उत्तर: गीता 3:18 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि आत्मज्ञानी व्यक्ति को न तो कर्म करने से कोई लाभ होता है और न ही कर्म छोड़ने से कोई हानि। वह किसी भी प्राणी पर आश्रित नहीं रहता और आत्मा में ही स्थित रहता है।
भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग
इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है।
क्या जीवन का उद्देश्य केवल कर्म करना है?
या फिर एक ऐसी अवस्था भी होती है, जहाँ मनुष्य कर्म से परे शांति और संतोष का अनुभव करता है?
भगवद्गीता 3:18 इसी गहरे प्रश्न का संतुलित और व्यावहारिक उत्तर देती है।
गीता 3:18 – कर्तव्य से परे आंतरिक स्वतंत्रता
गीता 3:17 में श्रीकृष्ण आत्मतृप्त व्यक्ति की स्थिति बताते हैं। गीता 3:18 उसी विचार को आगे बढ़ाते हुए यह स्पष्ट करती है कि ऐसा व्यक्ति न तो कर्म से कुछ पाता है, न ही अकर्म से कुछ खोता है।
📜 भगवद्गीता 3:18 – मूल संस्कृत श्लोक
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥
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| गीता 3:18 – जो आत्मज्ञान में स्थित है, वह कर्म और अकर्म दोनों से परे होकर मुक्त भाव से जीवन जीता है |
📖 गीता 3:18 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद
अर्जुन:
हे श्रीकृष्ण,
यदि आत्मा में स्थित व्यक्ति
कर्तव्य से मुक्त हो जाता है,
तो उसका संसार से
क्या संबंध रहता है?
श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन,
ऐसे आत्मतृप्त पुरुष को
न कर्म करने से कोई लाभ होता है,
न कर्म छोड़ने से कोई हानि।
श्रीकृष्ण:
वह किसी भी प्राणी पर आश्रित नहीं रहता,
क्योंकि उसकी तृप्ति
स्वयं आत्मा में होती है।
🌿 आत्मतृप्ति = पूर्ण स्वतंत्रता
👉 जो स्वयं में पूर्ण है, वह संसार से अपेक्षा नहीं रखता।
🔍 श्लोक का भावार्थ (सरल शब्दों में)
श्रीकृष्ण कहते हैं — जो व्यक्ति आत्मिक रूप से पूर्ण हो चुका है, उसके लिए कर्म करने से कोई विशेष लाभ नहीं, और कर्म न करने से कोई हानि भी नहीं।
वह किसी भी प्राणी पर अपने हित के लिए निर्भर नहीं रहता।
🧠 इस श्लोक को गलत क्यों समझा जाता है?
कई लोग सोचते हैं कि गीता 3:18 आलस्य या निष्क्रियता को सही ठहराती है।
वास्तव में यह श्लोक अत्यंत उच्च अवस्था का वर्णन करता है, जो साधारण मनुष्य के लिए आदर्श नहीं, बल्कि लक्ष्य है।
यह स्थिति तभी आती है जब भीतर कोई अधूरापन शेष न रहे।
⚖️ कर्म से परे होने का अर्थ क्या है?
कर्म से परे होने का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति कुछ करता ही नहीं।
इसका अर्थ है —
- कर्म से पहचान नहीं बनाना
- फल पर निर्भर न रहना
- स्वार्थ से मुक्त होकर कार्य करना
ऐसा व्यक्ति कर्म करता है, लेकिन कर्म उसे नियंत्रित नहीं करता।
🌍 आधुनिक जीवन में गीता 3:18
आज अधिकांश लोग कर्म इसलिए करते हैं क्योंकि:
- डर है
- लालसा है
- स्वीकृति की चाह है
गीता 3:18 बताती है कि जब ये कारण समाप्त हो जाते हैं, तभी सच्ची स्वतंत्रता जन्म लेती है।
👤 एक वास्तविक जीवन उदाहरण
एक अनुभवी व्यक्ति अपने कार्य को पूरे मन से करता है, लेकिन परिणाम की चिंता नहीं करता।
वह जानता है कि उसका मूल्य उसके पद या उपलब्धि से नहीं, उसकी आंतरिक स्थिरता से तय होता है।
यही गीता 3:18 की अवस्था है — कर्तव्य से परे निर्भरता से मुक्ति।
🧠 श्रीकृष्ण का संतुलित दृष्टिकोण
श्रीकृष्ण न तो अति-कर्म का समर्थन करते हैं, न ही कर्म-त्याग का।
वे कहते हैं — जब तक भीतर आवश्यकता है, कर्म आवश्यक है।
और जब भीतर पूर्णता आ जाए, तो कर्म सहज हो जाता है।
✨ गीता 3:18 का केंद्रीय संदेश
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि कर्म साधन है, लक्ष्य नहीं।
लक्ष्य है — आंतरिक स्वतंत्रता और संतुलन।
जब यह लक्ष्य प्राप्त हो जाता है, तो जीवन बोझ नहीं रहता।
🧭 निष्कर्ष
गीता 3:18 यह नहीं कहती कि हर कोई कर्म से मुक्त हो जाए।
यह कहती है कि कर्म करते-करते उस पर निर्भरता समाप्त हो जाए।
यही अवस्था मानव जीवन की परिपक्वता है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न – भगवद गीता 3:18
भगवद गीता 3:18 का मुख्य संदेश क्या है?
