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यह वेबसाइट किस लिए है?

BhagwatGeetaBySun.com एक आध्यात्मिक एवं जीवन-मार्गदर्शन वेबसाइट है, जहाँ भगवद गीता के श्लोकों को सरल भाषा में समझाकर उन्हें आज के जीवन की वास्तविक समस्याओं से जोड़ा जाता है।

  • गीता के श्लोकों का व्यावहारिक अर्थ
  • तनाव, क्रोध और चिंता से मुक्ति
  • मन को शांत और स्थिर रखने की कला
  • कर्मयोग द्वारा सही निर्णय

What is BhagwatGeetaBySun.com?

BhagwatGeetaBySun.com is a spiritual and life-guidance website that explains the wisdom of the Bhagavad Gita in a simple, practical, and modern context to help people gain clarity, peace, and balance in life.

भगवान ने अर्जुन को ही यह रहस्यपूर्ण योग क्यों बताया? – भगवद गीता 4:3

प्रश्न: गीता 4:3 में श्रीकृष्ण अर्जुन को यह ज्ञान क्यों देते हैं? उत्तर: गीता 4:3 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह वही प्राचीन और उत्तम योग है, जिसे वे आज अर्जुन को इसलिए बता रहे हैं क्योंकि वह उनके भक्त और प्रिय मित्र हैं। यह अत्यंत गूढ़ और दिव्य रहस्य है। 📖 भगवद गीता अध्याय 4 – ज्ञान योग इस पेज पर अध्याय 4 के सभी श्लोक सरल हिंदी व्याख्या सहित पढ़ें। यहाँ प्राचीन योग की परंपरा, उसका लोप और दिव्य ज्ञान का रहस्य समझाया गया है। 🕉️ श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 3 (Geeta 4:3) – विस्तृत व्याख्या 📖 मूल श्लोक स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः। भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥ परम ज्ञान उन्हीं को मिलता है, जिनमें श्रद्धा और विश्वास होता है 📖 गीता 4:3 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद श्रीकृष्ण: हे अर्जुन, वही पुरातन योग आज मैं तुम्हें बता रहा हूँ। श्रीकृष्ण: क्योंकि तुम मेरे भक्त और मित्र हो, और यह अत्यंत गोपनीय रहस्य है। अर्जुन: हे माधव, क्या यह ज्ञान विशेष कृपा से ही मिलता है? श्रीकृष्ण: हाँ अर्जुन। जब भक्ति और विश्वास होता है,...

राजर्षियों की परंपरा में यह योग कैसे चला और फिर क्यों लुप्त हो गया? – भगवद गीता 4:2

प्रश्न: गीता 4:2 में इस दिव्य ज्ञान के बारे में क्या बताया गया है? उत्तर: गीता 4:2 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि यह योग गुरु-शिष्य परंपरा से राजर्षियों द्वारा जाना गया था। लेकिन समय के साथ यह परंपरा टूट गई और यह दिव्य ज्ञान पृथ्वी से लुप्त हो गया। सत्य मिटता नहीं… लेकिन लोग उससे दूर हो जाते हैं। यदि यह योग सनातन था, तो फिर लोगों ने उसे क्यों भुला दिया? गीता 4:2 इसी प्रश्न का उत्तर देती है। 📖 भगवद गीता अध्याय 4 – ज्ञान योग इस पेज पर अध्याय 4 के सभी श्लोक सरल हिंदी व्याख्या सहित पढ़ें। यहाँ प्राचीन योग की परंपरा, उसका लोप और दिव्य ज्ञान का रहस्य समझाया गया है। गीता 4:2 – जब परंपरा टूटती है 📜 संस्कृत श्लोक एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः । स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥ जब परंपरा टूटती है, तब ज्ञान धीरे-धीरे लुप्त हो जाता है 📖 गीता 4:2 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद श्रीकृष्ण: हे अर्जुन, इस प्रकार राजर्षियों ने इस योग को गुरु-परंपरा से प्राप्त किया। श्रीकृष्ण: परंतु लंबे समय के कारण यह योग लुप्त हो गया। अर्जुन: हे ...

श्रीकृष्ण ने यह योग सबसे पहले किसे सिखाया था? – भगवद गीता 4:1

प्रश्न: गीता 4:1 में श्रीकृष्ण क्या बताते हैं? उत्तर: गीता 4:1 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि उन्होंने इस अविनाशी योग को प्राचीन काल में सूर्यदेव विवस्वान को सिखाया था। विवस्वान ने इसे मनु को और मनु ने इक्ष्वाकु को बताया। इस प्रकार यह दिव्य ज्ञान गुरु-शिष्य परंपरा से चला आ रहा है। सत्य बदलता नहीं — लेकिन लोग उसे भूल जाते हैं। भगवद्गीता अध्याय 4 की शुरुआत किसी दार्शनिक तर्क से नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक घोषणा से होती है। श्रीकृष्ण कहते हैं — जो ज्ञान मैं तुम्हें दे रहा हूँ, वह नया नहीं है। वह समय से परे है। वह पीढ़ियों से प्रवाहित है। 📖 भगवद गीता अध्याय 4 – ज्ञान योग इस पेज पर अध्याय 4 के सभी श्लोक सरल हिंदी व्याख्या सहित पढ़ें। यहाँ प्राचीन योग की परंपरा, उसका लोप और दिव्य ज्ञान का रहस्य समझाया गया है। गीता 4:1 – योग की दिव्य परंपरा 📜 संस्कृत श्लोक इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् । विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥ यह योग अनादि काल से गुरु-परंपरा के माध्यम से चलता आया है 📖 गीता 4:1 – श्रीकृष्ण ...

