ज्ञानी व्यक्ति को समाज के लिए कर्म क्यों करना चाहिए? – भगवद गीता 3:25

प्रश्न: गीता 3:25 में ज्ञानी और अज्ञानी के कर्म करने में क्या अंतर बताया गया है?

उत्तर: गीता 3:25 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जैसे अज्ञानी व्यक्ति कर्मफल की आसक्ति से कर्म करता है, वैसे ही ज्ञानी पुरुष को भी लोकसंग्रह अर्थात समाज के हित के लिए , आसक्ति छोड़कर कर्म करना चाहिए।

क्या हर व्यक्ति को एक ही तरह से कर्म करना चाहिए?

कई बार हम देखते हैं कि एक ही काम कोई शांति से करता है, तो कोई वही काम तनाव और अहंकार के साथ।

भगवद्गीता 3:25 इसी अंतर को स्पष्ट करती है — और बताती है कि ज्ञानी और अज्ञानी के कर्म में असल फर्क कहाँ होता है।

📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह):
भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग

इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है।


गीता 3:25 – ज्ञानी और अज्ञानी के कर्म में मूल अंतर

गीता 3:24 में श्रीकृष्ण कर्म त्याग से होने वाले सामाजिक पतन की बात करते हैं।

गीता 3:25 यह बताती है कि कर्म करना सभी के लिए आवश्यक है, लेकिन कर्म की भावना सभी के लिए समान नहीं होती।


📜 भगवद्गीता 3:25 – मूल संस्कृत श्लोक

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥


भगवद गीता 3:25 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि जैसे अज्ञान में स्थित व्यक्ति फल की आसक्ति से कर्म करता है, वैसे ही ज्ञान में स्थित विद्वान व्यक्ति को बिना आसक्ति, लोकसंग्रह अर्थात समाज के कल्याण के लिए कर्म करना चाहिए। यह श्लोक निष्काम कर्म, जिम्मेदार नेतृत्व और समाज को सही दिशा देने के सिद्धांत को स्पष्ट करता है।
ज्ञानी का कर्म स्वयं के लिए नहीं, समाज के मार्गदर्शन के लिए होता है

📖 गीता 3:25 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद

अर्जुन:
हे श्रीकृष्ण, यदि अज्ञानी आसक्ति से कर्म करते हैं, तो ज्ञानी का आचरण कैसा होना चाहिए?

श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन, जैसे अज्ञानी आसक्ति से कर्म करते हैं, वैसे ही ज्ञानी को आसक्ति छोड़कर कर्म करना चाहिए।

श्रीकृष्ण:
ज्ञानी का कर्म स्वयं के लिए नहीं, बल्कि लोक-कल्याण के लिए होना चाहिए।


🌱 अज्ञानी: आसक्ति से कर्म 🌱 ज्ञानी: लोक-कल्याण के लिए कर्म

👉 ज्ञानी कर्म छोड़ता नहीं, कर्म को समाज के हित में बदल देता है।

🔍 श्लोक का भावार्थ (सरल शब्दों में)

श्रीकृष्ण कहते हैं — हे अर्जुन, अज्ञानी लोग कर्म को आसक्ति के साथ करते हैं।

ज्ञानी व्यक्ति को भी उसी तरह कर्म करना चाहिए, लेकिन आसक्ति के बिना, ताकि समाज में संतुलन बना रहे।


🧠 यहाँ “अज्ञानी” का क्या अर्थ है?

अज्ञानी का अर्थ मूर्ख नहीं है।

यहाँ अज्ञानी वह है —

  • जो कर्म को ही अपना अस्तित्व मानता है
  • जो परिणाम से अपनी पहचान जोड़ लेता है
  • जो कर्म छोड़ नहीं सकता

ऐसे लोग कर्म करते हैं, क्योंकि वे बंधे हुए हैं।


⚖️ ज्ञानी का कर्म अलग क्यों है?

ज्ञानी व्यक्ति भी कर्म करता है, लेकिन उसके भीतर यह स्पष्ट होता है कि:

  • मैं कर्ता नहीं हूँ
  • कर्म एक जिम्मेदारी है
  • परिणाम मेरी शांति तय नहीं करता

वह कर्म इसलिए करता है क्योंकि समाज को दिशा चाहिए, न कि इसलिए कि उसे कुछ पाना है।


🌍 लोकसंग्रह का वास्तविक अर्थ

लोकसंग्रह का अर्थ है — समाज को टूटने से बचाना।

यदि ज्ञानी लोग कर्म छोड़ दें, तो अज्ञानी लोग आलस्य को ही आदर्श मान लेंगे।

इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि ज्ञानी को कर्म करते रहना चाहिए — ताकि सही उदाहरण बना रहे।


👤 एक वास्तविक जीवन उदाहरण

एक अनुभवी डॉक्टर अब आर्थिक रूप से सुरक्षित है।

वह चाहे तो काम छोड़ सकता है, लेकिन फिर भी वह ईमानदारी से सेवा करता है।

वह कर्म से बंधा नहीं, लेकिन कर्म के लिए उपस्थित है।

यही गीता 3:25 का जीवंत रूप है।


🧠 श्रीकृष्ण का संतुलन सूत्र

श्रीकृष्ण न तो कहते हैं कि ज्ञानी कर्म छोड़ दे,

न यह कि अज्ञानी जैसा बन जाए।

वे कहते हैं — कर्म करो, पर भीतर स्वतंत्र रहो।

यही कर्मयोग की परिपक्व अवस्था है।


✨ गीता 3:25 का केंद्रीय संदेश

यह श्लोक सिखाता है कि कर्म छोड़ना समाधान नहीं,

बल्कि कर्म को सही दृष्टि से करना वास्तविक उन्नति है।

ज्ञानी का कर्म समाज के लिए दीपक बनता है।


🧭 निष्कर्ष

गीता 3:25 हमें यह समझाती है कि सभी लोग एक जैसी स्थिति में नहीं होते,

लेकिन समाज तभी चलता है जब समझदार लोग जिम्मेदारी निभाते हैं।

यही कारण है कि ज्ञानी भी कर्म करता है — लोकसंग्रह के लिए।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न – भगवद गीता 3:25

