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यह वेबसाइट किस लिए है?

BhagwatGeetaBySun.com एक आध्यात्मिक एवं जीवन-मार्गदर्शन वेबसाइट है, जहाँ भगवद गीता के श्लोकों को सरल भाषा में समझाकर उन्हें आज के जीवन की वास्तविक समस्याओं से जोड़ा जाता है।

  • गीता के श्लोकों का व्यावहारिक अर्थ
  • तनाव, क्रोध और चिंता से मुक्ति
  • मन को शांत और स्थिर रखने की कला
  • कर्मयोग द्वारा सही निर्णय

What is BhagwatGeetaBySun.com?

BhagwatGeetaBySun.com is a spiritual and life-guidance website that explains the wisdom of the Bhagavad Gita in a simple, practical, and modern context to help people gain clarity, peace, and balance in life.

भगवद्गीता अध्याय 3: कर्मयोग का संपूर्ण सार – इच्छा, कर्तव्य और आत्म-नियंत्रण

प्रश्न: गीता अध्याय 3 का मुख्य संदेश क्या है? उत्तर: गीता अध्याय 3 में श्रीकृष्ण कर्मयोग की शिक्षा देते हैं। वे बताते हैं कि मनुष्य को फल की आसक्ति त्यागकर निष्काम भाव से अपना कर्तव्य कर्म करना चाहिए। ऐसा कर्म ही आत्मिक उन्नति और समाज के कल्याण का मार्ग है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। कर्म करो, पर आसक्ति छोड़ दो; यही कर्मयोग का सार है। क्या जीवन से भागना समाधान है, या जिम्मेदारी निभाना ही मुक्ति का मार्ग है? भगवद्गीता का तृतीय अध्याय — कर्मयोग — इसी प्रश्न का उत्तर देता है। यह अध्याय केवल कर्म करने की बात नहीं करता, बल्कि यह सिखाता है कि कर्म को कैसे किया जाए ताकि वह बंधन नहीं, मुक्ति बने। अर्जुन के संशय से शुरू होकर, यह अध्याय आत्म-नियंत्रण और आंतरिक विजय तक पहुँचता है। अध्याय 3 का मूल विषय – कर्म से मुक्ति कर्...

आत्मबल से काम रूपी शत्रु को कैसे नष्ट करें? – भगवद गीता 3:43

प्रश्न: गीता 3:43 में काम रूपी शत्रु को कैसे जीतने की शिक्षा दी गई है? उत्तर: गीता 3:43 में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि बुद्धि से आत्मा को स्थिर कर, इंद्रियों और मन को नियंत्रित करो और इस कठिन तथा प्रबल काम रूपी शत्रु का नाश करो। आत्मबल ही विजय का अंतिम साधन है। अगर तुम जान गए कि शत्रु कौन है, तो क्या अब भी चुप बैठोगे? श्रीकृष्ण ने इच्छा को पहचान लिया। उन्होंने बताया कि वह इंद्रियों, मन और बुद्धि में छिपी है। अब गीता 3:43 में वे अंतिम आदेश देते हैं — उठो, और इस आंतरिक शत्रु को परास्त करो। गीता 3:43 – आत्मबल से इच्छा पर अंतिम विजय गीता 3:42 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि आत्मा बुद्धि से भी श्रेष्ठ है। अब गीता 3:43 उस ज्ञान को कार्य में बदलने का आदेश है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। 📜 भगवद्गीता 3:43 – मूल संस्कृत श्लोक ...

इंद्रियों, मन और बुद्धि से भी श्रेष्ठ क्या है? – भगवद गीता 3:42

प्रश्न: गीता 3:42 में इंद्रियाँ, मन, बुद्धि और आत्मा की श्रेष्ठता कैसे बताई गई है? उत्तर: गीता 3:42 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि इंद्रियाँ शरीर से श्रेष्ठ हैं, मन इंद्रियों से श्रेष्ठ है, बुद्धि मन से श्रेष्ठ है, और आत्मा बुद्धि से भी श्रेष्ठ है। इसी क्रम को समझना आत्मज्ञान का आधार है। अगर इंद्रियाँ शक्तिशाली हैं, तो उनसे भी ऊपर क्या है? हम अक्सर सोचते हैं कि हमारा शरीर ही सब कुछ है। लेकिन भगवद्गीता 3:42 बताती है — मनुष्य की वास्तविक शक्ति शरीर से कहीं ऊपर है। गीता 3:42 – इंद्रियाँ, मन, बुद्धि और आत्मा का क्रम गीता 3:41 में श्रीकृष्ण ने कहा — पहले इंद्रियों को नियंत्रित करो। अब गीता 3:42 बताती है कि नियंत्रण का अंतिम आधार क्या है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। 📜 भगवद्गीता 3:42 – मूल संस्कृत श्लोक इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन...

