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Monday, September 29, 2025

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1, श्लोक 25

भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति।। 1.25।।

                           श्लोक  1:25
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शब्दार्थ (शब्द-दर-शब्द अर्थ):

भीष्म-द्रोण-प्रमुखतः – भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने

सर्वेषां च महीक्षिताम् – और सभी पृथ्वी के राजाओं के समक्ष

उवाच – कहे

पार्थ – अर्जुन से (कुन्तीपुत्र)

पश्य – देखो

एतान् – इनको

समवेतान् – एकत्र हुए

कुरून् इति – इन कौरवों को



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भावार्थ:

श्रीकृष्ण ने अर्जुन का रथ कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि के बीच में, विशेषकर भीष्म पितामह और गुरु द्रोणाचार्य के सामने खड़ा किया। वहाँ खड़े होकर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा – “हे पार्थ! देखो इन कौरवों को जो यहाँ एकत्र हुए हैं।”


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विस्तृत व्याख्या:

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्धभूमि के मध्य लाते हैं और उनके रथ को उन महापुरुषों के सामने खड़ा करते हैं जिनका अर्जुन के जीवन में विशेष स्थान था।

1. भीष्म और द्रोण का महत्व:

भीष्म पितामह अर्जुन के पितामह थे और द्रोणाचार्य उनके गुरु।

ये दोनों अर्जुन के लिए अत्यंत सम्माननीय और पूजनीय थे।

परंतु परिस्थितिवश ये दोनों कौरवों की ओर से युद्ध कर रहे थे।



2. मानसिक संघर्ष की शुरुआत:

जब अर्जुन ने अपने ही पूजनीय गुरुओं और बड़ों को युद्धभूमि में विरोधी के रूप में खड़ा देखा, तो उनके मन में मोह और करुणा जाग उठी।

यहीं से अर्जुन के आत्मिक द्वंद्व  की शुरुआत होती है, जो आगे चलकर गीता के उपदेश का कारण बनती है।



3. भगवान का संदेश:

श्रीकृष्ण अर्जुन को केवल दिखा रहे थे कि युद्ध केवल शत्रुओं से नहीं बल्कि रिश्तों और भावनाओं से भी होगा।

यह श्लोक अर्जुन की करुणा और असमंजस की भूमिका तैयार करता है।





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👉 सारांश यह है कि इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्धभूमि के बीच खड़ा करके उनके अपने पूजनीय गुरु और परिजनों को दिखाते हैं, जिससे अर्जुन का मन मोहग्रस्त होता है और वे युद्ध करने में असमर्थ होने लगते हैं।

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