क्या कभी ऐसा होता है कि आप जानते हैं क्या सही है, फिर भी मन आपको दूसरी दिशा में खींच ले जाता है? जैसे बुद्धि कुछ कह रही हो, लेकिन मन कुछ और करवाने पर उतारू हो।
भगवद गीता 2:67 इसी अंदरूनी संघर्ष की जड़ को उजागर करती है। यह श्लोक बताता है कि जब मन इंद्रियों के पीछे भागने लगता है, तो वही मन हमारी बुद्धि को भी अपने साथ बहा ले जाता है।
भगवद गीता 2:67 – मूल श्लोक
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते। तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥
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| जैसे तेज़ हवा नाव को दिशा से भटका देती है, वैसे ही असंयमित इन्द्रियाँ मन की बुद्धि को स्थिर नहीं रहने देतीं —यही भगवद गीता 2:67 का संदेश है। |
📖 गीता 2:67 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद
अर्जुन:
हे श्रीकृष्ण, मनुष्य जानते हुए भी
गलत दिशा में क्यों बह जाता है?
श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन, जब मन
भटकती हुई इंद्रियों के पीछे चल पड़ता है,
तो वे उसकी बुद्धि को हर लेती हैं।
अर्जुन:
क्या इंद्रियाँ इतनी शक्तिशाली होती हैं, प्रभु?
श्रीकृष्ण:
हाँ अर्जुन।
जैसे तेज़ हवा समुद्र में चल रहे
नाव को दिशा से भटका देती है,
वैसे ही इंद्रियाँ
मनुष्य की बुद्धि को भटका देती हैं।
अर्जुन:
तो फिर सही मार्ग क्या है, हे माधव?
श्रीकृष्ण:
जो मनुष्य इंद्रियों को वश में रखता है
और मन को नियंत्रित करता है,
उसी की बुद्धि स्थिर रहती है।
🌊 भटकी इंद्रियाँ → भ्रमित मन → अस्थिर बुद्धि
👉 इंद्रियों पर नियंत्रण ही विवेक की रक्षा करता है।
सरल अर्थ
जब मन इंद्रियों के पीछे भटकता है, तो वह बुद्धि को वैसे ही हर ले जाता है जैसे पानी में चल रही नाव को तेज़ हवा अपनी दिशा से भटका देती है।
यह श्लोक वास्तव में क्या समझाता है?
श्रीकृष्ण यहाँ किसी पाप या नैतिकता की बात नहीं कर रहे। वे एक मानसिक सत्य बता रहे हैं।
मन अपने आप में न अच्छा है न बुरा। लेकिन जब वह इंद्रियों के पीछे चलता है — आँख, कान, स्वाद, तुलना, इच्छा — तब वही मन बुद्धि को कमजोर करने लगता है।
यही कारण है कि कई बार:
- हम जानते हैं क्या सही है, फिर भी गलत चुनते हैं
- हम वादा करते हैं, लेकिन निभा नहीं पाते
- हम शांत रहना चाहते हैं, लेकिन बहक जाते हैं
गीता 2:67 बताती है — समस्या इच्छा नहीं, दिशा है।
एक वास्तविक जीवन उदाहरण
मान लीजिए कोई छात्र पढ़ाई के समय बार-बार मोबाइल की ओर खिंच जाता है। उसे पता है कि परीक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन थोड़ी-सी notification, थोड़ा-सा distraction — और मन बह जाता है।
धीरे-धीरे उसकी एकाग्रता कम होती जाती है, निर्णय कमजोर हो जाते हैं, और आत्मविश्वास गिरने लगता है।
यह ठीक वही स्थिति है जिसे श्रीकृष्ण नाव और हवा के उदाहरण से समझाते हैं। बुद्धि नाव है, और इंद्रियों के पीछे भागता मन — तेज़ हवा।
मन, इंद्रियाँ और बुद्धि – सही संतुलन
इस श्लोक की सुंदरता यह है कि यह समाधान भी साथ देता है।
जब मन इंद्रियों का सेवक बन जाता है, तो बुद्धि कमजोर होती है। लेकिन जब मन बुद्धि के साथ जुड़ता है, तो वही मन सबसे बड़ा सहायक बन जाता है।
इसलिए गीता 2:67 यह नहीं कहती कि इंद्रियाँ खत्म कर दो, बल्कि यह सिखाती है कि मन को किसके पीछे चलना है, यह तय करो।
अर्जुन के लिए यह श्लोक क्यों आवश्यक था?
