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यह वेबसाइट किस लिए है?

BhagwatGeetaBySun.com एक आध्यात्मिक एवं जीवन-मार्गदर्शन वेबसाइट है, जहाँ भगवद गीता के श्लोकों को सरल भाषा में समझाकर उन्हें आज के जीवन की वास्तविक समस्याओं से जोड़ा जाता है।

  • गीता के श्लोकों का व्यावहारिक अर्थ
  • तनाव, क्रोध और चिंता से मुक्ति
  • मन को शांत और स्थिर रखने की कला
  • कर्मयोग द्वारा सही निर्णय

What is BhagwatGeetaBySun.com?

BhagwatGeetaBySun.com is a spiritual and life-guidance website that explains the wisdom of the Bhagavad Gita in a simple, practical, and modern context to help people gain clarity, peace, and balance in life.

भगवद गीता 2:68 – इंद्रिय संयम से स्थिर बुद्धि की पहचान

क्या आपने कभी किसी ऐसे इंसान को देखा है जो मुश्किल हालात में भी शांत रहता है, जबकि बाकी लोग घबरा जाते हैं? ऐसा लगता है जैसे बाहरी दुनिया उसे हिला नहीं पा रही।

भगवद गीता 2:68 उसी आंतरिक स्थिरता का रहस्य बताती है। यह श्लोक समझाता है कि जब इंद्रियाँ अपने-अपने विषयों से पीछे हट जाती हैं, तब मनुष्य की बुद्धि स्थिर हो जाती है।


भगवद गीता 2:68 – मूल श्लोक

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥
भगवद गीता 2:68 का दृश्य जिसमें श्रीकृष्ण रथ पर पाँच सफ़ेद घोड़ों के साथ शांत हैं, अर्जुन स्थिर और संयमित अवस्था में खड़े हैं तथा पीछे कुरुक्षेत्र की सेनाएँ दिखाई दे रही हैं
जब इन्द्रियाँ विषयों से हटकर संयम में आ जाती हैं,
तभी मन स्थिर होता है —यही भगवद गीता 2:68 का शाश्वत संदेश है।

📖 गीता 2:68 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद

अर्जुन:
हे श्रीकृष्ण, स्थिर बुद्धि वाले मनुष्य की पहचान क्या है?

श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन, जिसकी इंद्रियाँ सभी ओर से संयमित रहती हैं, वही मनुष्य स्थिर बुद्धि कहलाता है।

अर्जुन:
क्या केवल इंद्रियों का संयम ही पर्याप्त है, प्रभु?

श्रीकृष्ण:
हाँ अर्जुन। जब इंद्रियाँ विषयों से हटकर आत्मा में स्थित हो जाती हैं, तब बुद्धि अडिग हो जाती है।

अर्जुन:
और ऐसी बुद्धि का फल क्या होता है, हे माधव?

श्रीकृष्ण:
ऐसा मनुष्य न आकर्षण में बहता है, न भय में डगमगाता है। वही परम शांति और आत्मिक संतुलन को प्राप्त करता है।


🪷 इंद्रिय-संयम → स्थिर बुद्धि → परम शांति

👉 जो स्वयं पर विजय पा लेता है, वही संसार में शांत रहता है।


सरल अर्थ

हे महाबाहु अर्जुन! जिस व्यक्ति की इंद्रियाँ अपने-अपने विषयों से पूरी तरह संयमित हो जाती हैं, उसकी बुद्धि स्थिर और दृढ़ हो जाती है।


यह श्लोक वास्तव में क्या सिखाता है?

गीता 2:68 कोई कठोर त्याग की बात नहीं करती। यह श्लोक आत्म-नियंत्रण की बात करता है — ऐसा नियंत्रण जो डर या दबाव से नहीं, बल्कि समझ से पैदा होता है।

जब इंद्रियाँ हर समय बाहर की ओर दौड़ती रहती हैं, तो मन कभी ठहर नहीं पाता। लेकिन जब व्यक्ति यह सीख लेता है कि कहाँ रुकना है, तब भीतर एक स्थिरता जन्म लेती है।

यह स्थिरता ही प्रज्ञा की स्थिरता है।


एक वास्तविक जीवन उदाहरण

मान लीजिए कोई व्यक्ति सोशल मीडिया का उपयोग करता है, लेकिन वह हर पोस्ट, हर तुलना, हर टिप्पणी से खुद को नहीं जोड़ता।

वह देखता है, समझता है, लेकिन प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर नहीं होता।

धीरे-धीरे उसका मन हल्का रहता है, आत्मविश्वास स्थिर रहता है, और निर्णय बाहरी शोर से प्रभावित नहीं होते।

यही स्थिति गीता 2:68 बताती है — इंद्रियाँ हैं, पर उनका नियंत्रण हमारे हाथ में है।