काम रूपी शत्रु को कैसे जीता जाए? – भगवद गीता 3:41

प्रश्न: गीता 3:41 में काम पर विजय पाने का क्या उपाय बताया गया है? उत्तर: गीता 3:41 में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि सबसे पहले इंद्रियों को वश में करो और इस ज्ञान-विज्ञान के नाश करने वाले महापापी काम को नष्ट करो। इंद्रिय-नियंत्रण ही काम पर विजय का पहला कदम है। अगर इच्छा शत्रु है, तो उसे हराया कब जाए – पहले या बाद में? अधिकतर लोग तब संभलते हैं जब नुकसान हो चुका होता है। भगवद्गीता 3:41 बताती है — विजय शुरुआत में ही तय होती है। गीता 3:41 – युद्ध की शुरुआत इंद्रियों से गीता 3:40 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि इच्छा इंद्रियों, मन और बुद्धि में निवास करती है। अब गीता 3:41 में वे स्पष्ट आदेश देते हैं — सबसे पहले इंद्रियों को नियंत्रित करो। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। 📜 भगवद्गीता 3:41 – मूल संस्कृत श्लोक तस्मात्त्वमिन्द्रियाण...

काम और क्रोध कहाँ निवास करते हैं? मन, बुद्धि और इंद्रियों का रहस्य – भगवद गीता 3:40

प्रश्न: गीता 3:40 में काम के निवास स्थान कौन-से बताए गए हैं? उत्तर: गीता 3:40 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि इंद्रियाँ, मन और बुद्धि — ये काम के अधिष्ठान हैं। इनके माध्यम से ही काम ज्ञान को ढककर मनुष्य को मोहित करता है। अगर इच्छा इतनी गहरी बैठी है, तो उस पर नियंत्रण कैसे पाया जाए? श्रीकृष्ण ने बताया कि इच्छा इंद्रियों, मन और बुद्धि में निवास करती है। अब गीता 3:40 में वे समाधान का क्रम बताते हैं — कहाँ से शुरुआत करनी है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:40 – आत्म-नियंत्रण का स्पष्ट क्रम गीता 3:39 में यह स्पष्ट हुआ कि इच्छा केवल भावना नहीं, बल्कि एक पूरा नियंत्रण तंत्र है। गीता 3:40 उस तंत्र को उल्टा करने की कुंजी देती है। 📜 भगवद्गीता 3:40 – मूल संस्कृत श्लोक इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते । एतैर्विमोहयत्येष...

काम ज्ञान को कैसे ढक देता है और मनुष्य को भ्रमित करता है? – भगवद गीता 3:39

प्रश्न: गीता 3:39 में ज्ञान के शत्रु के रूप में किसे बताया गया है? उत्तर: गीता 3:39 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि कामना ज्ञान को ढकने वाला नित्य शत्रु है। यह कभी तृप्त नहीं होती और मनुष्य की विवेक शक्ति को नष्ट कर देती है। अगर इच्छा इतनी शक्तिशाली है, तो वह हमारे भीतर बैठती कहाँ है? हम अक्सर सोचते हैं कि इच्छा अचानक आती है, लेकिन भगवद्गीता 3:39 बताती है कि यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित आंतरिक प्रक्रिया है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। 🌟 आज का गीता संदेश कौरव सेना की शक्ति और भीष्म के नेतृत्व में युद्ध की तैयारी का वर्णन भगवद गीता अध्याय 1 श्लोक 10 में मिलता है। यह श्लोक आत्मविश्वास, रणनीति और युद्ध-पूर्व मानसिकता को दर्शाता है। 👉 गीता 1:10 का भावार्थ विस्तार से पढ़ें गीता 3:39 – इच्छा के तीन ठिकाने: इंद्रियाँ, म...

काम कैसे ज्ञान को ढक देता है? तीन उपमाओं का रहस्य – भगवद गीता 3:38

प्रश्न: गीता 3:38 में ज्ञान कैसे ढक जाता है ? उत्तर: गीता 3:38 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि जैसे धुएँ से अग्नि, धूल से दर्पण और गर्भ से भ्रूण ढका रहता है, उसी प्रकार कामना ज्ञान को ढक लेती है और मनुष्य की विवेक शक्ति को कमजोर कर देती है। कभी ऐसा लगा है कि सच सामने होते हुए भी दिखाई नहीं देता? हम जानते हैं कि क्या सही है, फिर भी वही गलत निर्णय ले लेते हैं। भगवद्गीता 3:38 बताती है कि समस्या ज्ञान की कमी नहीं, बल्कि उस पर पड़ा हुआ एक आवरण है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:38 – जब इच्छा बुद्धि को ढक लेती है गीता 3:37 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि काम और क्रोध मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं। गीता 3:38 समझाती है कि यह शत्रु काम कैसे हमारे विवेक को धीरे-धीरे ढक लेता है। 📜 भगवद्गीता 3:38 – मूल संस्कृत श्लोक धूमेनाव्रियते वह्निर...