कभी ऐसा लगता है कि हम बाहर से बहुत संयमी दिख रहे हैं, लेकिन भीतर इच्छाएँ लगातार शोर मचा रही होती हैं। लोग हमें शांत समझते हैं, पर हम खुद जानते हैं कि मन कहीं और भटक रहा है।
भगवद गीता 3:6 इसी भीतर–बाहर के अंतर को उजागर करती है। यह श्लोक दिखाता है कि सच्चा संयम केवल व्यवहार का नहीं, बल्कि मन की ईमानदारी का विषय है।
भगवद गीता 3:6 – मूल श्लोक
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्। इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥
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| बाहरी त्याग नहीं, मन का त्याग ही सच्चा योग है। |
📖 गीता 3:6 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद
अर्जुन:
हे श्रीकृष्ण,
यदि कर्म से बचना संभव नहीं है,
तो क्या केवल बाहरी कर्मों को छोड़ देना
सही मार्ग माना जा सकता है?
श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन,
जो मनुष्य इंद्रियों को रोककर
मन से विषयों का चिंतन करता रहता है,
वह मिथ्याचारी कहलाता है।
अर्जुन:
तो हे प्रभु,
बाहरी त्याग पर्याप्त नहीं है?
श्रीकृष्ण:
नहीं अर्जुन।
केवल कर्म न करना ही संयम नहीं है।
मन और इंद्रियों दोनों का संयम
ही सच्चा मार्ग है।
अर्जुन:
तो फिर सही कर्मयोग क्या है, हे माधव?
श्रीकृष्ण:
जो मनुष्य
मन से विषयों का त्याग करके
कर्तव्य कर्म करता है,
वही सच्चा कर्मयोगी है।
⚠️ बाहरी त्याग + भीतर आसक्ति = मिथ्याचार
👉 सच्चा त्याग मन का होता है, केवल कर्मों का नहीं।
सरल अर्थ
जो व्यक्ति अपनी कर्मेंद्रियों को तो रोक लेता है, लेकिन मन में इंद्रियों के विषयों का स्मरण करता रहता है, वह भ्रमित आत्मा वाला कहलाता है और उसका आचरण मिथ्या माना जाता है।
यह श्लोक क्या स्पष्ट करता है?
श्रीकृष्ण यहाँ बाहरी त्याग की आलोचना नहीं कर रहे, वे आंतरिक असत्यता को उजागर कर रहे हैं।
अगर हाथ कुछ न कर रहे हों, लेकिन मन लगातार इच्छाओं में डूबा हो, तो वह संयम नहीं, सिर्फ दिखावा है।
गीता 3:6 हमें यह सिखाती है कि आचरण की शुद्धता मन की स्थिति से तय होती है।
आज के जीवन में यह शिक्षा क्यों ज़रूरी है?
