Skip to main content

Posts

यह वेबसाइट किस लिए है?

BhagwatGeetaBySun.com एक आध्यात्मिक एवं जीवन-मार्गदर्शन वेबसाइट है, जहाँ भगवद गीता के श्लोकों को सरल भाषा में समझाकर उन्हें आज के जीवन की वास्तविक समस्याओं से जोड़ा जाता है।

  • गीता के श्लोकों का व्यावहारिक अर्थ
  • तनाव, क्रोध और चिंता से मुक्ति
  • मन को शांत और स्थिर रखने की कला
  • कर्मयोग द्वारा सही निर्णय

What is BhagwatGeetaBySun.com?

BhagwatGeetaBySun.com is a spiritual and life-guidance website that explains the wisdom of the Bhagavad Gita in a simple, practical, and modern context to help people gain clarity, peace, and balance in life.

कर्म ईश्वर को समर्पित करने से भय और तनाव कैसे समाप्त होता है? – भगवद गीता 3:30

प्रश्न: गीता 3:30 में श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म करने की क्या विधि बताते हैं? उत्तर: गीता 3:30 में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि अपने सभी कर्म मुझे अर्पित करके, आसक्ति और स्वार्थ त्यागकर, निराशा और अहंकार से मुक्त होकर कर्तव्य कर्म करो। क्या काम करते समय भी मन शांत रह सकता है? अक्सर हम काम करते हैं, लेकिन भीतर तनाव, डर और अपेक्षाएँ चलती रहती हैं। भगवद्गीता 3:30 एक ऐसा उपाय बताती है, जिससे कर्म बोझ नहीं, बल्कि शांति का माध्यम बन जाता है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:30 – कर्म को अर्पण करने की कला गीता 3:29 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि गुणों में उलझा मन कर्म के बंधन में फँस जाता है। गीता 3:30 इसका व्यावहारिक समाधान देती है — कर्म करो, लेकिन उसे अपने अहंकार से अलग कर दो। 📜 भगवद्गीता 3:30 – मूल संस्कृत श्लोक मयि स...

अज्ञानियों को विचलित क्यों नहीं करना चाहिए? – भगवद गीता 3:29

प्रश्न: गीता 3:29 में प्रकृति के गुणों में आसक्त , व्यक्ति के बारे में क्या कहा गया है? उत्तर: गीता 3:29 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो लोग प्रकृति के गुणों में आसक्त रहते हैं, वे उन्हीं गुणों से उत्पन्न कर्मों में फँस जाते हैं। ज्ञानी व्यक्ति को ऐसे अज्ञानियों की बुद्धि को विचलित नहीं करना चाहिए। हम जानते हैं कि क्या सही है, फिर भी गलत में क्यों उलझ जाते हैं? कई बार मन समझता है, फिर भी आदतें हमें वही पुराने रास्ते पर खींच ले जाती हैं। भगवद्गीता 3:29 इसी मनोवैज्ञानिक जाल को उजागर करती है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:29 – गुणों में फँसा मन और कर्म का भ्रम गीता 3:28 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि ज्ञानी व्यक्ति कर्म को साक्षी भाव से देखता है। गीता 3:29 उसके विपरीत स्थिति दिखाती है — जब मन गुणों में फँस जाता है, त...

ज्ञानी व्यक्ति कर्म में आसक्त क्यों नहीं होता? – भगवद गीता 3:28

प्रश्न: गीता 3:28 में ज्ञानी व्यक्ति की दृष्टि क्या बताई गई है? उत्तर: गीता 3:28 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि जो व्यक्ति प्रकृति के गुणों और उनके कर्मों का वास्तविक स्वरूप जानता है, वह आसक्त नहीं होता। वह समझता है कि गुण ही गुणों में कार्य कर रहे हैं। क्या कर्म करते हुए भी भीतर शांत रहा जा सकता है? हम काम करते हैं, लेकिन मन हमेशा उलझा रहता है — कभी तुलना में, कभी परिणाम की चिंता में। भगवद्गीता 3:28 बताती है कि कर्म के बीच भी एक ऐसी दृष्टि संभव है, जहाँ मन केवल साक्षी बना रहता है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:28 – ज्ञानी की दृष्टि: कर्म में रहते हुए भी मुक्त गीता 3:27 में श्रीकृष्ण कर्तृत्व के भ्रम को उजागर करते हैं। गीता 3:28 उसी का समाधान देती है — ज्ञानी व्यक्ति कर्म को करता हुआ नहीं, कर्म को घटते हुए देखता है। 📜 ...