इंद्रिय-संयम और मानसिक शक्ति

इस श्लोक की गहराई यह है कि यह इंद्रिय-संयम को कमजोरी नहीं, बल्कि शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है।

जो व्यक्ति हर आकर्षण पर प्रतिक्रिया नहीं देता, वह भीतर से अधिक मजबूत होता है।

यही कारण है कि शांत लोग अक्सर सबसे स्पष्ट निर्णय लेते हैं।


अर्जुन के लिए गीता 2:68 का अर्थ

अर्जुन का संघर्ष केवल युद्ध का नहीं था, बल्कि उसकी इंद्रियाँ डर, मोह और स्मृतियों से जुड़ी हुई थीं।

श्रीकृष्ण उसे यह दिखा रहे हैं कि जब तक इंद्रियाँ मन को खींचती रहेंगी, तब तक बुद्धि स्थिर नहीं हो पाएगी।

इसलिए यह श्लोक अर्जुन को बाहरी नहीं, भीतरी नियंत्रण का मार्ग दिखाता है।


निष्कर्ष: स्थिरता ही शक्ति है

गीता 2:68 हमें यह सिखाती है कि सच्ची शक्ति बाहर से नहीं, भीतर से आती है।

जब इंद्रियाँ संयम में होती हैं, तो मन शांत होता है, और जब मन शांत होता है, तो बुद्धि स्थिर हो जाती है।

जो स्वयं को नियंत्रित कर लेता है, वही जीवन को सही दिशा दे पाता है।

📘 भगवद गीता 2:68 – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

🕉️ गीता 2:68 में श्रीकृष्ण क्या बताते हैं?
श्रीकृष्ण बताते हैं कि जिसकी इंद्रियाँ सभी विषयों से हटकर संयम में रहती हैं, वही व्यक्ति स्थिर बुद्धि वाला होता है।

🧠 स्थिर बुद्धि वाले मनुष्य की पहचान क्या है?
स्थिर बुद्धि वाला मनुष्य न आकर्षण में बहता है और न ही भय या दुःख में विचलित होता है।

🪷 इंद्रियों का संयम क्यों आवश्यक है?
इंद्रियों का संयम मन को भटकने से बचाता है और बुद्धि को स्थिर बनाए रखता है।

🌿 क्या गीता 2:68 आज के जीवन में उपयोगी है?
हाँ, यह श्लोक आधुनिक जीवन में आत्मनियंत्रण, मानसिक संतुलन और आंतरिक शांति के लिए अत्यंत उपयोगी है।

🙏 गीता 2:68 का मुख्य संदेश क्या है?
स्वयं पर नियंत्रण और इंद्रिय-संयम से ही परम शांति और स्थिर बुद्धि प्राप्त होती है।


Disclaimer:
यह लेख भगवद गीता के श्लोक 2:68 की आध्यात्मिक एवं जीवनोपयोगी व्याख्या प्रस्तुत करता है। यह सामग्री केवल शैक्षिक उद्देश्य से है और किसी भी प्रकार की पेशेवर सलाह का विकल्प नहीं है।

Bhagavad Gita 2:68 – The Natural State of Steady Wisdom

What does inner stability actually look like in real life? Bhagavad Gita 2:68 answers this by describing the condition of a person whose senses are fully under conscious control. Lord Krishna explains that when the senses are withdrawn from their objects, the intellect becomes firmly established.

This verse does not teach suppression or rejection of the senses. Instead, it explains mastery. A wise person does not allow the senses to dictate decisions, emotions, or direction in life. The senses function, but they no longer dominate the mind.

When the mind stops running outward toward constant stimulation, it naturally becomes quiet and focused. In that stillness, clarity develops. A stable intellect means the person is no longer shaken by attraction, temptation, praise, or criticism. Life continues, but the inner center remains steady.

In the modern world, this teaching is extremely relevant. People are surrounded by screens, noise, opinions, and endless sensory input. When attention is continuously pulled outward, mental energy becomes scattered and exhausted. This verse explains that wisdom becomes firm only when attention is consciously guided inward.

Bhagavad Gita 2:68 reminds us that real strength is inner stability. A person with steady wisdom may live an active, engaged life, yet remains emotionally balanced and mentally clear. Such inner steadiness leads to better decisions, calm reactions, and a deep sense of freedom that does not depend on external conditions.


Frequently Asked Questions

What is the main message of Bhagavad Gita 2:68?

It teaches that true wisdom becomes stable when the senses are under conscious control.

Does this verse promote withdrawal from life?

No. It promotes inner discipline while actively living in the world.

How does sense control help daily life?

It reduces impulsive reactions and supports calm, thoughtful decision-making.

Is this teaching relevant in the digital age?

Yes. It directly addresses distraction, overstimulation, and loss of focus in modern life.

What is the result of steady wisdom?

Mental clarity, emotional balance, inner confidence, and lasting peace.

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