उत्तर: गीता 3:14 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि सभी प्राणी अन्न से जीवित रहते हैं, अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है, वर्षा यज्ञ से होती है और यज्ञ कर्म से उत्पन्न होता है। इस प्रकार संपूर्ण सृष्टि कर्म और यज्ञ के चक्र पर आधारित है।
क्या आपने कभी सोचा है कि जीवन में कुछ भी अपने आप नहीं होता? हर सुविधा, हर संसाधन, किसी न किसी कर्म-श्रृंखला से जुड़ा होता है।
भगवद गीता 3:14 इसी अदृश्य श्रृंखला को बहुत सरल और गहरे तरीके से समझाती है। यह श्लोक बताता है कि जीवन एक चक्र है — और हर कड़ी हमारी जिम्मेदारी से जुड़ी है।
भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग
इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है।
भगवद गीता 3:14 – मूल श्लोक
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥
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| गीता 3:14 – यज्ञ, वर्षा और अन्न का दिव्य चक्र ही जीवन और सृष्टि का आधार है |
📖 गीता 3:14 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद
अर्जुन:
हे श्रीकृष्ण,
आप यज्ञ, अन्न और जीवन की
परस्पर कड़ी की बात कर रहे हैं।
यह क्रम कैसे चलता है?
श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन,
समस्त प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं,
और अन्न
वर्षा से उत्पन्न होता है।
अर्जुन:
और वर्षा कैसे होती है, प्रभु?
श्रीकृष्ण:
वर्षा
यज्ञ से उत्पन्न होती है,
और यज्ञ
कर्तव्य कर्म
से उत्पन्न होता है।
अर्जुन:
तो हे माधव,
कर्म ही इस चक्र की
जड़ है?
श्रीकृष्ण:
हाँ अर्जुन।
इस प्रकार
कर्म → यज्ञ → वर्षा → अन्न → जीवन
का यह
शाश्वत चक्र
सृष्टि को चलाता है।
🔄 कर्म → यज्ञ → वर्षा → अन्न → जीवन
👉 जो इस चक्र को समझकर चलता है, वही प्रकृति के साथ संतुलन में रहता है।
सरल अर्थ
सभी प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं। अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है। वर्षा यज्ञ से होती है, और यज्ञ कर्म से उत्पन्न होता है।
यह श्लोक क्या मूल सत्य बताता है?
यह श्लोक जीवन को एक सीधी रेखा नहीं, बल्कि एक चक्र के रूप में दिखाता है।
अन्न, वर्षा, यज्ञ और कर्म — ये चारों अलग-अलग नहीं, एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं।
यदि इनमें से कोई कड़ी कमजोर पड़ती है, तो पूरा संतुलन बिगड़ जाता है।
आज के समय में यह शिक्षा क्यों महत्वपूर्ण है?
आज हम परिणाम चाहते हैं — भोजन, सुविधा, आराम — लेकिन प्रक्रिया को अनदेखा कर देते हैं।
हम प्रकृति से लेते हैं, लेकिन संरक्षण नहीं करते।
गीता 3:14 हमें याद दिलाती है कि यदि कर्म जिम्मेदारी से नहीं होंगे, तो परिणाम भी टिकाऊ नहीं होंगे।
एक वास्तविक जीवन उदाहरण
मान लीजिए एक शहर तेजी से विकास करता है, लेकिन जल-संरक्षण और हरियाली की अनदेखी करता है।
कुछ वर्षों बाद पानी की कमी, प्रदूषण और असंतुलन सामने आता है।
क्यों? क्योंकि कर्म और परिणाम के बीच जिम्मेदारी की कड़ी टूट गई।
यही गीता 3:14 का संदेश है — हर परिणाम के पीछे कर्म का ऋण होता है।
यज्ञ का व्यापक अर्थ
यहाँ यज्ञ का अर्थ केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि वह समर्पित कर्म है जो व्यवस्था को संतुलित रखे।
जब कर्म स्वार्थ से ऊपर उठकर किया जाता है, तो वही कर्म प्रकृति और समाज को पोषित करता है।
यही यज्ञ का वास्तविक रूप है।
अर्जुन के संदर्भ में यह शिक्षा
अर्जुन युद्ध को केवल हिंसा की दृष्टि से देख रहा था।
श्रीकृष्ण उसे दिखा रहे हैं कि यदि कर्म का उद्देश्य व्यवस्था और धर्म की रक्षा हो, तो वही कर्म जीवन-चक्र को आगे बढ़ाता है।
अर्जुन को अपने कर्म को व्यापक दृष्टि से देखना था।
निष्कर्ष: जीवन एक जुड़ा हुआ चक्र है
गीता 3:14 हमें यह सिखाती है कि जीवन में कुछ भी अलग-थलग नहीं है।
हमारा हर कर्म किसी न किसी रूप में पूरी व्यवस्था को प्रभावित करता है।
जिम्मेदार कर्म ही स्थायी जीवन का आधार है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न – गीता 3:14❓️
भगवद गीता 3:14 का मुख्य संदेश क्या है?
यह श्लोक सिखाता है कि सृष्टि अन्न, वर्षा, यज्ञ और कर्म के परस्पर संबंध से चलती है—यह एक संतुलित चक्र है।
अन्न और वर्षा का क्या संबंध बताया गया है?
वर्षा से अन्न उत्पन्न होता है और अन्न से सभी प्राणियों का जीवन चलता है।
यज्ञ और कर्म का क्या अर्थ है?
यहाँ यज्ञ का अर्थ निस्वार्थ सेवा-भाव से किया गया कर्म है, और कर्म से ही यज्ञ संभव होता है।
आज के जीवन में गीता 3:14 कैसे उपयोगी है?
यह श्लोक सिखाता है कि प्रकृति और समाज के साथ संतुलन बनाकर कर्म करने से ही जीवन समृद्ध होता है।
यह लेख BhagwatGeetaBySun द्वारा लिखा गया है। यह वेबसाइट भगवद गीता के श्लोकों को सरल भाषा में, आधुनिक जीवन की समस्याओं से जोड़कर प्रस्तुत करती है।
लेखक का उद्देश्य आध्यात्मिक ज्ञान को व्यावहारिक रूप में समझाना है, ताकि पाठक कर्मयोग, निष्काम भाव और आत्मिक संतुलन को अपने जीवन में लागू कर सकें।
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वेद से कर्म और यज्ञ का चक्र
यह लेख भगवद गीता के श्लोक 3:14 की जीवनोपयोगी एवं दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। यह सामग्री केवल शैक्षिक और आध्यात्मिक उद्देश्य से है और किसी भी प्रकार की पेशेवर सलाह का विकल्प नहीं है।
Bhagavad Gita 3:14 – The Cycle That Sustains Life
Where does life truly come from, and how is it sustained? Bhagavad Gita 3:14 explains a powerful chain of interdependence. Lord Krishna teaches that living beings depend on food, food depends on rain, rain depends on selfless action, and such action arises from duty.
This verse reveals a deep law of balance. Nothing in life exists independently. Human survival, nature, and effort are connected in a continuous cycle. When people perform their responsibilities with awareness and selflessness, harmony is maintained in the natural order.
Krishna explains that rain is not merely a physical event, but part of a larger moral and cosmic balance. Selfless action, performed in the spirit of offering, supports harmony in nature and society. When action becomes selfish or exploitative, this balance begins to break.
The message of this verse is not ritualistic. Krishna is emphasizing responsibility. Human beings are not separate from nature — they are participants in its rhythm. Work done with gratitude and discipline supports both personal well-being and collective prosperity.
In modern times, this teaching feels extremely relevant. Environmental imbalance, stress, and dissatisfaction often arise from ignoring responsibility and interconnection. Bhagavad Gita 3:14 reminds us that sustainable living begins with conscious action. When effort is aligned with duty and respect for nature, life flows smoothly. Ignoring this cycle creates disorder, but honoring it restores balance, stability, and a sense of meaning in daily life.
Frequently Asked Questions
It explains the cycle connecting duty, action, rain, food, and life.
No. It also teaches moral responsibility and social balance.
It symbolizes nourishment and support that arise from balanced action.
It highlights sustainability, responsibility, and harmony between humans and nature.
That conscious action sustains life, while selfish action disrupts balance.

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