उत्तर: गीता 3:36 में अर्जुन पूछते हैं कि मनुष्य न चाहते हुए भी पाप कर्म क्यों करता है। वे जानना चाहते हैं कि कौन-सी शक्ति मनुष्य को उसकी इच्छा के विरुद्ध भी पाप की ओर प्रेरित करती है।
अगर इंसान सही और गलत जानता है, तो फिर गलत काम हो कैसे जाता है?
हम सबने कभी न कभी यह अनुभव किया है — हम जानते हैं कि क्या नहीं करना चाहिए, फिर भी वही कर बैठते हैं।
भगवद्गीता 3:36 में अर्जुन यही प्रश्न श्रीकृष्ण से सीधे पूछते हैं।
भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग
इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है।
गीता 3:36 – गलत कर्म के पीछे छिपी शक्ति कौन-सी है?
गीता 3:35 में श्रीकृष्ण स्वधर्म की बात करते हैं।
अब अर्जुन एक बहुत मानवीय प्रश्न पूछते हैं — अगर स्वधर्म ही श्रेष्ठ है, तो फिर मनुष्य अपने ही विरुद्ध क्यों चला जाता है?
📜 भगवद्गीता 3:36 – मूल संस्कृत श्लोक
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥
![]() |
| जब मनुष्य स्वयं नहीं चाहता, फिर भी गलत क्यों कर बैठता है? |
📖 गीता 3:36 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद
अर्जुन:
हे श्रीकृष्ण,
मनुष्य न चाहते हुए भी
पाप क्यों करता है?
अर्जुन:
किस बल से प्रेरित होकर
वह मानो
विवश होकर गलत कर्म
कर बैठता है?
श्रीकृष्ण:
(उत्तर अगले श्लोक में देते हैं…)
मनुष्य विवश होकर पाप क्यों करता है?
👉 यह प्रश्न अध्याय 3 के गहन रहस्य का द्वार खोलता है।
🔍 श्लोक का सरल भावार्थ
अर्जुन पूछते हैं — हे कृष्ण, मनुष्य किसके द्वारा प्रेरित होकर पाप (गलत कर्म) करता है?
वह तो ऐसा करना नहीं चाहता, फिर भी मानो किसी बल से उससे गलत कार्य हो जाता है।
🧠 यह प्रश्न इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
यह प्रश्न किसी दार्शनिक का नहीं, एक साधारण इंसान का है।
अर्जुन यह नहीं पूछ रहे — “पाप क्या है?”
वे पूछ रहे हैं — “मैं खुद अपने नियंत्रण में क्यों नहीं रहता?”
यही प्रश्न आज भी हर इंसान के भीतर है।
⚖️ “अनिच्छन्नपि” – न चाहते हुए भी
इस श्लोक का सबसे गहरा शब्द है — अनिच्छन्नपि।
इसका अर्थ है — इच्छा न होते हुए भी।
यह बताता है कि गलत कर्म हमेशा योजनाबद्ध नहीं होते,
कई बार वे अचानक, आवेग में, बिना सोच-समझ के हो जाते हैं।
🌍 आधुनिक जीवन में गीता 3:36
आज लोग कहते हैं —
- “मुझे गुस्सा नहीं करना था”
- “मुझे यह बात नहीं कहनी चाहिए थी”
- “मुझे यह आदत फिर नहीं दोहरानी थी”
फिर भी वही गलती हो जाती है।
अर्जुन का प्रश्न आज के मनुष्य का प्रश्न है।
👤 वास्तविक जीवन का उदाहरण (कहानी के साथ)
मान लीजिए एक व्यक्ति है जो अपने गुस्से को लेकर खुद से परेशान है।
वह जानता है कि गुस्सा उसके रिश्तों को नुकसान पहुँचाता है।
वह कई बार ठान लेता है — “आज शांत रहूँगा, आज प्रतिक्रिया नहीं दूँगा।”
लेकिन जैसे ही कोई उसकी बात काट देता है या उसे नीचा दिखाता है,
वह बिना सोचे तेज़ आवाज़ में बोल उठता है।
बाद में उसे पछतावा होता है — “मैं ऐसा क्यों कर बैठा? मैं तो ऐसा नहीं चाहता था।”
यही “बलादिव नियोजितः” है — मानो कोई आंतरिक शक्ति उसे धकेल रही हो।
गीता 3:36 यह स्वीकार करती है कि मनुष्य पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है।
उसके भीतर कुछ ऐसी शक्तियाँ हैं जो विवेक से तेज़ काम करती हैं।
🧠 अर्जुन की ईमानदारी
यहाँ अर्जुन स्वयं को सही ठहराने की कोशिश नहीं करता।
वह यह नहीं कहता — “मैं मजबूर हूँ, इसलिए दोषी नहीं।”
वह समझना चाहता है — असल कारण क्या है?
यही ईमानदारी आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत है।
✨ गीता 3:36 का केंद्रीय संदेश
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि गलत कर्म के पीछे कोई एक साधारण कारण नहीं होता।
मनुष्य के भीतर ऐसी शक्तियाँ होती हैं जो उसे विवेक के विरुद्ध खींचती हैं।
उन शक्तियों को पहचाने बिना परिवर्तन संभव नहीं।
🧭 निष्कर्ष
गीता 3:36 हमें दोषी ठहराने नहीं, समझाने आई है।
यह बताती है कि यदि हम बार-बार वही गलती कर रहे हैं,
तो समस्या नैतिकता की नहीं, अंदर काम कर रही शक्ति की है।
अगले श्लोक में श्रीकृष्ण इस शक्ति का नाम बताएँगे।
मनुष्य अपनी इच्छा के विरुद्ध भी पाप की ओर क्यों आकर्षित हो जाता है? भगवद गीता 3:36 में काम और क्रोध को इस आंतरिक संघर्ष का मुख्य कारण बताया गया है।
🔗 इस विषय को विभिन्न माध्यमों पर समझें:
📌 Pinterest (Visual Insight)
👉 गीता श्लोक का भावार्थ देखें
💼 LinkedIn (Life Lessons)
👉 जीवन में काम और क्रोध की भूमिका पढ़ें
▶️ YouTube (गीता वीडियो)
👉 गीता 3:36 पर वीडियो देखें
📘 भगवद गीता 3:36 – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
🕉️ गीता 3:36 में अर्जुन क्या प्रश्न पूछते हैं?
