कभी-कभी हम सोचते हैं कि अगर हम काम करना बंद कर दें, जिम्मेदारियों से दूर हो जाएँ, तो शायद मन को शांति मिल जाएगी।
लेकिन क्या सच में ऐसा होता है? या बिना कर्म के भी मन भीतर-ही-भीतर चलता रहता है? भगवद गीता 3:4 इसी भ्रम को तोड़ती है।
भगवद गीता 3:4 – मूल श्लोक
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते। न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥
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| कर्म से भागना मुक्ति नहीं है। |
📖 गीता 3:4 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद
अर्जुन:
हे प्रभु,
यदि कर्मयोग और ज्ञानयोग दोनों हैं,
तो क्या कर्म न करने से
मनुष्य सिद्धि प्राप्त कर सकता है?
श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन,
केवल कर्मों का त्याग करने से
मनुष्य निष्कर्मता को प्राप्त नहीं होता।
श्रीकृष्ण:
और केवल बाहरी कर्म छोड़ देने से
कोई भी
सिद्धि को प्राप्त नहीं कर सकता।
अर्जुन:
तो फिर सही मार्ग क्या है, हे माधव?
श्रीकृष्ण:
अर्जुन,
आसक्ति का त्याग करके
कर्तव्य कर्म करना ही
सच्चा कर्मयोग है।
⚖️ कर्म-त्याग नहीं, आसक्ति-त्याग ही मुक्ति का मार्ग है
👉 कर्म छोड़ने से नहीं, कर्म को सही भाव से करने से सिद्धि मिलती है।
सरल अर्थ
मनुष्य केवल कर्म न करने से कर्म-बंधन से मुक्त नहीं होता। और केवल बाहरी संन्यास लेने से सिद्धि या पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकता।
यह श्लोक किस भ्रम को तोड़ता है?
अक्सर ऐसा माना जाता है कि कर्म से दूर चले जाने पर मन शुद्ध और शांत हो जाएगा।
लेकिन श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि कर्म का न होना और कर्म से मुक्ति — दोनों एक जैसी बातें नहीं हैं।
यदि मन भीतर से इच्छा, डर और आसक्ति से भरा है, तो बाहरी निष्क्रियता कोई वास्तविक शांति नहीं दे सकती।
आज के जीवन में यह शिक्षा क्यों ज़रूरी है?
आज भी लोग कहते हैं — थक गया हूँ, सब छोड़ देना चाहता हूँ।
लेकिन ज़्यादातर मामलों में छोड़ देने के बाद भी मन की बेचैनी बनी रहती है।
गीता 3:4 हमें यह दिखाती है कि समस्या काम में नहीं, बल्कि काम के प्रति दृष्टि में है।
एक वास्तविक जीवन उदाहरण
मान लीजिए कोई व्यक्ति नौकरी से बहुत परेशान होकर लंबी छुट्टी ले लेता है।
शुरू में उसे राहत मिलती है, लेकिन कुछ समय बाद वही चिंता, वही असंतोष फिर लौट आता है।
क्यों? क्योंकि समस्या काम की मात्रा नहीं, मन की स्थिति थी।
यही बात गीता 3:4 समझाती है — कर्म से भागने से नहीं, कर्म को समझने से मुक्ति मिलती है।
नैष्कर्म्य का सही अर्थ
नैष्कर्म्य का अर्थ काम न करना नहीं, बल्कि काम करते हुए आसक्ति से मुक्त होना है।
जब कर्म कर्तव्य बन जाता है, और फल की पकड़ ढीली पड़ जाती है, तब कर्म बंधन नहीं बनता।
यही कर्मयोग की नींव है।
अर्जुन के लिए यह शिक्षा क्यों आवश्यक थी?
