Skip to main content

Posts

यह वेबसाइट किस लिए है?

BhagwatGeetaBySun.com एक आध्यात्मिक एवं जीवन-मार्गदर्शन वेबसाइट है, जहाँ भगवद गीता के श्लोकों को सरल भाषा में समझाकर उन्हें आज के जीवन की वास्तविक समस्याओं से जोड़ा जाता है।

  • गीता के श्लोकों का व्यावहारिक अर्थ
  • तनाव, क्रोध और चिंता से मुक्ति
  • मन को शांत और स्थिर रखने की कला
  • कर्मयोग द्वारा सही निर्णय

What is BhagwatGeetaBySun.com?

BhagwatGeetaBySun.com is a spiritual and life-guidance website that explains the wisdom of the Bhagavad Gita in a simple, practical, and modern context to help people gain clarity, peace, and balance in life.

स्वभाव के अनुसार कर्म क्यों होता है और संयम क्यों कठिन है? – भगवद गीता 3:33

प्रश्न: गीता 3:33 में स्वभाव के बारे में क्या शिक्षा दी गई है? उत्तर: गीता 3:33 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करता है। ज्ञानी भी अपने स्वभाव का ही अनुसरण करते हैं, तो केवल बाहरी संयम या दबाव से क्या लाभ होता है। अगर हमें पता है कि क्या गलत है, फिर भी हम वही क्यों दोहराते रहते हैं? कई लोग खुद से कहते हैं — “अब मैं बदल जाऊँगा”, लेकिन कुछ ही समय बाद वही आदतें, वही प्रतिक्रियाएँ, वही गलतियाँ फिर लौट आती हैं। भगवद्गीता 3:33 इस संघर्ष को कोई उपदेश नहीं, बल्कि एक गहरा यथार्थ बनाकर सामने रखती है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:33 – स्वभाव बनाम ज्ञान: असली टकराव गीता 3:32 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि अहंकार और हठ व्यक्ति को दिशाहीन बना देते हैं। गीता 3:33 इससे भी गहरी बात ...

जो ईश्वर के उपदेशों का पालन नहीं करते, उनका जीवन क्यों व्यर्थ हो जाता है? – भगवद गीता 3:32

प्रश्न: गीता 3:32 में श्रीकृष्ण किन लोगों के बारे में चेतावनी देते हैं? उत्तर: गीता 3:32 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो लोग ईर्ष्या के कारण उनकी इस शिक्षा का पालन नहीं करते, वे अज्ञान में स्थित और विवेकहीन होते हैं। ऐसे लोग अपने ही विनाश का कारण बनते हैं। अगर सही मार्ग सामने हो और फिर भी हम उसे न अपनाएँ, तो क्या होता है? कई बार जीवन में हमें यह पता होता है कि हमें क्या करना चाहिए, फिर भी हम वही करते हैं जो आसान लगता है। भगवद्गीता 3:32 इसी मानसिक जिद और अहंकार के परिणाम को बहुत स्पष्ट शब्दों में बताती है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:32 – अहंकार और अविवेक का परिणाम गीता 3:31 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि जो व्यक्ति श्रद्धा और खुले मन से शिक्षा को अपनाता है, वह कर्म-बंधन से मुक्त हो जाता है। गीता 3:32 उसी का ठीक उलटा चित्...

जो श्रद्धा से कर्म करता है, वह बंधन से कैसे मुक्त होता है? – भगवद गीता 3:31

प्रश्न: गीता 3:31 में श्रीकृष्ण किसे मुक्त बताते हैं? उत्तर: गीता 3:31 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो लोग ईर्ष्या रहित होकर, श्रद्धा के साथ उनकी इस शिक्षा का पालन करते हैं, वे कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाते हैं। क्या किसी मार्गदर्शन को मानना कमज़ोरी है, या यही असली बुद्धिमत्ता है? आज का इंसान आज़ादी चाहता है, लेकिन बिना दिशा की आज़ादी अक्सर तनाव और भ्रम में बदल जाती है। भगवद्गीता 3:31 हमें बताती है कि सही मार्गदर्शन को श्रद्धा के साथ अपनाना बंधन नहीं, बल्कि मानसिक मुक्ति का मार्ग है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:31 – श्रद्धा से अपनाया गया कर्म ही मुक्ति देता है गीता 3:30 में श्रीकृष्ण कर्म को ईश्वर को अर्पित करने की बात करते हैं। गीता 3:31 यह स्पष्ट करती है कि जो व्यक्ति इस शिक्षा को नियमित, श्रद्धा और खुले मन से अपनाता ...

