challenge even stronger. The verse does not criticize the senses but warns against allowing them to dominate the mind. Without discipline, the mind becomes reactive instead of thoughtful.
Krishna’s teaching encourages awareness, restraint, and conscious choice. By observing the senses instead of blindly following them, a person gradually develops inner strength. This verse prepares the foundation for the next teaching, where Krishna explains how proper control of the senses leads to mental steadiness. Thus, Bhagavad Gita 2:60 remains deeply relevant for anyone seeking clarity, focus, and inner peace in a distracted world.
Frequently Asked Questions – Gita 2:60
What is the main message of Bhagavad Gita 2:60?
The verse teaches that uncontrolled senses can overpower even a wise mind,
making self-discipline essential for mental stability.
Does this verse say that knowledge is useless?
No. It explains that knowledge must be supported by self-control,
otherwise the mind may still become distracted.
How is Gita 2:60 relevant in modern life?
In today’s world of constant digital and sensory stimulation,
this verse highlights the importance of awareness and restraint.
What comes after this teaching?
The next verse explains how controlling the senses leads to steadiness
and inner balance.

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