अर्जुन युद्ध से पीछे हटना चाहता था। उसे लगा कि कर्म से दूर जाना ही सही मार्ग है।
श्रीकृष्ण उसे यह समझा रहे हैं कि बिना कर्म के न स्पष्टता आती है, न सिद्धि।
अर्जुन को अपने स्वभाव के अनुसार कर्म में रहते हुए मुक्ति का मार्ग सीखना था।
निष्कर्ष: कर्म से भागना समाधान नहीं
गीता 3:4 हमें यह सिखाती है कि जीवन से पलायन आध्यात्मिकता नहीं है।
वास्तविक उन्नति तब होती है जब हम कर्म में रहते हुए मन को शुद्ध करना सीखते हैं।
कर्म छोड़ा नहीं जाता, कर्म को समझा जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न – गीता 3:4❓️
भगवद गीता 3:4 का मुख्य संदेश क्या है?
यह श्लोक बताता है कि केवल कर्म छोड़ देने से निष्कर्मता प्राप्त नहीं होती और न ही केवल संन्यास से सिद्धि मिलती है।
क्या कर्म न करने से मोक्ष मिल सकता है?
नहीं, गीता 3:4 के अनुसार कर्म का त्याग समाधान नहीं है, बल्कि सही भावना से किया गया कर्म ही मार्ग है।
संन्यास क्यों पर्याप्त नहीं माना गया है?
क्योंकि बाहरी संन्यास बिना आंतरिक वैराग्य और कर्तव्य-बोध के सिद्धि नहीं दिला सकता।
आज के जीवन में गीता 3:4 कैसे उपयोगी है?
यह सिखाता है कि जिम्मेदारियों से भागने के बजाय, उन्हें सही दृष्टि और निस्वार्थ भाव से निभाना चाहिए।
भगवद गीता अध्याय 3 के महत्वपूर्ण श्लोक
भगवद गीता 3:1अर्जुन का प्रश्न और कर्मयोग की भूमिका भगवद गीता 3:2
श्रीकृष्ण का स्पष्ट उत्तर और कर्मयोग भगवद गीता 3:3
ज्ञानयोग और कर्मयोग का मार्ग भगवद गीता 3:5
कर्म के बिना कोई भी क्षणभर नहीं रह सकता
यह लेख भगवद गीता के श्लोक 3:4 की जीवनोपयोगी एवं दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। यह सामग्री केवल शैक्षिक और आध्यात्मिक उद्देश्य से है और किसी भी प्रकार की पेशेवर सलाह का विकल्प नहीं है।
Bhagavad Gita 3:4 – Why Avoiding Action Does Not Lead to Freedom
Can a person become free simply by avoiding action? Bhagavad Gita 3:4 gives a direct and practical answer. Lord Krishna explains that freedom is not achieved by merely abstaining from work, nor is perfection reached by external renunciation alone.
Many people believe that giving up action automatically leads to peace or spiritual progress. Krishna corrects this misunderstanding. Action is unavoidable in life. Even maintaining the body, thinking, or breathing involves activity. Trying to escape action does not free the mind — it often increases inner conflict and restlessness.
Krishna teaches that the real problem is not action itself, but attachment to action. When work is performed with selfish desire, ego, or expectation, it binds the mind. But when the same action is done with awareness and detachment, it becomes a path to inner freedom.
This verse emphasizes inner renunciation over outer renunciation. Simply giving up work, responsibility, or social duties does not purify the mind. True freedom comes when a person performs necessary action without craving personal reward or recognition.
In modern life, this teaching is highly relevant. Many people feel exhausted by responsibility and dream of escape. Bhagavad Gita 3:4 reminds us that peace is not found by running away from life, but by changing our inner relationship with work. When action is free from ego and attachment, it no longer disturbs the mind. Instead, it supports growth, balance, and clarity.
Frequently Asked Questions
It teaches that freedom is not gained by avoiding action or responsibility.
Because action is unavoidable and inner attachment remains unchanged.
Renunciation of attachment and ego, not renunciation of action.
No. Work becomes spiritual when done without selfish desire.
It teaches how to live responsibly without mental stress or inner bondage.

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