अर्जुन पूछते हैं कि मनुष्य न चाहते हुए भी पाप क्यों करता है और कौन-सी शक्ति उसे विवश करती है।
यह प्रश्न क्यों महत्वपूर्ण है?
क्योंकि यह मानव स्वभाव की गहरी समस्या को उजागर करता है—इच्छा के विरुद्ध भी गलत कर्म क्यों हो जाते हैं।
🧠 क्या गीता 3:36 मनोविज्ञान से जुड़ा प्रश्न है?
हाँ, यह श्लोक मानव मन के आंतरिक संघर्ष और इच्छाओं की शक्ति को समझने का प्रयास है।
⚖️ क्या हर व्यक्ति इस स्थिति का अनुभव करता है?
हाँ, कभी-कभी व्यक्ति सही जानते हुए भी गलत कर बैठता है; यही अर्जुन का प्रश्न है।
🕊️ गीता 3:36 का मुख्य संदेश क्या है?
मनुष्य के भीतर ऐसी शक्ति है जो उसे विवश कर सकती है; इस रहस्य को समझना आत्म-विकास की दिशा में पहला कदम है।
अपने स्वधर्म पर अडिग रहना क्यों श्रेष्ठ है और परधर्म भय का कारण कैसे बनता है— इस गहन शिक्षा को समझें।
👉 स्वधर्म और परधर्म – गीता 3:35
काम और क्रोध राजोगुण से उत्पन्न होकर मनुष्य के वास्तविक शत्रु कैसे बनते हैं— इस गहरे सत्य को जानें।
👉 काम, क्रोध और राजोगुण का शत्रु – गीता 3:37
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि न मैं कभी नष्ट हुआ था, न तुम, और न ही ये सभी राजा। भगवद गीता अध्याय 2 श्लोक 12 आत्मा की नित्य उपस्थिति और अमरता का मूल सत्य प्रकट करता है।
👉 आत्मा की नित्य सत्ता का अर्थ पढ़ें
✍️ लेखक के बारे में
Bhagwat Geeta by Sun एक जीवन-दर्शन आधारित आध्यात्मिक मंच है, जहाँ श्रीमद्भगवद्गीता को मानव मन, भावनाओं और निर्णय-संघर्ष से जोड़कर सरल और व्यावहारिक भाषा में प्रस्तुत किया जाता है।
इस मंच का उद्देश्य गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि आत्म-समझ और आत्म-नियंत्रण की विश्वसनीय मार्गदर्शिका बनाना है।
यह लेख केवल शैक्षिक, आध्यात्मिक और आत्म-विकास के उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय, कानूनी या वित्तीय सलाह नहीं है। भगवद्गीता की व्याख्या विभिन्न परंपराओं और दृष्टिकोणों के अनुसार भिन्न हो सकती है। पाठक अपने विवेक का प्रयोग करें।
Bhagavad Gita 3:36 – Why We Act Against Our Own Better Judgment
Why do intelligent people still make choices they later regret? Why does willpower fail at crucial moments? Bhagavad Gita 3:36 asks a question that feels deeply modern.
Bhagavad Gita 3:36 – Shlok (English Letters)
Arjuna uvāca |
Athā kena prayukto ’yaṁ
pāpaṁ carati pūruṣaḥ |
Anicchann api vārṣṇeya
balād iva niyojitaḥ ||
Explanation
In Bhagavad Gita 3:36, Arjuna raises a powerful psychological question. He asks Krishna why a person commits harmful actions even when they do not want to, as if pushed by an unseen force.
This verse marks a turning point in the chapter. Until now, Krishna has explained action, duty, and self-control. Here, Arjuna voices a universal human confusion: the gap between understanding and behavior. Knowing what is right does not always prevent wrongdoing.
Arjuna’s question recognizes inner conflict. He senses that something stronger than logic drives people toward destructive choices. This honesty makes the teaching practical. The Gita does not ignore human weakness; it investigates it.
For a global modern audience, this verse feels strikingly relevant. People struggle with habits, addictions, impulsive decisions, and ethical compromises. Bhagavad Gita 3:36 frames the problem clearly: the issue is not lack of knowledge, but the presence of an inner force that overrides intention.
Real-Life Example
Consider a well-informed professional who understands the health risks of chronic overwork yet continues ignoring rest. Despite knowing better, emails are answered late at night, boundaries are crossed, and burnout follows. This gap between intention and action mirrors Arjuna’s question in Bhagavad Gita 3:36.
The verse prepares the ground for identifying the true inner obstacle. Before solutions appear, the problem must be named honestly.
Frequently Asked Questions
He asks why people commit wrong actions even when they know better and do not wish to.
Because it highlights the conflict between knowledge and behavior.
No. It points toward an inner psychological force that needs to be understood.
It explains modern struggles with habits, impulses, and self-sabotage.
It sets the stage for identifying desire and anger as the real inner enemies.

Comments
Post a Comment