क्या यह दुर्बलता है या भ्रम? श्रीकृष्ण अर्जुन से प्रश्न करते हैं कि यह मोह और कायरता कहाँ से आई। यह श्लोक आत्मविश्लेषण सिखाता है—क्या हम सच में दयालु हैं या केवल डर से भाग रहे हैं?
| श्रीकृष्ण अर्जुन से पूछते हैं कि संकट की घड़ी में यह दुर्बलता और मोह उसे कैसे घेर लिया। |
गीता 2:2 – अर्जुन को झकझोरता प्रश्न
श्रीकृष्ण बोले —
“हे अर्जुन! इस संकट के समय तुम्हें यह मोह कहाँ से आ गया?
यह न तो आर्यों के योग्य है, न स्वर्ग दिलाने वाला और न यश बढ़ाने वाला।”
कृष्ण अर्जुन को झकझोरते हैं, क्योंकि कभी-कभी करुणा के साथ सत्य का कठोर स्मरण भी आवश्यक होता है। वे स्पष्ट करते हैं कि यह भाव दुर्बलता का प्रतीक है।
Geeta 2:2 – FAQ
Q1. श्रीकृष्ण अर्जुन से क्या कहते हैं?
A. वे अर्जुन की कायरता पर प्रश्न उठाते हैं।
Q2. यह श्लोक क्या सिखाता है?
A. संकट में कमजोर मन स्वीकार्य नहीं होता।
Geeta 2:2 – निराशा से सावधान
इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन की निराशा पर प्रश्न उठाते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि कठिन समय में हिम्मत हारना उचित नहीं है।
आज लोग असफलता, आलोचना या डर के कारण अपने लक्ष्य छोड़ देते हैं। यह श्लोक बताता है कि निराशा progress की सबसे बड़ी बाधा है।
Life Better कैसे करें?
- Temporary failure को permanent न बनाएँ
- Self-confidence को गिरने न दें
- कठिन समय को growth का अवसर समझें
जो व्यक्ति निराशा से बाहर निकलता है, वही आगे बढ़ता है।
इस वेबसाइट पर प्रकाशित सभी लेख, जानकारी और विचार केवल सामान्य जानकारी एवं शैक्षिक उद्देश्य के लिए हैं। यहाँ दी गई सामग्री किसी भी प्रकार की चिकित्सकीय, कानूनी, वित्तीय या पेशेवर सलाह नहीं है।
इस वेबसाइट पर प्रस्तुत आध्यात्मिक, धार्मिक एवं जीवन से संबंधित विचार भगवद् गीता और अन्य शास्त्रों की व्यक्तिगत समझ, अध्ययन एवं व्याख्या पर आधारित हैं। अलग-अलग व्यक्तियों की सोच एवं अनुभव भिन्न हो सकते हैं।
किसी भी जानकारी को अपनाने या उस पर निर्णय लेने से पहले कृपया विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें। इस वेबसाइट की किसी भी जानकारी के उपयोग से होने वाले लाभ या हानि के लिए वेबसाइट या लेखक किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं होंगे।
इस वेबसाइट पर दिखाए जाने वाले विज्ञापन Google AdSense एवं अन्य विज्ञापन नेटवर्क द्वारा प्रदर्शित किए जा सकते हैं, जिनकी सामग्री और सेवाओं पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है।
Bhagavad Gita 2:2 – Rejecting Hopelessness
In verse 2:2, Krishna questions Arjuna’s despair. He explains that this mental state does not reflect wisdom or strength. This verse addresses a global issue—normalizing hopelessness.
In modern society, despair is often labeled as realism. People lose faith in solutions to climate change, social justice, or personal growth. This mindset silently weakens action and innovation.
The Gita teaches that hopelessness is not truth; it is a mental condition. When despair dominates, individuals and societies stop moving forward.
This verse encourages rejecting defeatist thinking. Problems demand clarity, not emotional surrender.
Q: Is feeling hopeless a failure?
A: Feeling it is human; staying in it blocks solutions.
Comments
Post a Comment