क्या आपने कभी महसूस किया है कि काम करते-करते थकान सिर्फ शरीर में नहीं, मन में भी जम जाती है? जैसे मेहनत बहुत है, लेकिन संतोष कहीं खो गया हो।
भगवद गीता 3:9 इसी समस्या की जड़ को छूती है। यह श्लोक बताता है कि कर्म तब बोझ बनता है जब वह केवल स्वार्थ से किया जाता है।
भगवद गीता 3:9 – मूल श्लोक
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः। तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर॥
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| कर्म जब यज्ञ बन जाता है, तब बंधन स्वतः टूट जाते हैं। |
📖 गीता 3:9 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद
अर्जुन:
हे श्रीकृष्ण,
यदि कर्म करना आवश्यक है,
तो वह कर्म
बंधन क्यों बन जाता है?
श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन,
यह संसार
यज्ञ के लिए किए गए कर्म
के अतिरिक्त
कर्मों से बंधा हुआ है।
अर्जुन:
तो हे प्रभु,
बंधन से मुक्त रहने का
मार्ग क्या है?
श्रीकृष्ण:
अर्जुन,
आसक्ति रहित होकर
कर्तव्य कर्म कर।
यज्ञ भाव से किया गया कर्म
बंधन नहीं बनता।
अर्जुन:
तो क्या सेवा और समर्पण
ही यज्ञ है?
श्रीकृष्ण:
हाँ अर्जुन।
जब कर्म
स्वार्थ के लिए नहीं,
बल्कि
लोक-कल्याण के लिए होता है,
तभी वह
यज्ञ बन जाता है।
🔥 स्वार्थपूर्ण कर्म = बंधन 🔥 यज्ञ भाव से कर्म = मुक्ति
👉 कर्म छोड़ना नहीं, कर्म को यज्ञ बनाना ही गीता का मार्ग है।
सरल अर्थ
यज्ञ के उद्देश्य से किए गए कर्म के अतिरिक्त अन्य सभी कर्म बंधन का कारण बनते हैं। इसलिए हे कौन्तेय! आसक्ति को छोड़कर उस उद्देश्य से कर्म करो।
यह श्लोक वास्तव में क्या सिखाता है?
यहाँ “यज्ञ” का अर्थ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है।
यज्ञ का अर्थ है — ऐसा कर्म जो केवल “मेरे लिए” नहीं, बल्कि “हमारे लिए” हो।
जब कर्म केवल व्यक्तिगत लाभ से जुड़ जाता है, तो वही कर्म मन को बाँधने लगता है।
गीता 3:9 सिखाती है कि कर्म को उद्देश्य से जोड़ो, तो बंधन टूटने लगते हैं।
आज के जीवन में “यज्ञ भाव” कैसे दिखता है?
आज अधिकांश लोग काम करते हैं — पैसे, पद और पहचान के लिए।
लेकिन जब यही काम किसी बड़े उद्देश्य से जुड़ जाता है — सेवा, गुणवत्ता, योगदान — तो थकान कम और संतोष अधिक हो जाता है।
यही यज्ञ भाव है — काम करते हुए अपने से आगे देखना।
एक वास्तविक जीवन उदाहरण
मान लीजिए दो लोग एक ही पेशे में हैं।
पहला व्यक्ति केवल वेतन और प्रमोशन के लिए काम करता है। हर दिन उसे भारी लगता है।
दूसरा व्यक्ति अपने काम को सीखने, बेहतर करने और दूसरों के लिए उपयोगी बनाने का प्रयास करता है।
दोनों काम कर रहे हैं, लेकिन दूसरे का कर्म यज्ञ भाव से जुड़ा है — और वही उसे मानसिक स्वतंत्रता देता है।
बंधन और मुक्ति का अंतर कहाँ है?
