उत्तर: गीता 3:38 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि जैसे धुएँ से अग्नि, धूल से दर्पण और गर्भ से भ्रूण ढका रहता है, उसी प्रकार कामना ज्ञान को ढक लेती है और मनुष्य की विवेक शक्ति को कमजोर कर देती है।
कभी ऐसा लगा है कि सच सामने होते हुए भी दिखाई नहीं देता?
हम जानते हैं कि क्या सही है, फिर भी वही गलत निर्णय ले लेते हैं।
भगवद्गीता 3:38 बताती है कि समस्या ज्ञान की कमी नहीं, बल्कि उस पर पड़ा हुआ एक आवरण है।
भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग
इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है।
गीता 3:38 – जब इच्छा बुद्धि को ढक लेती है
गीता 3:37 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि काम और क्रोध मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं।
गीता 3:38 समझाती है कि यह शत्रु काम कैसे हमारे विवेक को धीरे-धीरे ढक लेता है।
📜 भगवद्गीता 3:38 – मूल संस्कृत श्लोक
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च ।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥
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| वासना का आवरण ज्ञान की चमक को मंद कर देता है |
📖 गीता 3:38 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद
श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन,
जैसे अग्नि धुएँ से ढकी रहती है,
जैसे दर्पण धूल से ढक जाता है,
और जैसे गर्भ भ्रूण से आच्छादित होता है,
श्रीकृष्ण:
उसी प्रकार
ज्ञान कामना द्वारा ढक जाता है।
अर्जुन:
तो हे माधव,
क्या इच्छा ही ज्ञान को
छिपा देती है?
श्रीकृष्ण:
हाँ अर्जुन।
जब मनुष्य की बुद्धि
इच्छाओं से आच्छादित हो जाती है,
तब उसका
सत्य ज्ञान प्रकट नहीं होता।
🔥 धुआँ जैसे अग्नि को ढकता है, वैसे ही कामना ज्ञान को ढक देती है
👉 ज्ञान नष्ट नहीं होता, बस इच्छाओं की धूल से ढक जाता है।
🔍 श्लोक का सरल भावार्थ
श्रीकृष्ण कहते हैं — जैसे आग धुएँ से ढक जाती है,
जैसे दर्पण मैल से ढक जाता है,
और जैसे गर्भ आवरण में छिपा रहता है,
वैसे ही यह ज्ञान काम (इच्छा) से ढका रहता है।
🧠 तीन उदाहरण — तीन स्तर
श्रीकृष्ण यहाँ तीन अत्यंत गहरे उदाहरण देते हैं:
- आग और धुआँ – हल्का आवरण (सच दिखता है, पर स्पष्ट नहीं)
- दर्पण और मैल – मध्यम आवरण (सच विकृत हो जाता है)
- गर्भ और आवरण – गहरा आवरण (सच दिखाई ही नहीं देता)
इसका अर्थ है — इच्छा हर व्यक्ति की बुद्धि को अलग-अलग स्तर पर ढकती है।
⚖️ इच्छा ज्ञान को कैसे ढकती है?
इच्छा सीधे ज्ञान को नष्ट नहीं करती।
वह उसे धुंधला कर देती है।
तभी व्यक्ति कहता है —
- “मुझे पता है, लेकिन…”
- “इस बार अलग होगा”
- “सब ऐसा ही करते हैं”
यही ढका हुआ विवेक है।
🌍 आधुनिक जीवन में गीता 3:38
आज लोग जानते हैं कि अत्यधिक लालच, तुलना और लत नुकसानदायक है।
फिर भी वही करते हैं, क्योंकि इच्छा उनकी बुद्धि पर परदा डाल देती है।
गीता 3:38 बताती है — गलती जानकारी की नहीं, दृष्टि की है।
👤 वास्तविक जीवन का उदाहरण (गहराई से)
मान लीजिए एक व्यक्ति है जो जानता है कि किसी गलत सौदे में शामिल होना उसकी नैतिकता के विरुद्ध है।
लेकिन उस सौदे से तेज़ पैसा मिलने की संभावना है।
शुरुआत में उसका विवेक चेतावनी देता है — “यह सही नहीं है।”
लेकिन इच्छा धीरे-धीरे उस चेतावनी को ढकने लगती है।
वह खुद से कहता है — “सिर्फ एक बार है”, “सब यही करते हैं”, “मैं संभाल लूँगा।”
अब आग धुएँ से ढक चुकी है।
जब वह आगे बढ़ता है, तो विवेक लगभग अदृश्य हो जाता है — दर्पण पर मैल जम चुका है।
और अंततः वह पूरी तरह गलत निर्णय ले लेता है — जैसे गर्भ पूरी तरह आवरण में छिपा हो।
बाद में जब परिणाम सामने आते हैं, तो वह कहता है — “मुझे पहले ही समझ जाना चाहिए था।”
यही गीता 3:38 का जीवंत उदाहरण है।
🧠 श्रीकृष्ण की सूक्ष्म चेतावनी
श्रीकृष्ण यह नहीं कहते कि इच्छा तुरंत पाप कराती है।
वे कहते हैं — इच्छा पहले बुद्धि को ढकती है,
फिर निर्णय बिगाड़ती है,
और अंततः व्यक्ति को गिरा देती है।
इसलिए इसे पहचानना सबसे ज़रूरी है।
✨ गीता 3:38 का केंद्रीय संदेश
यह श्लोक सिखाता है कि जब भी विवेक धुंधला लगे,
तो समझ लो — कहीं न कहीं इच्छा सक्रिय है।
इच्छा को पहचानना ही ज्ञान को मुक्त करना है।
🧭 निष्कर्ष
गीता 3:38 हमें यह सिखाती है कि सच कभी नष्ट नहीं होता,
वह केवल ढक जाता है।
जब आवरण हटता है, तो विवेक स्वतः प्रकट हो जाता है।
अगले श्लोक में श्रीकृष्ण बताएँगे कि यह इच्छा कहाँ-कहाँ निवास करती है।
📘 भगवद गीता 3:38 – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
🕉️ गीता 3:38 में श्रीकृष्ण क्या उदाहरण देते हैं?
