क्या आपने कभी महसूस किया है कि दिमाग लगातार सोचता रहता है, लेकिन कोई भी सोच आपको सुकून नहीं देती? जितना ज़्यादा आप हल निकालने की कोशिश करते हैं, उतना ही मन भारी होता चला जाता है।
भगवद गीता 2:66 उसी मानसिक अवस्था को सीधे छूती है। यह श्लोक बताता है कि जब मन अशांत और भटका हुआ होता है, तो न शांति मिलती है, न स्पष्ट सोच, और न ही जीवन में संतुलन।
भगवद गीता 2:66 – मूल श्लोक
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना। न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्॥
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| जब मन असंयमित होता है, तो न शांति रहती है और न सुख। श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पण ही भगवद गीता 2:66 का मूल संदेश है। |
📖 गीता 2:66 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद
अर्जुन:
हे श्रीकृष्ण, यदि मनुष्य के भीतर शांति न हो,
तो क्या वह सही मार्ग पर चल सकता है?
श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन, जिसके मन में शांति नहीं,
उसकी बुद्धि स्थिर नहीं रहती।
अर्जुन:
और जब बुद्धि स्थिर न हो, प्रभु?
श्रीकृष्ण:
जिसकी बुद्धि स्थिर नहीं होती,
उसके भीतर ध्यान संभव नहीं।
अर्जुन:
यदि ध्यान न हो तो क्या शांति मिल सकती है?
श्रीकृष्ण:
नहीं अर्जुन।
ध्यान के बिना शांति नहीं मिलती,
और शांति के बिना सुख संभव नहीं।
🧘 शांति नहीं → स्थिर बुद्धि नहीं → ध्यान नहीं → सुख नहीं
सरल अर्थ
जिसका मन संयमित नहीं है, उसमें न स्थिर बुद्धि होती है और न ही गहरी समझ। जिसमें समझ नहीं, उसे शांति नहीं मिलती। और जहाँ शांति नहीं, वहाँ सुख की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
यह श्लोक वास्तव में क्या कह रहा है?
यह श्लोक किसी दार्शनिक चर्चा से अधिक, मानव मन की सच्चाई को उजागर करता है। श्रीकृष्ण यहाँ सीधा संबंध बताते हैं:
- भटका हुआ मन → उलझी बुद्धि
- उलझी बुद्धि → गलत निर्णय
- गलत निर्णय → अशांति
- अशांति → जीवन में सुख का अभाव
अक्सर हम मानते हैं कि सुख बाहर की परिस्थितियों से आएगा। लेकिन गीता 2:66 कहती है — अगर भीतर शांति नहीं है, तो बाहर की कोई भी उपलब्धि मन को संतुष्ट नहीं कर सकती।
एक वास्तविक जीवन उदाहरण
मान लीजिए कोई व्यक्ति दिन-रात मेहनत कर रहा है। उसके पास नौकरी है, परिवार है, सब कुछ बाहर से ठीक दिखता है।
लेकिन उसका मन हर समय तुलना में उलझा रहता है — कोई आगे निकल गया, किसी की सैलरी ज़्यादा है, किसी का जीवन बेहतर दिख रहा है।
इस लगातार भटकते मन के कारण वह व्यक्ति न अपने काम में खुश है, न घर में, और न ही खुद से संतुष्ट।
यही स्थिति गीता 2:66 समझाती है — भटका हुआ मन सुख को महसूस ही नहीं कर पाता, चाहे सुख सामने ही क्यों न हो।
मन, बुद्धि और सुख का सीधा संबंध
इस श्लोक की गहराई यह है कि यह सुख को किसी वस्तु से नहीं, एक मानसिक अवस्था से जोड़ता है।
जब मन अस्थिर होता है:
- बुद्धि निर्णय नहीं ले पाती
- हर विकल्प डर पैदा करता है
- मन कभी वर्तमान में नहीं टिकता
और जब मन स्थिर होता है:
- बुद्धि स्पष्ट होती है
- निर्णय शांत होते हैं
- सुख परिस्थिति पर निर्भर नहीं रहता
अर्जुन के जीवन में गीता 2:66 का महत्व
अर्जुन युद्धभूमि में इसलिए टूट नहीं रहा था कि युद्ध कठिन था, बल्कि इसलिए कि उसका मन स्थिर नहीं था।
वह कभी करुणा में बह जाता, कभी भय में, कभी कर्तव्य को लेकर भ्रमित हो जाता।
श्रीकृष्ण उसे यह समझा रहे हैं कि जब तक मन को दिशा नहीं मिलेगी, तब तक बुद्धि भी साथ नहीं देगी। और जहाँ बुद्धि साथ नहीं देती, वहाँ शांति और सुख संभव नहीं।
निष्कर्ष: सुख की जड़ कहाँ है?