अर्जुन युद्धभूमि में बुद्धिमान था, पर उसका मन भय और मोह के पीछे बह रहा था।
इसी कारण उसकी प्रज्ञा डगमगा रही थी। श्रीकृष्ण उसे यह दिखा रहे हैं कि यदि मन को इंद्रियों के प्रभाव से बाहर न लाया गया, तो बुद्धि कितनी भी ज्ञानी क्यों न हो, वह सही दिशा नहीं दे पाएगी।
निष्कर्ष: दिशा सही होनी चाहिए
गीता 2:67 हमें यह गहरी सीख देती है कि जीवन में सबसे ज़रूरी चीज़ मन की दिशा है।
अगर मन इंद्रियों के पीछे है, तो बुद्धि कमजोर होगी। लेकिन अगर मन विवेक के साथ है, तो वही मन जीवन को संभाल सकता है।
मन नाव है या हवा — यह चुनाव हमारे हाथ में है।
📘 भगवद गीता 2:67 – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
🕉️ गीता 2:67 में श्रीकृष्ण क्या समझाते हैं?
श्रीकृष्ण बताते हैं कि जब मन भटकती इंद्रियों के पीछे चलता है, तो वे बुद्धि को भ्रमित कर देती हैं।
🌊 इंद्रियों की तुलना नाव से क्यों की गई है?
जैसे तेज़ हवा नाव को दिशा से भटका देती है, वैसे ही इंद्रियाँ मनुष्य की बुद्धि को सही मार्ग से हटा देती हैं।
🧠 अस्थिर बुद्धि का जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
अस्थिर बुद्धि के कारण निर्णय गलत होते हैं, ध्यान भंग रहता है और जीवन में असंतुलन बढ़ता है।
🧘 इंद्रियों पर नियंत्रण कैसे पाया जा सकता है?
आत्मसंयम, विवेक और नियमित अभ्यास से इंद्रियों को वश में किया जा सकता है।
🌿 क्या गीता 2:67 आज के जीवन में उपयोगी है?
हाँ, यह श्लोक आधुनिक जीवन में ध्यान, फोकस और सही निर्णय लेने की क्षमता को मजबूत करता है।
📖 भगवद गीता से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण श्लोक
यह लेख भगवद गीता के श्लोक 2:67 की आध्यात्मिक और जीवनोपयोगी व्याख्या प्रस्तुत करता है। यह सामग्री केवल शैक्षिक उद्देश्य से है और किसी भी प्रकार की पेशेवर सलाह का विकल्प नहीं है।
Bhagavad Gita 2:67 – How a Wandering Mind Destroys Wisdom
Why do intelligent people sometimes make poor decisions? Why does the mind lose direction even when knowledge is present? Bhagavad Gita 2:67 explains this inner struggle with great clarity. Lord Krishna teaches that when the senses wander among their objects, they carry the mind away, just as strong winds push a boat off course.
This verse highlights the danger of an uncontrolled mind. Even a person with understanding can lose clarity if attention constantly follows desires, distractions, and impulses. When the mind runs after sensory pleasure or emotional reactions, wisdom slowly fades, and judgment becomes unstable.
Krishna uses a powerful metaphor. A boat on water may be well-built, but if strong winds strike it from different directions, it loses balance and direction. In the same way, the human mind may have knowledge, values, and good intentions, yet without control over the senses, it gets pulled in many directions and loses stability.
In modern life, this teaching feels extremely relevant. Endless scrolling, notifications, comparisons, and emotional triggers constantly pull the mind outward. When attention is scattered, decisions are rushed, focus weakens, and inner confusion increases. This verse explains that the problem is not lack of intelligence, but lack of inner discipline.
Bhagavad Gita 2:67 reminds us that wisdom requires protection. By learning to pause, observe, and guide attention consciously, the mind regains balance. When the senses are guided instead of followed, clarity returns, decisions improve, and life moves in a stable and meaningful direction.
Frequently Asked Questions
It teaches that uncontrolled senses pull the mind away and destroy clarity and wisdom.
It shows how a wandering mind loses direction, just as a boat is pushed off course by strong winds.
Yes. Distractions, overstimulation, and constant sensory input make this teaching highly practical.
No. Knowledge must be supported by self-control and mindful attention to remain effective.
By reducing distractions, practicing awareness, and consciously guiding attention instead of reacting impulsively.

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