भगवद्गीता अध्याय 3: कर्मयोग का संपूर्ण सार – इच्छा, कर्तव्य और आत्म-नियंत्रण

प्रश्न: गीता अध्याय 3 का मुख्य संदेश क्या है? उत्तर: गीता अध्याय 3 में श्रीकृष्ण कर्मयोग की शिक्षा देते हैं। वे बताते हैं कि मनुष्य को फल की आसक्ति त्यागकर निष्काम भाव से अपना कर्तव्य कर्म करना चाहिए। ऐसा कर्म ही आत्मिक उन्नति और समाज के कल्याण का मार्ग है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। कर्म करो, पर आसक्ति छोड़ दो; यही कर्मयोग का सार है। क्या जीवन से भागना समाधान है, या जिम्मेदारी निभाना ही मुक्ति का मार्ग है? भगवद्गीता का तृतीय अध्याय — कर्मयोग — इसी प्रश्न का उत्तर देता है। यह अध्याय केवल कर्म करने की बात नहीं करता, बल्कि यह सिखाता है कि कर्म को कैसे किया जाए ताकि वह बंधन नहीं, मुक्ति बने। अर्जुन के संशय से शुरू होकर, यह अध्याय आत्म-नियंत्रण और आंतरिक विजय तक पहुँचता है। अध्याय 3 का मूल विषय – कर्म से मुक्ति कर्...

आत्मबल से काम रूपी शत्रु को कैसे नष्ट करें? – भगवद गीता 3:43

प्रश्न: गीता 3:43 में काम रूपी शत्रु को कैसे जीतने की शिक्षा दी गई है? उत्तर: गीता 3:43 में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि बुद्धि से आत्मा को स्थिर कर, इंद्रियों और मन को नियंत्रित करो और इस कठिन तथा प्रबल काम रूपी शत्रु का नाश करो। आत्मबल ही विजय का अंतिम साधन है। अगर तुम जान गए कि शत्रु कौन है, तो क्या अब भी चुप बैठोगे? श्रीकृष्ण ने इच्छा को पहचान लिया। उन्होंने बताया कि वह इंद्रियों, मन और बुद्धि में छिपी है। अब गीता 3:43 में वे अंतिम आदेश देते हैं — उठो, और इस आंतरिक शत्रु को परास्त करो। गीता 3:43 – आत्मबल से इच्छा पर अंतिम विजय गीता 3:42 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि आत्मा बुद्धि से भी श्रेष्ठ है। अब गीता 3:43 उस ज्ञान को कार्य में बदलने का आदेश है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। 📜 भगवद्गीता 3:43 – मूल संस्कृत श्लोक ...

इंद्रियों, मन और बुद्धि से भी श्रेष्ठ क्या है? – भगवद गीता 3:42

प्रश्न: गीता 3:42 में इंद्रियाँ, मन, बुद्धि और आत्मा की श्रेष्ठता कैसे बताई गई है? उत्तर: गीता 3:42 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि इंद्रियाँ शरीर से श्रेष्ठ हैं, मन इंद्रियों से श्रेष्ठ है, बुद्धि मन से श्रेष्ठ है, और आत्मा बुद्धि से भी श्रेष्ठ है। इसी क्रम को समझना आत्मज्ञान का आधार है। अगर इंद्रियाँ शक्तिशाली हैं, तो उनसे भी ऊपर क्या है? हम अक्सर सोचते हैं कि हमारा शरीर ही सब कुछ है। लेकिन भगवद्गीता 3:42 बताती है — मनुष्य की वास्तविक शक्ति शरीर से कहीं ऊपर है। गीता 3:42 – इंद्रियाँ, मन, बुद्धि और आत्मा का क्रम गीता 3:41 में श्रीकृष्ण ने कहा — पहले इंद्रियों को नियंत्रित करो। अब गीता 3:42 बताती है कि नियंत्रण का अंतिम आधार क्या है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। 📜 भगवद्गीता 3:42 – मूल संस्कृत श्लोक इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन...

काम रूपी शत्रु को कैसे जीता जाए? – भगवद गीता 3:41

प्रश्न: गीता 3:41 में काम पर विजय पाने का क्या उपाय बताया गया है? उत्तर: गीता 3:41 में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि सबसे पहले इंद्रियों को वश में करो और इस ज्ञान-विज्ञान के नाश करने वाले महापापी काम को नष्ट करो। इंद्रिय-नियंत्रण ही काम पर विजय का पहला कदम है। अगर इच्छा शत्रु है, तो उसे हराया कब जाए – पहले या बाद में? अधिकतर लोग तब संभलते हैं जब नुकसान हो चुका होता है। भगवद्गीता 3:41 बताती है — विजय शुरुआत में ही तय होती है। गीता 3:41 – युद्ध की शुरुआत इंद्रियों से गीता 3:40 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि इच्छा इंद्रियों, मन और बुद्धि में निवास करती है। अब गीता 3:41 में वे स्पष्ट आदेश देते हैं — सबसे पहले इंद्रियों को नियंत्रित करो। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। 📜 भगवद्गीता 3:41 – मूल संस्कृत श्लोक तस्मात्त्वमिन्द्रियाण...