गीता 3:18 सिखाती है कि जो व्यक्ति आत्मा में संतुष्ट होता है, उसे न कर्म से कोई लाभ रहता है और न कर्म न करने से कोई हानि।
आत्मतृप्त व्यक्ति को कर्म का फल क्यों नहीं चाहिए?
क्योंकि वह पहले से ही भीतर से पूर्ण और संतुष्ट होता है, इसलिए उसे बाहरी कर्मफल की आवश्यकता नहीं रहती।
क्या ऐसा व्यक्ति समाज से अलग हो जाता है?
नहीं, वह व्यक्ति दूसरों पर निर्भर नहीं रहता, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर कर्तव्य निभाता है।
आज के जीवन में गीता 3:18 कैसे उपयोगी है?
यह श्लोक सिखाता है कि आत्मनिर्भरता और आंतरिक संतोष से जीवन में भय, अपेक्षा और तनाव कम हो जाते हैं।
भगवद गीता का अध्याय 2 कर्म, आत्मा और विवेक का आधार है। इस अध्याय में जीवन के गहरे आध्यात्मिक प्रश्नों के उत्तर मिलते हैं।
👉 भगवद गीता अध्याय 2 के सभी श्लोक पढ़ें
✍️ लेखक के बारे में
Bhagwat Geeta by Sun एक ज्ञान-आधारित मंच है, जहाँ श्रीमद्भगवद्गीता को आधुनिक जीवन की मानसिक, नैतिक और व्यावहारिक चुनौतियों से जोड़कर सरल भाषा में समझाया जाता है।
इस प्लेटफॉर्म का उद्देश्य गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि निर्णय, शांति और आत्म-विकास की जीवनोपयोगी मार्गदर्शिका बनाना है।
यह लेख केवल शैक्षिक और आध्यात्मिक उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय, कानूनी या वित्तीय सलाह नहीं है। गीता की व्याख्या परंपराओं और दृष्टिकोणों के अनुसार भिन्न हो सकती है।
Bhagavad Gita 3:18 – Freedom Beyond Achievement and Obligation
What if fulfillment does not come from achievement, success, or social contribution? Bhagavad Gita 3:18 presents a rare idea that challenges modern productivity culture.
Bhagavad Gita 3:18 – Shlok
Naiva tasya kṛtenārtho nākṛteneha kaścana |
Na cāsya sarva-bhūteṣu kaścid artha-vyapāśrayaḥ ||
Explanation (
In Bhagavad Gita 3:18, Lord Krishna describes a person who has reached inner completeness. Such a person gains nothing extra by action and loses nothing by inaction. Their sense of worth no longer depends on outcomes, roles, or recognition.
This verse does not discourage work. Instead, it explains a psychological state where action is no longer used to define identity or value. When the inner self feels complete, achievement does not inflate the ego, and failure does not disturb peace.
Krishna also explains that such a person has no dependence on others for validation, support, or approval. This does not mean isolation or arrogance, but emotional independence. Relationships remain, but attachment and expectation dissolve.
For a global audience, this teaching directly addresses modern anxiety. Many people feel pressured to constantly perform, contribute, or justify their existence. Bhagavad Gita 3:18 reveals that true freedom begins when self-worth is no longer negotiated through productivity or comparison.
Real-Life Example
Consider a retired medical professional in Canada who continues to volunteer occasionally, but no longer feels the need to prove usefulness or status. Whether active or resting, she remains mentally calm and content. Her peace does not rise or fall with activity levels. This inner independence reflects the essence of Bhagavad Gita 3:18.
This verse reminds us that action is healthy, but dependence on action for identity is not. When inner fulfillment is established, life becomes balanced. One acts when needed, rests when appropriate, and remains free in both.
Frequently Asked Questions
It teaches inner independence from achievement, outcomes, and social validation.
No. It promotes freedom from psychological dependence on action.
It addresses burnout, identity pressure, and performance-based self-worth.
Yes. With self-awareness and balance, anyone can move toward it.
Freedom from needing action or inaction to feel complete.

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