Showing posts with label गीता 1:15. Show all posts
Showing posts with label गीता 1:15. Show all posts

Sunday, September 28, 2025

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1, श्लोक 15

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः॥1:15

---

शब्दार्थ

हृषीकेशः – श्रीकृष्ण (इन्द्रियों के स्वामी)

पाञ्चजन्यं – पाञ्चजन्य नाम का शंख

धनञ्जयः – अर्जुन (धन जीतने वाला)

देवदत्तं – देवदत्त नाम का शंख

भीमकर्मा – भीम (भयानक पराक्रम वाले)

वृकोदरः – भीम का दूसरा नाम (अत्यधिक भोजन करने वाला)

पौण्ड्रं – पौण्ड्र नामक शंख

महाशङ्खं दध्मौ – बड़े शंख को बजाया



---

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण, अर्जुन और भीम द्वारा शंख बजाने का वर्णन है।

भगवान श्रीकृष्ण ने ‘पाञ्चजन्य’ नामक शंख बजाया।

अर्जुन ने ‘देवदत्त’ शंख बजाया।

भीम, जो अपने अद्भुत बल और पराक्रम के लिए प्रसिद्ध थे, उन्होंने ‘पौण्ड्र’ नामक महाशंख बजाया।


इनके शंखध्वनि से युद्धभूमि में उत्साह और उमंग का वातावरण बन गया। यह ध्वनि धर्म और सत्य की विजय का उद्घोष भी थी।


---

विशेष अर्थ

1. पाञ्चजन्य शंख – यह शंख श्रीकृष्ण ने दैत्य पाञ्चजन को मारकर समुद्र से प्राप्त किया था, इसलिए इसका नाम "पाञ्चजन्य" पड़ा। यह धर्म और दिव्यता का प्रतीक है।


2. देवदत्त शंख – अर्जुन का शंख, जो उन्हें देवताओं से प्राप्त हुआ था। यह उनकी वीरता और अदम्य साहस को दर्शाता है।


3. पौण्ड्र शंख – भीम का विशाल शंख, जिसकी ध्वनि गर्जना के समान थी, जो शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करती थी।




---

आध्यात्मिक दृष्टिकोण

श्रीकृष्ण का शंख धर्म और आध्यात्मिक मार्ग का उद्घोष करता है।

अर्जुन का शंख कर्तव्य और पराक्रम का प्रतीक है।

भीम का शंख बल, शक्ति और संकल्प का प्रतीक है।


इस प्रकार शंखनाद केवल युद्ध आरंभ का संकेत नहीं था, बल्कि यह धर्मयुद्ध के लिए आत्मबल और ईश्वर-स्मरण का प्रतीक भी था।


कर्म, अकर्म और विकर्म में क्या अंतर है? – भगवद गीता 4:17

प्रश्न: गीता 4:17 में कर्म, अकर्म और विकर्म के बारे में क्या कहा गया है? उत्तर: गीता 4:17 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि कर्म क्या है, अकर्म ...