क्या वास्तव में हम कर्म के कर्ता हैं? अहंकार का भ्रम – भगवद गीता 3:27

प्रश्न: गीता 3:27 में कर्म करने वाले के बारे में क्या सत्य बताया गया है? उत्तर: गीता 3:27 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वास्तव में सभी कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं। अहंकार से मोहित व्यक्ति यह मान लेता है कि मैं ही कर्म करने वाला हूँ। क्या सच में हम ही सब कुछ कर रहे हैं? हम कहते हैं – “मैंने किया”, “मेरी मेहनत”, “मेरी सफलता”। लेकिन भगवद्गीता 3:27 इस आत्मविश्वास के भीतर छिपे एक गहरे भ्रम को उजागर करती है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:27 – कर्ता होने का भ्रम और उसका परिणाम गीता 3:26 में श्रीकृष्ण कर्म करते हुए संतुलन की बात करते हैं। गीता 3:27 सीधे मनुष्य की जड़ समस्या पर आती है — “मैं ही सब कुछ कर रहा हूँ” यही अहंकार बंधन का कारण बनता है। 📜 भगवद्गीता 3:27 – मूल संस्कृत श्लोक प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः ...

ज्ञानी को अज्ञानियों के कर्म में बाधा क्यों नहीं डालनी चाहिए? – भगवद गीता 3:26

प्रश्न: गीता 3:26 में ज्ञानी व्यक्ति को अज्ञानी के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए? उत्तर: गीता 3:26 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि ज्ञानी पुरुष को कर्म में आसक्त अज्ञानियों की बुद्धि को विचलित नहीं करना चाहिए। उसे स्वयं आसक्ति छोड़कर कर्म करते हुए, अज्ञानियों को भी कर्म के लिए प्रेरित करना चाहिए। क्या हर किसी को सच सीधे-सीधे बता देना सही होता है? कई बार हम सोचते हैं कि अगर हमें सही ज्ञान मिल गया है, तो दूसरों को भी तुरंत वही मान लेना चाहिए। लेकिन भगवद्गीता 3:26 इस सोच को बेहद सूक्ष्मता से संतुलित करती है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:26 – ज्ञान से मार्गदर्शन, भ्रम से नहीं गीता 3:25 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि ज्ञानी और अज्ञानी दोनों कर्म करते हैं, पर भावना अलग होती है। गीता 3:26 एक और गहरी बात जोड़ती है — ज्ञानी को अज्ञानी के मन ...

ज्ञानी व्यक्ति को समाज के लिए कर्म क्यों करना चाहिए? – भगवद गीता 3:25

प्रश्न: गीता 3:25 में ज्ञानी और अज्ञानी के कर्म करने में क्या अंतर बताया गया है? उत्तर: गीता 3:25 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जैसे अज्ञानी व्यक्ति कर्मफल की आसक्ति से कर्म करता है, वैसे ही ज्ञानी पुरुष को भी लोकसंग्रह अर्थात समाज के हित के लिए , आसक्ति छोड़कर कर्म करना चाहिए। क्या हर व्यक्ति को एक ही तरह से कर्म करना चाहिए? कई बार हम देखते हैं कि एक ही काम कोई शांति से करता है, तो कोई वही काम तनाव और अहंकार के साथ। भगवद्गीता 3:25 इसी अंतर को स्पष्ट करती है — और बताती है कि ज्ञानी और अज्ञानी के कर्म में असल फर्क कहाँ होता है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:25 – ज्ञानी और अज्ञानी के कर्म में मूल अंतर गीता 3:24 में श्रीकृष्ण कर्म त्याग से होने वाले सामाजिक पतन की बात करते हैं। गीता 3:25 यह बताती है कि कर्म करना सभी के लिए आवश्य...

यदि श्रेष्ठ लोग कर्म न करें तो समाज का क्या होगा? – भगवद गीता 3:24

प्रश्न: गीता 3:24 , में कर्म न करने से क्या हानि बताई गई है? उत्तर: गीता 3:24 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि वे कर्म न करें, तो ये लोक नष्ट हो जाएंगे। कर्म का त्याग समाज में अव्यवस्था फैलाता है और अंततः समस्त प्राणियों के विनाश का कारण बनता है। अगर जिम्मेदार लोग ही अपना कर्तव्य छोड़ दें, तो समाज का क्या होगा? कभी-कभी हमें लगता है कि एक व्यक्ति के कर्म न करने से क्या फर्क पड़ेगा। भगवद्गीता 3:24 इसी भ्रम को तोड़ती है और दिखाती है कि एक स्तर पर की गई निष्क्रियता पूरी व्यवस्था को कैसे प्रभावित करती है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:24 – कर्म रुकते ही व्यवस्था क्यों बिखर जाती है? गीता 3:23 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि वे स्वयं कर्म न करें, तो मनुष्य भी कर्म छोड़ देंगे। गीता 3:24 इस विचार को आगे बढ़ाकर उसके गंभीर परिणाम बताती ह...