उत्तर: गीता 3:13 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि यज्ञ से उत्पन्न अन्न को ग्रहण करने वाले सज्जन पुरुष सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं। जो लोग केवल अपने लिए भोजन पकाते हैं, वे वास्तव में पाप का ही सेवन करते हैं।
हम रोज़ भोजन करते हैं, लेकिन शायद ही कभी यह सोचते हैं कि हम जो खा रहे हैं, वह केवल शरीर को नहीं, हमारे मन और विचारों को भी प्रभावित करता है।
भगवद गीता 3:13 भोजन को सिर्फ भोग नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक विषय बनाती है। यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि भोजन भी जिम्मेदारी के साथ जुड़ा है।
भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग
इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है।
भगवद गीता 3:13 – मूल श्लोक
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः। भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥
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| भगवद गीता 3:13 बताता है कि यज्ञ से प्राप्त अन्न का भोग करने वाला मनुष्य पाप से मुक्त होता है। |
📖 गीता 3:13 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद
अर्जुन:
हे श्रीकृष्ण,
यज्ञ और अर्पण की बात
आप बार-बार करते हैं।
इसका जीवन से
क्या गहरा संबंध है?
श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन,
यज्ञ से शुद्ध हुआ अन्न
खाने वाले
सभी पापों से मुक्त
हो जाते हैं।
अर्जुन:
और जो केवल अपने लिए
भोजन पकाता है, प्रभु?
श्रीकृष्ण:
जो लोग
केवल अपने सुख के लिए
भोजन बनाते हैं,
वे वास्तव में
पाप ही खाते हैं।
अर्जुन:
तो हे माधव,
क्या हर कर्म में
समर्पण आवश्यक है?
श्रीकृष्ण:
हाँ अर्जुन।
जब कर्म
यज्ञ-भाव से होता है,
तभी वह
शुद्धि और मुक्ति
का कारण बनता है।
🍚 यज्ञ से शुद्ध अन्न = पापों से मुक्ति 🍚 स्वार्थ से भोग = बंधन
👉 जो बाँटकर खाता है, वही वास्तव में शुद्ध होता है।
सरल अर्थ
यज्ञ से शेष बचे हुए अन्न को खाने वाले सज्जन पुरुष सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं। लेकिन जो लोग केवल अपने लिए भोजन पकाते हैं, वे पाप ही भोगते हैं।
यह श्लोक क्या मूल संदेश देता है?
यहाँ “यज्ञशिष्ट” का अर्थ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि वह अन्न है जो कर्तव्य और कृतज्ञता की भावना से जुड़ा हो।
जब भोजन केवल “मेरे लिए” बनता है, तो वह भोग बन जाता है।
लेकिन जब भोजन साझा करने, सेवा और संतुलन से जुड़ता है, तो वही भोजन शुद्धि का साधन बन जाता है।
आज के जीवन में यह शिक्षा कैसे दिखती है?
आज हम तेजी से खाने लगे हैं — बिना सोच, बिना संवेदना।
खाने का उद्देश्य पोषण नहीं, सिर्फ संतुष्टि बन गया है।
गीता 3:13 याद दिलाती है कि भोजन का संबंध केवल स्वाद से नहीं, चेतना से भी है।
एक वास्तविक जीवन उदाहरण
मान लीजिए एक परिवार जहाँ भोजन केवल अपनी सुविधा के अनुसार बनता है, और बचे हुए अन्न को फेंक दिया जाता है।
वहीं दूसरा परिवार भोजन बनाते समय जरूरतमंदों और प्रकृति का ध्यान रखता है।
पहले घर में भोग है, दूसरे में संतोष।
यही अंतर गीता 3:13 बताती है — भोजन की भावना जीवन की गुणवत्ता तय करती है।
पाप और पुण्य का गीता दृष्टिकोण
गीता में पाप का अर्थ सिर्फ धार्मिक अपराध नहीं, बल्कि वह कर्म है जो असंतुलन पैदा करे।
जब हम केवल अपने लिए जीते हैं, तो वही जीवन अशांति को जन्म देता है।
साझेदारी और कृतज्ञता मन को शुद्ध करती है।
अर्जुन के संदर्भ में यह शिक्षा
अर्जुन युद्ध को पाप समझकर पीछे हट रहा था।
श्रीकृष्ण उसे दिखा रहे हैं कि पाप कर्म की प्रकृति से नहीं, भावना से तय होता है।
कर्तव्य और संतुलन से किया गया कर्म बंधन नहीं बनता।
निष्कर्ष: भोग नहीं, भाव शुद्ध करें
गीता 3:13 हमें यह सिखाती है कि जीवन की शुद्धता छोटी-छोटी आदतों से बनती है।
जब भोजन भी जिम्मेदारी और कृतज्ञता से जुड़ता है, तो वही भोजन मन को हल्का करता है।
जो साझा करता है, वही भीतर से मुक्त होता है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न – गीता 3:13❓️
भगवद गीता 3:13 का मुख्य संदेश क्या है?