भगवद गीता 3:25 का मुख्य संदेश क्या है?
गीता 3:25 सिखाती है कि जैसे अज्ञानी लोग आसक्ति के साथ कर्म करते हैं, वैसे ही ज्ञानी व्यक्ति को लोक-संग्रह के लिए बिना आसक्ति के कर्म करना चाहिए।

ज्ञानी और अज्ञानी के कर्म में क्या अंतर है?
अज्ञानी आसक्ति और स्वार्थ से कर्म करता है, जबकि ज्ञानी बिना आसक्ति, समाज के हित में कर्म करता है।

लोक-संग्रह के लिए कर्म क्यों आवश्यक है?
लोक-संग्रह से समाज में संतुलन बना रहता है और लोग सही मार्ग पर चलते हैं।

आज के जीवन में गीता 3:25 कैसे उपयोगी है?
यह श्लोक सिखाता है कि समझदार व्यक्ति को अपने ज्ञान का उपयोग समाज के कल्याण के लिए करना चाहिए, न कि कर्म से दूर भागने के लिए।


🌟 आगे क्या पढ़ें (गीता कर्मयोग)

⬅️ पिछला श्लोक

जब श्रेष्ठ लोग कर्म से पीछे हट जाते हैं, तो समाज में अव्यवस्था क्यों फैलती है— इस गंभीर कारण को यहाँ समझें।

👉 लोक-अव्यवस्था का कारण – गीता 3:24
➡️ अगला श्लोक

ज्ञानी व्यक्ति को समाज में किस प्रकार आचरण करना चाहिए, ताकि अज्ञानियों का मार्गदर्शन हो सके— इस व्यावहारिक शिक्षा को जानें।

👉 ज्ञानी का कर्तव्य – गीता 3:26

🌟 भगवद गीता श्लोक 2:19 – संपूर्ण संग्रह

आत्मा न किसी को मारती है और न मारी जाती है — यह गूढ़ आध्यात्मिक सत्य भगवद गीता अध्याय 2 श्लोक 19 में स्पष्ट रूप से समझाया गया है। यह श्लोक आत्मज्ञान, भयमुक्त जीवन और कर्मबोध की नींव रखता है।

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✍️ लेखक के बारे में

Bhagwat Geeta by Sun एक जीवन-दर्शन आधारित आध्यात्मिक मंच है, जहाँ श्रीमद्भगवद्गीता को आधुनिक जीवन, सामाजिक संतुलन और व्यक्तिगत जिम्मेदारी से जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है।

इस वेबसाइट का उद्देश्य गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि व्यवहारिक जीवन-नीति और कर्मयोग की विश्वसनीय मार्गदर्शिका बनाना है।


Disclaimer:
यह लेख शैक्षिक, आध्यात्मिक और आत्म-विकास के उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय, कानूनी या वित्तीय सलाह नहीं है। भगवद्गीता की व्याख्या परंपरा और दृष्टिकोण के अनुसार भिन्न हो सकती है।

Bhagavad Gita 3:25 – How the Wise Lead Without Confusing Others

Should wise people stop working once they understand life deeply? Bhagavad Gita 3:25 explains why the enlightened continue to act— but with a very different intention.


Bhagavad Gita 3:25 – Shlok

Saktāḥ karmaṇy avidvāṁso yathā kurvanti bhārata |
Kuryād vidvāṁs tathāsaktaś cikīrṣur loka-saṅgraham ||


Explanation

In Bhagavad Gita 3:25, Lord Krishna draws a clear distinction between the actions of the ignorant and the actions of the wise. Those without understanding act with attachment, driven by desire for results. The wise also act—but without attachment.

Krishna emphasizes intention. The wise do not withdraw from work, nor do they act for personal reward. They continue performing their duties to maintain balance and clarity in society. Their purpose is loka-saṅgraha— supporting social harmony without creating confusion.

This verse teaches that wisdom is not proven by inaction. If enlightened individuals suddenly abandon responsibility, others may imitate them incorrectly. Instead, the wise act responsibly, so that society continues to function smoothly.

For a global audience, this teaching is highly relevant. In a world where influence spreads instantly, responsible action matters more than personal detachment. True wisdom expresses itself through calm participation, not withdrawal.

Real-Life Example

Consider a senior judge in a democratic country who has deep legal knowledge and personal integrity. Even after achieving professional fulfillment, she continues serving the judiciary carefully. She does not act for promotion or recognition, but to uphold justice and public trust. Her detached yet responsible action reflects the message of Bhagavad Gita 3:25.

The verse teaches that wisdom should stabilize society, not confuse it. By acting without attachment, the wise guide others through example, while remaining inwardly free.


Frequently Asked Questions

What is the main teaching of Bhagavad Gita 3:25?

It teaches that the wise should act without attachment to guide and stabilize society.

How is the action of the wise different from others?

The wise act without desire for results, while others act with attachment.

Why should the wise continue working?

To prevent confusion and maintain social balance.

Is this verse relevant today?

Yes. It explains responsible leadership in a highly connected global society.

What does loka-saṅgraha mean here?

Acting to support order, clarity, and collective well-being.

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