आज कई लोग बाहर से बहुत अनुशासित जीवन जीते हुए दिखते हैं — नियम, दिनचर्या, अनुशासन।
लेकिन भीतर तुलना, लालच और असंतोष लगातार चलता रहता है।
गीता 3:6 याद दिलाती है कि यदि भीतर की स्थिति नहीं बदली, तो बाहरी सुधार अधूरा ही रहेगा।
एक वास्तविक जीवन उदाहरण
मान लीजिए कोई व्यक्ति डिजिटल डिटॉक्स का निर्णय लेता है। वह मोबाइल तो दूर रख देता है, लेकिन मन में वही संदेश, तुलनाएँ और प्रतिक्रियाएँ घूमती रहती हैं।
बाहर से वह संयमी दिखता है, पर भीतर बेचैनी बनी रहती है।
यही स्थिति गीता 3:6 बताती है — संयम का अर्थ केवल दूरी नहीं, बल्कि आसक्ति से मुक्ति है।
मिथ्याचार का वास्तविक अर्थ
मिथ्याचार का अर्थ दूसरों को धोखा देना नहीं, बल्कि स्वयं के साथ असत्य होना है।
जब हम भीतर कुछ और चाहते हैं और बाहर कुछ और दिखाते हैं, तो वही आंतरिक संघर्ष अशांति का कारण बनता है।
श्रीकृष्ण यहाँ ईमानदारी की बात कर रहे हैं — पहले अपने मन के साथ।
अर्जुन के संदर्भ में यह श्लोक
अर्जुन बाहर से युद्ध छोड़ना चाहता था, लेकिन भीतर उसका मन डर, मोह और कर्तव्य के द्वंद्व में उलझा था।
श्रीकृष्ण उसे दिखा रहे हैं कि केवल कर्म रोक लेने से भीतर का द्वंद्व समाप्त नहीं होता।
पहले मन की स्थिति बदलनी होती है।
निष्कर्ष: सच्चा संयम भीतर से शुरू होता है
गीता 3:6 हमें यह सिखाती है कि आध्यात्मिकता अभिनय नहीं, ईमानदारी है।
जब मन और कर्म एक ही दिशा में होते हैं, तभी जीवन में स्थिरता आती है।
जो भीतर साफ है, उसी का बाहर का संयम सार्थक है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न – गीता 3:6❓️
भगवद गीता 3:6 का मुख्य संदेश क्या है?
यह श्लोक सिखाता है कि केवल बाहरी संयम पर्याप्त नहीं है, मन की शुद्धता और आंतरिक संयम भी आवश्यक है।
मिथ्याचारी किसे कहा गया है?
जो व्यक्ति बाहर से इंद्रियों को रोकता है लेकिन मन में विषयों का स्मरण करता रहता है, उसे मिथ्याचारी कहा गया है।
क्या केवल संन्यास से शुद्धता मिल सकती है?
नहीं, गीता 3:6 के अनुसार बिना मन के संयम के बाहरी संन्यास व्यर्थ है।
आज के जीवन में गीता 3:6 कैसे उपयोगी है?
यह श्लोक हमें सिखाता है कि दिखावे की बजाय विचारों और भावनाओं की शुद्धता पर ध्यान देना चाहिए।
यह लेख भगवद गीता के श्लोक 3:6 की जीवनोपयोगी एवं दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। यह सामग्री केवल शैक्षिक और आध्यात्मिक उद्देश्य से है और किसी भी प्रकार की पेशेवर सलाह का विकल्प नहीं है।
Bhagavad Gita 3:6 – The Danger of False Renunciation
Can a person become spiritual by outwardly avoiding action while inwardly dwelling on desires? Bhagavad Gita 3:6 gives a clear warning against this mistake. Lord Krishna explains that one who restrains the organs of action but continues to think about sense enjoyment in the mind is self-deceived and called a hypocrite.
This verse exposes the difference between outer appearance and inner reality. Merely sitting idle, wearing simple clothes, or withdrawing from duties does not indicate inner freedom. If desires continue to operate in the mind, bondage remains strong. True renunciation is an inner transformation, not a change of lifestyle alone.
Krishna highlights that suppression without understanding leads to inner conflict. When actions are stopped forcefully but desires are not purified, the mind becomes restless and dishonest. Such a person may appear disciplined, but internally remains driven by craving and imagination.
This teaching is especially relevant in spiritual life. Krishna does not criticize action; he criticizes pretence. Honest engagement with life, combined with inner awareness, is superior to artificial withdrawal. Action performed with sincerity and self-control purifies the mind more effectively than forced inaction.
Bhagavad Gita 3:6 reminds us that spirituality demands inner honesty. Progress begins when thoughts, intentions, and actions align. Freedom is not achieved by hiding from desire, but by understanding and transforming it. When inner and outer life become consistent, the path to clarity and peace opens naturally.
Frequently Asked Questions
It warns against false renunciation and emphasizes inner sincerity.
One who avoids action outwardly but mentally indulges in desires.
No. Without purifying the mind, external control has little value.
No. It rejects pretence, not genuine inner discipline.
It reminds us that inner honesty is essential for real spiritual growth.

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