गीता 3:9 यह नहीं कहती कि कर्म छोड़ दो।
यह कहती है — कर्म से “मैं” को हटाओ।
जब कर्म “मैं क्या पा रहा हूँ” से चलता है, तो बंधन बनता है।
जब कर्म “क्या योगदान दे रहा हूँ” से चलता है, तो वही कर्म मुक्ति का साधन बन जाता है।
अर्जुन के संदर्भ में यह शिक्षा
अर्जुन युद्ध को व्यक्तिगत हिंसा की तरह देख रहा था।
श्रीकृष्ण उसे दिखा रहे हैं कि यदि कर्म धर्म और व्यवस्था की रक्षा के लिए हो, तो वह यज्ञ बन जाता है — बंधनों का कारण नहीं।
यही दृष्टि अर्जुन को आगे बढ़ने की शक्ति देती है।
निष्कर्ष: उद्देश्य ही कर्म को मुक्त करता है
गीता 3:9 हमें यह सिखाती है कि कर्म का भार काम की मात्रा से नहीं, उसके पीछे की भावना से तय होता है।
जब कर्म उद्देश्यपूर्ण होता है, तो वही कर्म मन को बाँधता नहीं, बल्कि खोल देता है।
कर्म बदलने की ज़रूरत नहीं, कर्म के पीछे का भाव बदलने की ज़रूरत है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न – गीता 3:9❓️
भगवद गीता 3:9 का मुख्य संदेश क्या है?
यह श्लोक सिखाता है कि यज्ञभाव से किया गया कर्म मनुष्य को बंधन में नहीं डालता, बल्कि स्वार्थपूर्ण कर्म बंधन का कारण बनता है।
यज्ञार्थ कर्म का क्या अर्थ है?
यज्ञार्थ कर्म का अर्थ है ईश्वर, समाज और कल्याण के भाव से किया गया निष्काम कर्म।
क्या हर कर्म यज्ञ बन सकता है?
हाँ, जब कर्म स्वार्थ से मुक्त होकर सेवा और कर्तव्य के भाव से किया जाए, तो वह यज्ञ बन जाता है।
आज के जीवन में गीता 3:9 कैसे उपयोगी है?
यह श्लोक सिखाता है कि काम, परिवार और समाज के लिए निस्वार्थ भाव से किया गया कर्म मानसिक शांति और संतुलन देता है।
यह लेख भगवद गीता के श्लोक 3:9 की जीवनोपयोगी एवं दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। यह सामग्री केवल शैक्षिक और आध्यात्मिक उद्देश्य से है और किसी भी प्रकार की पेशेवर सलाह का विकल्प नहीं है।
Bhagavad Gita 2:9 – Arjuna Surrenders and Falls Silent
What happens after a person admits complete helplessness? Bhagavad Gita 2:9 marks a powerful turning point. After expressing his deep sorrow and confusion, Arjuna tells Lord Krishna, “I will not fight,” and then becomes silent.
This silence is not arrogance or stubbornness. It reflects emotional exhaustion and the collapse of Arjuna’s inner arguments. He has spoken everything his mind could offer. Now, there is nothing left to defend, nothing left to justify. This moment prepares him for true transformation.
Arjuna’s declaration may appear like refusal, but inwardly it is surrender. He has already accepted Krishna as his guide and placed himself in the position of a disciple. Silence follows because the ego has paused. Only in such silence can wisdom truly be received.
Bhagavad Gita 2:9 shows an important spiritual truth. Guidance does not begin when we argue with life, but when we stop insisting on our own limited understanding. When inner noise settles, clarity can arise. Krishna now begins to speak, not to a warrior full of pride, but to a seeker ready to listen.
This verse is deeply relevant today. Many people keep searching for answers while internally resisting change. Bhagavad Gita 2:9 reminds us that transformation begins when we stop pretending to know everything. Silence, humility, and willingness to listen open the door to true wisdom and peace.
Frequently Asked Questions
He declares that he will not fight and then becomes silent before Krishna.
It shows surrender, humility, and readiness to receive guidance.
No. He has already accepted Krishna as his teacher. Silence reflects openness, not rejection.
Krishna begins his main teaching, starting with spiritual wisdom.
It teaches that real learning begins when ego quiets down and listening begins.

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