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यह वेबसाइट किस लिए है?

BhagwatGeetaBySun.com एक आध्यात्मिक एवं जीवन-मार्गदर्शन वेबसाइट है, जहाँ भगवद गीता के श्लोकों को सरल भाषा में समझाकर उन्हें आज के जीवन की वास्तविक समस्याओं से जोड़ा जाता है।

  • गीता के श्लोकों का व्यावहारिक अर्थ
  • तनाव, क्रोध और चिंता से मुक्ति
  • मन को शांत और स्थिर रखने की कला
  • कर्मयोग द्वारा सही निर्णय

What is BhagwatGeetaBySun.com?

BhagwatGeetaBySun.com is a spiritual and life-guidance website that explains the wisdom of the Bhagavad Gita in a simple, practical, and modern context to help people gain clarity, peace, and balance in life.

काम कैसे ज्ञान को ढक देता है? तीन उपमाओं का रहस्य – भगवद गीता 3:38

प्रश्न: गीता 3:38 में ज्ञान कैसे ढक जाता है? उत्तर: गीता 3:38 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि जैसे धुएँ से अग्नि, धूल से दर्पण और गर्भ से भ्रूण ढका रहता है, उसी प्रकार कामना ज्ञान को ढक लेती है और मनुष्य की विवेक शक्ति को कमजोर कर देती है। कभी ऐसा लगा है कि सच सामने होते हुए भी दिखाई नहीं देता? हम जानते हैं कि क्या सही है, फिर भी वही गलत निर्णय ले लेते हैं। भगवद्गीता 3:38 बताती है कि समस्या ज्ञान की कमी नहीं, बल्कि उस पर पड़ा हुआ एक आवरण है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:38 – जब इच्छा बुद्धि को ढक लेती है गीता 3:37 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि काम और क्रोध मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं। गीता 3:38 समझाती है कि यह शत्रु काम कैसे हमारे विवेक को धीरे-धीरे ढक लेता है। 📜 भगवद्गीता 3:38 – मूल संस्कृत श्लोक धूमेनाव्रियते वह्निर्...

मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु कौन है? काम और क्रोध का रहस्य – भगवद गीता 3:37

प्रश्न: गीता 3:37 में श्रीकृष्ण पाप का कारण किसे बताते हैं? उत्तर: गीता 3:37 में श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं कि कामना (काम) ही मनुष्य को पाप कर्म करने के लिए प्रेरित करती है। यह रजोगुण से उत्पन्न होती है, अतृप्त और अत्यंत विनाशकारी शत्रु है। वह कौन-सी शक्ति है जो सही-गलत जानते हुए भी इंसान को गिरा देती है? अर्जुन ने पूछा — “मैं नहीं चाहता, फिर भी गलत क्यों हो जाता है?” अब भगवद्गीता 3:37 में श्रीकृष्ण बिना घुमाए-फिराए उस शत्रु का नाम लेते हैं। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:37 – काम और क्रोध: मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु गीता 3:36 में अर्जुन गलत कर्म के कारण के बारे में पूछते हैं। गीता 3:37 में श्रीकृष्ण सीधे उत्तर देते हैं — काम (अतृप्त इच्छा) और क्रोध (निराशा से जन्मा आवेग)। 📜 भगवद्गीता 3:37 – मूल संस्कृत श्लोक ...

मनुष्य पाप की ओर क्यों आकर्षित होता है, जबकि वह नहीं चाहता? – भगवद गीता 3:36

प्रश्न: गीता 3:36 में अर्जुन श्रीकृष्ण से क्या प्रश्न पूछते हैं? उत्तर: गीता 3:36 में अर्जुन पूछते हैं कि मनुष्य न चाहते हुए भी पाप कर्म क्यों करता है। वे जानना चाहते हैं कि कौन-सी शक्ति मनुष्य को उसकी इच्छा के विरुद्ध भी पाप की ओर प्रेरित करती है। अगर इंसान सही और गलत जानता है, तो फिर गलत काम हो कैसे जाता है? हम सबने कभी न कभी यह अनुभव किया है — हम जानते हैं कि क्या नहीं करना चाहिए, फिर भी वही कर बैठते हैं। भगवद्गीता 3:36 में अर्जुन यही प्रश्न श्रीकृष्ण से सीधे पूछते हैं। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:36 – गलत कर्म के पीछे छिपी शक्ति कौन-सी है? गीता 3:35 में श्रीकृष्ण स्वधर्म की बात करते हैं। अब अर्जुन एक बहुत मानवीय प्रश्न पूछते हैं — अगर स्वधर्म ही श्रेष्ठ है, तो फिर मनुष्य अपने ही विरुद्ध क्यों चला जाता है? 📜 भगव...