कर्म ईश्वर को समर्पित करने से भय और तनाव कैसे समाप्त होता है? – भगवद गीता 3:30

प्रश्न: गीता 3:30 में श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म करने की क्या विधि बताते हैं? उत्तर: गीता 3:30 में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि अपने सभी कर्म मुझे अर्पित करके, आसक्ति और स्वार्थ त्यागकर, निराशा और अहंकार से मुक्त होकर कर्तव्य कर्म करो। क्या काम करते समय भी मन शांत रह सकता है? अक्सर हम काम करते हैं, लेकिन भीतर तनाव, डर और अपेक्षाएँ चलती रहती हैं। भगवद्गीता 3:30 एक ऐसा उपाय बताती है, जिससे कर्म बोझ नहीं, बल्कि शांति का माध्यम बन जाता है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:30 – कर्म को अर्पण करने की कला गीता 3:29 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि गुणों में उलझा मन कर्म के बंधन में फँस जाता है। गीता 3:30 इसका व्यावहारिक समाधान देती है — कर्म करो, लेकिन उसे अपने अहंकार से अलग कर दो। 📜 भगवद्गीता 3:30 – मूल संस्कृत श्लोक मयि स...

अज्ञानियों को विचलित क्यों नहीं करना चाहिए? – भगवद गीता 3:29

प्रश्न: गीता 3:29 में प्रकृति के गुणों में आसक्त , व्यक्ति के बारे में क्या कहा गया है? उत्तर: गीता 3:29 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो लोग प्रकृति के गुणों में आसक्त रहते हैं, वे उन्हीं गुणों से उत्पन्न कर्मों में फँस जाते हैं। ज्ञानी व्यक्ति को ऐसे अज्ञानियों की बुद्धि को विचलित नहीं करना चाहिए। हम जानते हैं कि क्या सही है, फिर भी गलत में क्यों उलझ जाते हैं? कई बार मन समझता है, फिर भी आदतें हमें वही पुराने रास्ते पर खींच ले जाती हैं। भगवद्गीता 3:29 इसी मनोवैज्ञानिक जाल को उजागर करती है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:29 – गुणों में फँसा मन और कर्म का भ्रम गीता 3:28 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि ज्ञानी व्यक्ति कर्म को साक्षी भाव से देखता है। गीता 3:29 उसके विपरीत स्थिति दिखाती है — जब मन गुणों में फँस जाता है, त...

ज्ञानी व्यक्ति कर्म में आसक्त क्यों नहीं होता? – भगवद गीता 3:28

प्रश्न: गीता 3:28 में ज्ञानी व्यक्ति की दृष्टि क्या बताई गई है? उत्तर: गीता 3:28 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि जो व्यक्ति प्रकृति के गुणों और उनके कर्मों का वास्तविक स्वरूप जानता है, वह आसक्त नहीं होता। वह समझता है कि गुण ही गुणों में कार्य कर रहे हैं। क्या कर्म करते हुए भी भीतर शांत रहा जा सकता है? हम काम करते हैं, लेकिन मन हमेशा उलझा रहता है — कभी तुलना में, कभी परिणाम की चिंता में। भगवद्गीता 3:28 बताती है कि कर्म के बीच भी एक ऐसी दृष्टि संभव है, जहाँ मन केवल साक्षी बना रहता है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:28 – ज्ञानी की दृष्टि: कर्म में रहते हुए भी मुक्त गीता 3:27 में श्रीकृष्ण कर्तृत्व के भ्रम को उजागर करते हैं। गीता 3:28 उसी का समाधान देती है — ज्ञानी व्यक्ति कर्म को करता हुआ नहीं, कर्म को घटते हुए देखता है। 📜 ...

क्या वास्तव में हम कर्म के कर्ता हैं? अहंकार का भ्रम – भगवद गीता 3:27

प्रश्न: गीता 3:27 में कर्म करने वाले के बारे में क्या सत्य बताया गया है? उत्तर: गीता 3:27 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वास्तव में सभी कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं। अहंकार से मोहित व्यक्ति यह मान लेता है कि मैं ही कर्म करने वाला हूँ। क्या सच में हम ही सब कुछ कर रहे हैं? हम कहते हैं – “मैंने किया”, “मेरी मेहनत”, “मेरी सफलता”। लेकिन भगवद्गीता 3:27 इस आत्मविश्वास के भीतर छिपे एक गहरे भ्रम को उजागर करती है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:27 – कर्ता होने का भ्रम और उसका परिणाम गीता 3:26 में श्रीकृष्ण कर्म करते हुए संतुलन की बात करते हैं। गीता 3:27 सीधे मनुष्य की जड़ समस्या पर आती है — “मैं ही सब कुछ कर रहा हूँ” यही अहंकार बंधन का कारण बनता है। 📜 भगवद्गीता 3:27 – मूल संस्कृत श्लोक प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः ...