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यह वेबसाइट किस लिए है?

BhagwatGeetaBySun.com एक आध्यात्मिक एवं जीवन-मार्गदर्शन वेबसाइट है, जहाँ भगवद गीता के श्लोकों को सरल भाषा में समझाकर उन्हें आज के जीवन की वास्तविक समस्याओं से जोड़ा जाता है।

  • गीता के श्लोकों का व्यावहारिक अर्थ
  • तनाव, क्रोध और चिंता से मुक्ति
  • मन को शांत और स्थिर रखने की कला
  • कर्मयोग द्वारा सही निर्णय

What is BhagwatGeetaBySun.com?

BhagwatGeetaBySun.com is a spiritual and life-guidance website that explains the wisdom of the Bhagavad Gita in a simple, practical, and modern context to help people gain clarity, peace, and balance in life.

भगवान अवतार लेकर क्या करते हैं? सज्जनों की रक्षा और दुष्टों का विनाश – भगवद गीता 4:8

प्रश्न: गीता 4:8 में श्रीकृष्ण अपने अवतार का उद्देश्य क्या बताते हैं? उत्तर: गीता 4:8 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे साधुओं की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनः स्थापना के लिए युग-युग में अवतार लेते हैं। उनका अवतार लोककल्याण के लिए होता है। 🎯 गीता 4:8 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं गीता 4:8 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे साधुओं की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए युग-युग में अवतरित होते हैं। उनका अवतार केवल दंड देने के लिए नहीं, बल्कि संतुलन, न्याय और आध्यात्मिक जागरण स्थापित करने के लिए होता है। 📈 जब भगवान न्याय के लिए स्वयं उतरते हैं जब निर्दोष रोते हैं… जब अन्याय हँसता है… जब सत्य दब जाता है… तब क्या ईश्वर मौन रहते हैं? गीता 4:8 उस मौन को तोड़ती है। भगवान स्वयं घोषणा करते हैं — वे आते हैं। साधुओं की रक्षा के लिए। दुष्टों के विनाश के लिए। और धर्म की पुनः स्थापना के लिए। यह केवल एक धार्मिक वचन नहीं, बल्कि समस्त मानवता के लिए आशा का शाश्वत आश्वासन है। 🕉️ गीता अध्याय 4 श्लोक 8 (Geeta 4:8) परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दु...

जब-जब धर्म की हानि होती है, तब ईश्वर अवतार क्यों लेते हैं? – भगवद गीता 4:7

प्रश्न: गीता 4:7 में श्रीकृष्ण अपने अवतार का क्या कारण बताते हैं? उत्तर: गीता 4:7 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब वे स्वयं पृथ्वी पर अवतार लेते हैं। उनका उद्देश्य धर्म की पुनः स्थापना करना है। 🎯 गीता 4:7 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं गीता 4:7 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब वे स्वयं पृथ्वी पर अवतरित होते हैं। उनका अवतार कर्म के बंधन से नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा और संतों के कल्याण के लिए होता है। 📈 जब भगवान स्वयं धरती पर आते हैं जब अन्याय बढ़ जाता है… जब सत्य दबने लगता है… जब धर्म कमजोर पड़ जाता है… क्या तब भगवान केवल देखते रहते हैं? गीता 4:7 में श्रीकृष्ण स्वयं घोषणा करते हैं — “जब-जब धर्म की हानि होती है, तब मैं स्वयं अवतरित होता हूँ।” यह केवल एक वचन नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए आशा का दिव्य आश्वासन है। 🕉️ गीता अध्याय 4 श्लोक 7 (Geeta 4:7) यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ धर्म की रक्षा के लिए ईश्...

अजन्मा होकर भी श्रीकृष्ण अवतार क्यों लेते हैं? – भगवद गीता 4:6

प्रश्न: गीता 4:6 में श्रीकृष्ण अपने अवतार के बारे में क्या कहते हैं? उत्तर: गीता 4:6 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे अजन्मा, अविनाशी और समस्त प्राणियों के ईश्वर हैं। फिर भी अपनी योगमाया से जब-जब आवश्यकता होती है, वे स्वयं अवतार धारण करते हैं। 🎯 गीता 4:6 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं गीता 4:6 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि यद्यपि वे अजन्मा, अविनाशी और समस्त प्राणियों के ईश्वर हैं, फिर भी अपनी योगमाया के द्वारा समय-समय पर प्रकट होते हैं। उनका जन्म कर्म के बंधन से नहीं, बल्कि अपनी दिव्य इच्छा और धर्म की स्थापना के लिए होता है। 📈 जब अजन्मा भगवान जन्म लेते हैं क्या यह संभव है कि जो कभी जन्म नहीं लेता, वही जन्म ले? क्या जो अविनाशी है, वह मानव रूप में हमारे बीच आ सकता है? कुरुक्षेत्र की भूमि पर भगवान श्रीकृष्ण ने ऐसा ही दिव्य रहस्य प्रकट किया। उन्होंने बताया कि उनका जन्म साधारण जीवों जैसा नहीं है। वे अजन्मा होते हुए भी अवतरित होते हैं। गीता 4:6 केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि अवतार-रहस्य का हृदय है। 📖 भगवद गीता अध्याय 4 – ज्ञान योग इस पेज पर अध्याय 4 के सभी श्लोक सरल...

श्रीकृष्ण और अर्जुन के अनेक जन्मों का रहस्य क्या है? – भगवद गीता 4:5

प्रश्न: गीता 4:5 में श्रीकृष्ण जन्मों के विषय में क्या कहते हैं? उत्तर: गीता 4:5 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि अर्जुन और उनके अनेकों जन्म हो चुके हैं। अंतर यह है कि श्रीकृष्ण उन सभी जन्मों को जानते हैं, जबकि अर्जुन उन्हें नहीं जानते। 🎯 भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते गीता 4:5 में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हमारे और तुम्हारे अनेक जन्म हो चुके हैं। मुझे वे सब स्मरण हैं, परंतु तुम्हें नहीं। यह श्लोक भगवान के दिव्य स्वरूप और जीव की सीमित स्मृति के अंतर को स्पष्ट करता है तथा अवतार-रहस्य को उजागर करता है। 📈 जब भगवान ने जन्मों का रहस्य खोला कुरुक्षेत्र की रणभूमि में अर्जुन का प्रश्न गूंज रहा था। वह समझ नहीं पा रहा था कि भगवान ने सूर्यदेव को प्राचीन काल में ज्ञान कैसे दिया। तब श्रीकृष्ण ने एक ऐसा उत्तर दिया जिसने केवल अर्जुन ही नहीं, पूरी मानवता की सोच बदल दी। उन्होंने कहा — “हम दोनों के अनेक जन्म हो चुके हैं। मुझे सब स्मरण हैं, पर तुम्हें नहीं।” यह उत्तर केवल जन्म की बात नहीं करता, यह आत्मा और परमात्मा के अंतर का रहस्य खोलता है। 📖 भगवद गीता अध्याय 4 – ज्ञा...

अर्जुन ने श्रीकृष्ण से यह प्रश्न क्यों किया? – भगवद गीता 4:4

प्रश्न: गीता 4:4 में अर्जुन किस बात पर संशय प्रकट करते हैं? उत्तर: गीता 4:4 में अर्जुन पूछते हैं कि सूर्यदेव विवस्वान तो प्राचीन काल में हुए, जबकि श्रीकृष्ण का जन्म हाल में हुआ है। तो फिर उन्होंने प्रारंभ में यह योग सूर्य को कैसे सिखाया? यही उनका मुख्य संशय है। 🎯 अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से पूछते हैं गीता 4:4 में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि आपका जन्म तो अभी हुआ है, जबकि सूर्यदेव का जन्म बहुत पहले हुआ था — फिर आपने उन्हें यह योग कैसे सिखाया? यह श्लोक अर्जुन के स्वाभाविक संदेह और भगवान के दिव्य स्वरूप के रहस्य को प्रकट करने की भूमिका तैयार करता है। 📈 एक ऐसा प्रश्न जिसने दिव्यता का रहस्य खोल दिया कुरुक्षेत्र की रणभूमि में केवल युद्ध की तैयारी नहीं हो रही थी, बल्कि सत्य और संदेह का भी सामना हो रहा था। अर्जुन के मन में एक गहरा प्रश्न उठता है। वह भगवान से पूछता है — “आपका जन्म तो अभी हुआ है, फिर आपने सूर्यदेव को यह योग कैसे सिखाया?” यह केवल एक ऐतिहासिक सवाल नहीं था, बल्कि यह मानव बुद्धि की सीमा और दिव्यता के रहस्य के बीच की रेखा थी। गीता 4:4 हमें सिखाती है कि आध्य...

भगवान ने अर्जुन को ही यह रहस्यपूर्ण योग क्यों बताया? – भगवद गीता 4:3

प्रश्न: गीता 4:3 में श्रीकृष्ण अर्जुन को यह ज्ञान क्यों देते हैं? उत्तर: गीता 4:3 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह वही प्राचीन और उत्तम योग है, जिसे वे आज अर्जुन को इसलिए बता रहे हैं क्योंकि वह उनके भक्त और प्रिय मित्र हैं। यह अत्यंत गूढ़ और दिव्य रहस्य है। 📖 भगवद गीता अध्याय 4 – ज्ञान योग इस पेज पर अध्याय 4 के सभी श्लोक सरल हिंदी व्याख्या सहित पढ़ें। यहाँ प्राचीन योग की परंपरा, उसका लोप और दिव्य ज्ञान का रहस्य समझाया गया है। 🕉️ श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 3 (Geeta 4:3) – विस्तृत व्याख्या 📖 मूल श्लोक स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः। भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥ परम ज्ञान उन्हीं को मिलता है, जिनमें श्रद्धा और विश्वास होता है 📖 गीता 4:3 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद श्रीकृष्ण: हे अर्जुन, वही पुरातन योग आज मैं तुम्हें बता रहा हूँ। श्रीकृष्ण: क्योंकि तुम मेरे भक्त और मित्र हो, और यह अत्यंत गोपनीय रहस्य है। अर्जुन: हे माधव, क्या यह ज्ञान विशेष कृपा से ही मिलता है? श्रीकृष्ण: हाँ अर्जुन। जब भक्ति और विश्वास होता है,...

राजर्षियों की परंपरा में यह योग कैसे चला और फिर क्यों लुप्त हो गया? – भगवद गीता 4:2

प्रश्न: गीता 4:2 में इस दिव्य ज्ञान के बारे में क्या बताया गया है? उत्तर: गीता 4:2 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि यह योग गुरु-शिष्य परंपरा से राजर्षियों द्वारा जाना गया था। लेकिन समय के साथ यह परंपरा टूट गई और यह दिव्य ज्ञान पृथ्वी से लुप्त हो गया। सत्य मिटता नहीं… लेकिन लोग उससे दूर हो जाते हैं। यदि यह योग सनातन था, तो फिर लोगों ने उसे क्यों भुला दिया? गीता 4:2 इसी प्रश्न का उत्तर देती है। 📖 भगवद गीता अध्याय 4 – ज्ञान योग इस पेज पर अध्याय 4 के सभी श्लोक सरल हिंदी व्याख्या सहित पढ़ें। यहाँ प्राचीन योग की परंपरा, उसका लोप और दिव्य ज्ञान का रहस्य समझाया गया है। गीता 4:2 – जब परंपरा टूटती है 📜 संस्कृत श्लोक एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः । स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥ जब परंपरा टूटती है, तब ज्ञान धीरे-धीरे लुप्त हो जाता है 📖 गीता 4:2 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद श्रीकृष्ण: हे अर्जुन, इस प्रकार राजर्षियों ने इस योग को गुरु-परंपरा से प्राप्त किया। श्रीकृष्ण: परंतु लंबे समय के कारण यह योग लुप्त हो गया। अर्जुन: हे ...