गीता 2:66 हमें यह स्पष्ट रूप से बताती है कि सुख कोई लक्ष्य नहीं, बल्कि एक परिणाम है।
जब मन भटका हुआ होता है, तो सुख टिक नहीं पाता। लेकिन जब मन स्थिर होता है, तो साधारण जीवन भी गहराई से संतोष देने लगता है।
जहाँ मन स्थिर है, वहीं बुद्धि स्पष्ट है, और वहीं से सुख की शुरुआत होती है।
📘 भगवद गीता 2:66 – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
🕉️ गीता 2:66 का मुख्य संदेश क्या है?
यह श्लोक सिखाता है कि शांति के बिना न बुद्धि स्थिर होती है, न ध्यान संभव होता है और न ही सच्चा सुख मिलता है।
🧠 शांति न होने से क्या समस्या आती है?
शांति के अभाव में मन चंचल रहता है, निर्णय गलत होते हैं और जीवन असंतुलित हो जाता है।
🧘 ध्यान और शांति का क्या संबंध है?
ध्यान तभी संभव है जब मन शांत हो। अशांत मन ध्यान में टिक नहीं पाता।
🌿 क्या गीता 2:66 आज के जीवन में उपयोगी है?
हाँ, यह श्लोक तनाव, चिंता और अस्थिर जीवनशैली से जूझ रहे लोगों के लिए अत्यंत उपयोगी है।
यह लेख भगवद गीता के श्लोक 2:66 की जीवनोपयोगी और दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। यह सामग्री केवल शैक्षिक और आध्यात्मिक उद्देश्य से है। इसे किसी भी प्रकार की चिकित्सीय, कानूनी या पेशेवर सलाह न माना जाए।
Bhagavad Gita 2:66 – Why an Uncontrolled Mind Destroys Peace
Why do some people have everything in life yet feel restless and unhappy? Bhagavad Gita 2:66 answers this question by explaining the inner cause of suffering. Lord Krishna teaches that without self-control, there is no steady intellect, without a steady intellect there is no peace, and without peace, happiness is impossible.
This verse shows a clear chain reaction inside the human mind. When a person lacks discipline over thoughts and senses, the mind becomes scattered. A scattered mind cannot think clearly, and without clarity, decisions are driven by impulse, fear, or desire.
Krishna explains that peace is not something we can force externally. It arises naturally when the mind is trained and centered. If the mind keeps chasing desires, reacting emotionally, or jumping between worries and distractions, inner peace cannot exist. And when peace is absent, happiness becomes unstable and temporary.
In modern life, this teaching feels extremely relevant. Constant notifications, comparisons, information overload, and emotional pressure keep the mind restless. People often look for happiness in success, possessions, or recognition, but still feel empty inside. This verse explains why — without inner calm, external achievements cannot create lasting joy.
Bhagavad Gita 2:66 reminds us that happiness is an inner condition, not a result of circumstances. By developing self-awareness, emotional regulation, and mental discipline, a person slowly builds peace from within. From that peace comes clarity, and from clarity comes true and lasting happiness.
Frequently Asked Questions
It teaches that without self-control there is no peace, and without peace, true happiness is impossible.
Pleasure is temporary, but peace creates long-term emotional stability and inner satisfaction.
It creates restlessness, confusion, emotional reactions, and poor decision-making.
Yes. It directly addresses distraction, mental overload, and the loss of inner calm in modern life.
Happiness is not external. It naturally arises when the mind becomes peaceful and disciplined.

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