परधर्म से अपना धर्म क्यों श्रेष्ठ है, भले ही वह कठिन हो? – भगवद गीता 3:35

प्रश्न: गीता 3:35 में स्वधर्म और परधर्म के बारे में क्या शिक्षा दी गई है? उत्तर: गीता 3:35 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि अपना स्वधर्म, भले ही अपूर्ण क्यों न हो, दूसरे के धर्म से श्रेष्ठ है। परधर्म का पालन भयावह होता है, जबकि स्वधर्म में मृत्यु भी कल्याणकारी मानी गई है। क्या किसी और जैसा बनना वाकई सफलता का रास्ता है? आज का इंसान लगातार तुलना में जी रहा है — किसी की नौकरी, किसी का बिज़नेस, किसी की lifestyle। भगवद्गीता 3:35 इस तुलना की मानसिकता को सीधे जड़ से चुनौती देती है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:35 – स्वधर्म बनाम परधर्म: असली सुरक्षा कहाँ है? गीता 3:34 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि राग और द्वेष हमारे आंतरिक शत्रु हैं। गीता 3:35 बताती है कि इन शत्रुओं का सबसे बड़ा कारण दूसरों का मार्ग अपनाने की लालसा है। 📜 भगवद्गीता 3:3...

इंद्रियों के राग-द्वेष से कैसे बचा जाए? – भगवद गीता 3:34

प्रश्न: गीता 3:34 में राग और द्वेष के बारे में क्या चेतावनी दी गई है? उत्तर: गीता 3:34 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि इंद्रियों के विषयों के प्रति राग और द्वेष स्वाभाविक रूप से जुड़े रहते हैं। मनुष्य को इनके वश में नहीं होना चाहिए, क्योंकि यही राग और द्वेष उसके आत्मिक मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बनते हैं। जो चीज़ हमें सबसे ज़्यादा आकर्षित करती है, वही हमें सबसे ज़्यादा नुकसान क्यों पहुँचाती है? हम अक्सर सोचते हैं कि हमारी समस्याएँ बाहर से आती हैं — लोग, परिस्थितियाँ, सिस्टम। लेकिन भगवद्गीता 3:34 एक असहज सच्चाई बताती है — सबसे खतरनाक शत्रु हमारे भीतर ही बैठा होता है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:34 – राग और द्वेष: मनुष्य के छिपे हुए शत्रु गीता 3:33 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि मनुष्य अपने स्वभाव से बँधा रहता है। गीता 3:34 उस स्वभाव की...

स्वभाव के अनुसार कर्म क्यों होता है और संयम क्यों कठिन है? – भगवद गीता 3:33

प्रश्न: गीता 3:33 में स्वभाव के बारे में क्या शिक्षा दी गई है? उत्तर: गीता 3:33 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करता है। ज्ञानी भी अपने स्वभाव का ही अनुसरण करते हैं, तो केवल बाहरी संयम या दबाव से क्या लाभ होता है। अगर हमें पता है कि क्या गलत है, फिर भी हम वही क्यों दोहराते रहते हैं? कई लोग खुद से कहते हैं — “अब मैं बदल जाऊँगा”, लेकिन कुछ ही समय बाद वही आदतें, वही प्रतिक्रियाएँ, वही गलतियाँ फिर लौट आती हैं। भगवद्गीता 3:33 इस संघर्ष को कोई उपदेश नहीं, बल्कि एक गहरा यथार्थ बनाकर सामने रखती है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:33 – स्वभाव बनाम ज्ञान: असली टकराव गीता 3:32 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि अहंकार और हठ व्यक्ति को दिशाहीन बना देते हैं। गीता 3:33 इससे भी गहरी बात ...