यह श्लोक सिखाता है कि सेवा और यज्ञभाव से प्राप्त अन्न का सेवन पापों से मुक्ति देता है।
यहाँ यज्ञशिष्ट अन्न का क्या अर्थ है?
यज्ञशिष्ट अन्न का अर्थ है वह अन्न जो सेवा, दान और कर्तव्य के बाद ग्रहण किया जाए।
स्वार्थ से किया गया कर्म दोषपूर्ण क्यों है?
क्योंकि केवल अपने लिए किया गया कर्म अहंकार और बंधन को बढ़ाता है।
आज के जीवन में गीता 3:13 कैसे उपयोगी है?
यह श्लोक सिखाता है कि भोजन, धन और संसाधनों का उपयोग समाज के प्रति जिम्मेदारी के साथ करना चाहिए।
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यह लेख BhagwatGeetaBySun द्वारा लिखा गया है। यह वेबसाइट भगवद गीता के श्लोकों को सरल भाषा में, आधुनिक जीवन की समस्याओं से जोड़कर प्रस्तुत करती है।
लेखक का उद्देश्य आध्यात्मिक ज्ञान को व्यावहारिक रूप में समझाना है, ताकि पाठक कर्मयोग, निष्काम भाव और आत्मिक संतुलन को अपने जीवन में लागू कर सकें।
यह लेख भगवद गीता के श्लोक 3:13 की जीवनोपयोगी एवं दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। यह सामग्री केवल शैक्षिक और आध्यात्मिक उद्देश्य से है और किसी भी प्रकार की पेशेवर सलाह का विकल्प नहीं है।
Bhagavad Gita 3:13 – Selfless Living Purifies the Heart
Why does selfless living bring inner peace, while selfish enjoyment often leads to guilt and dissatisfaction? Bhagavad Gita 3:13 explains this moral and spiritual principle clearly. Lord Krishna teaches that those who eat after offering their actions as sacrifice are freed from sin, while those who cook only for themselves live in bondage.
This verse builds on the idea of yajña, or offering. Krishna is not limiting this teaching to ritual sacrifice alone. He is explaining a way of life. When work is done with gratitude, responsibility, and a sense of contribution, it purifies the mind. Such living aligns personal effort with the greater good.
In contrast, actions performed purely for personal pleasure tighten ego and attachment. When a person works only to satisfy personal desire, the mind becomes restless and fearful. Even enjoyment loses its sweetness, because it carries the burden of selfishness. Krishna calls this bondage, not as punishment, but as a natural inner consequence.
In modern life, this verse is extremely practical. People often feel empty despite comfort and success. Bhagavad Gita 3:13 explains why. When effort is disconnected from service, meaning, or gratitude, fulfillment fades. But when actions are offered for a higher purpose — family, society, duty, or growth — life feels lighter and more balanced.
This verse reminds us that purity is not about moral perfection, but about intention. When daily actions become offerings, the heart becomes clear, relationships improve, and inner peace grows naturally. Giving does not reduce joy — it completes it.
Frequently Asked Questions
It teaches that selfless action purifies the mind, while selfish enjoyment creates bondage.
No. Food symbolizes all enjoyment gained from action.
It means freedom from guilt, ego, and inner disturbance.
Yes. It applies to how we work, earn, and enjoy the results.
By working with gratitude, sharing results, and acting with a sense of contribution.

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