प्रश्न: गीता 3:28 में ज्ञानी व्यक्ति की दृष्टि क्या बताई गई है? उत्तर: गीता 3:28 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि जो व्यक्ति प्रकृति के गुणों और उनके कर्मों का वास्तविक स्वरूप जानता है, वह आसक्त नहीं होता। वह समझता है कि गुण ही गुणों में कार्य कर रहे हैं। क्या कर्म करते हुए भी भीतर शांत रहा जा सकता है? हम काम करते हैं, लेकिन मन हमेशा उलझा रहता है — कभी तुलना में, कभी परिणाम की चिंता में। भगवद्गीता 3:28 बताती है कि कर्म के बीच भी एक ऐसी दृष्टि संभव है, जहाँ मन केवल साक्षी बना रहता है। 📘 अध्याय 3 – कर्मयोग (पूरा संग्रह): भगवद गीता अध्याय 3 (कर्मयोग) – सभी श्लोकों का सरल अर्थ व जीवन उपयोग इस अध्याय में कर्मयोग के सभी श्लोक क्रमवार दिए गए हैं, जहाँ निष्काम कर्म, यज्ञ भाव और कर्तव्य पालन को आज के जीवन से जोड़कर समझाया गया है। गीता 3:28 – ज्ञानी की दृष्टि: कर्म में रहते हुए भी मुक्त गीता 3:27 में श्रीकृष्ण कर्तृत्व के भ्रम को उजागर करते हैं। गीता 3:28 उसी का समाधान देती है — ज्ञानी व्यक्ति कर्म को करता हुआ नहीं, कर्म को घटते हुए देखता है। 📜 ...