श्रीकृष्ण तीन उदाहरण देते हैं—अग्नि पर धुआँ, दर्पण पर धूल और गर्भ में भ्रूण—ताकि समझा सकें कि इच्छा (काम) ज्ञान को ढक देती है।
🔥 इन उदाहरणों का क्या अर्थ है?
इनका अर्थ है कि ज्ञान नष्ट नहीं होता, बल्कि इच्छाओं की परत से ढक जाता है।
🧠 क्या काम पूरी तरह ज्ञान को समाप्त कर देता है?
नहीं, काम ज्ञान को समाप्त नहीं करता, बल्कि उसे अस्थायी रूप से आच्छादित कर देता है।
⚠️ गीता 3:38 में मुख्य चेतावनी क्या है?
अनियंत्रित इच्छाएँ व्यक्ति की बुद्धि को ढक देती हैं और उसे सत्य से दूर कर देती हैं।
🕊️ गीता 3:38 का मुख्य संदेश क्या है?
इच्छाओं पर नियंत्रण रखकर ही मनुष्य अपने वास्तविक ज्ञान को प्रकट कर सकता है।
📖 गीता 1.35 की व्याख्या पढ़ें
✍️ लेखक के बारे में
Bhagwat Geeta by Sun एक जीवन-दर्शन आधारित आध्यात्मिक मंच है, जहाँ श्रीमद्भगवद्गीता को मानव विवेक, इच्छाओं और निर्णय-संघर्ष से जोड़कर सरल और प्रामाणिक भाषा में प्रस्तुत किया जाता है।
इस मंच का उद्देश्य गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि विवेक को जगाने वाली मार्गदर्शिका के रूप में स्थापित करना है।
यह लेख केवल शैक्षिक, आध्यात्मिक और आत्म-विकास के उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय, कानूनी या वित्तीय सलाह नहीं है। भगवद्गीता की व्याख्या विभिन्न परंपराओं और दृष्टिकोणों के अनुसार भिन्न हो सकती है। पाठक अपने विवेक का प्रयोग करें।
Bhagavad Gita 3:38 – How Desire Covers Our Natural Wisdom
Why do people lose clarity even when they are intelligent and experienced? Bhagavad Gita 3:38 explains how inner wisdom gets gradually covered.
Bhagavad Gita 3:38 – Shlok (English Letters)
Dhūmenāvriyate vahnir
yathādarśo malena ca |
Yatholbenāvṛto garbhas
tathā tenedam āvṛtam ||
Explanation
In Bhagavad Gita 3:38, Lord Krishna uses powerful metaphors to explain how desire hides inner wisdom. Just as fire is covered by smoke, a mirror is obscured by dust, and a child is enclosed within the womb, wisdom becomes veiled by desire.
Krishna shows that wisdom is never destroyed. It is only covered to different degrees. Sometimes clarity is slightly clouded, like fire behind smoke. Sometimes it is heavily obscured, like a mirror thick with dust. And sometimes it is almost completely hidden, like a child in the womb.
This verse explains why people fall into repeated mistakes. The problem is not absence of intelligence, but the presence of desire that distorts perception. Desire bends judgment, prioritizes short-term pleasure, and weakens long-term vision.
For a modern global audience, this insight is deeply relevant. Digital distractions, ambition, and comparison continuously add “dust” to the mind. Bhagavad Gita 3:38 reminds us that clarity returns not by gaining more information, but by removing inner obstructions.
Real-Life Example
Consider an experienced entrepreneur who once made calm, ethical decisions. As success grows, desire for rapid expansion increases. Gradually, shortcuts appear acceptable, stress rises, and judgment weakens. The wisdom did not disappear — it was covered by desire. When the entrepreneur slows down and realigns values, clarity returns. This reflects the teaching of Bhagavad Gita 3:38.
The verse teaches that self-mastery is a process of uncovering, not acquiring. When desire is reduced, wisdom naturally shines again.
Frequently Asked Questions
It teaches that desire covers wisdom without destroying it.
To show different degrees of how wisdom can be obscured.
No. It is temporarily covered, not destroyed.
It explains loss of clarity in desire-driven and distracted lifestyles.
Reducing desire to uncover natural clarity and judgment.

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