उत्तर: गीता 4:6 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे अजन्मा, अविनाशी और समस्त प्राणियों के ईश्वर हैं। फिर भी अपनी योगमाया से जब-जब आवश्यकता होती है, वे स्वयं अवतार धारण करते हैं।
🎯 गीता 4:6 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं
गीता 4:6 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि यद्यपि वे अजन्मा, अविनाशी और समस्त प्राणियों के ईश्वर हैं, फिर भी अपनी योगमाया के द्वारा समय-समय पर प्रकट होते हैं। उनका जन्म कर्म के बंधन से नहीं, बल्कि अपनी दिव्य इच्छा और धर्म की स्थापना के लिए होता है।
📈 जब अजन्मा भगवान जन्म लेते हैं
क्या यह संभव है कि जो कभी जन्म नहीं लेता, वही जन्म ले? क्या जो अविनाशी है, वह मानव रूप में हमारे बीच आ सकता है? कुरुक्षेत्र की भूमि पर भगवान श्रीकृष्ण ने ऐसा ही दिव्य रहस्य प्रकट किया। उन्होंने बताया कि उनका जन्म साधारण जीवों जैसा नहीं है। वे अजन्मा होते हुए भी अवतरित होते हैं। गीता 4:6 केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि अवतार-रहस्य का हृदय है।
📖 भगवद गीता अध्याय 4 – ज्ञान योग
इस पेज पर अध्याय 4 के सभी श्लोक सरल हिंदी व्याख्या सहित पढ़ें। यहाँ प्राचीन योग की परंपरा, उसका लोप और दिव्य ज्ञान का रहस्य समझाया गया है।
🕉️ गीता अध्याय 4 श्लोक 6 (Geeta 4:6)
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥
| ईश्वर जन्म लेते नहीं, प्रकट होते हैं |
📖 गीता 4:6 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद
श्रीकृष्ण:
यद्यपि मैं अजन्मा हूँ,
और मेरी अविनाशी आत्मा है,
श्रीकृष्ण:
फिर भी मैं
अपनी प्रकृति को अधीन करके
अपनी योगमाया से
प्रकट होता हूँ।
अर्जुन:
हे माधव,
क्या आपका जन्म
साधारण मनुष्यों जैसा नहीं है?
श्रीकृष्ण:
नहीं अर्जुन।
मेरा अवतार
दिव्य और स्वेच्छा से होता है,
बंधन से नहीं।
✨ अजन्मा होकर भी — भगवान अवतरित होते हैं
👉 ईश्वर जन्म लेते नहीं, वे प्रकट होते हैं।
📖 सरल अर्थ
भगवान कहते हैं — “यद्यपि मैं अजन्मा, अविनाशी आत्मा और समस्त प्राणियों का ईश्वर हूँ, फिर भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ।”
🧠 गहरा आध्यात्मिक अर्थ
यह श्लोक जीव और परमात्मा के बीच सबसे बड़ा अंतर स्पष्ट करता है। जीव जन्म लेता है क्योंकि वह कर्म के बंधन में है। भगवान प्रकट होते हैं क्योंकि वे स्वतंत्र हैं।
🌟 1️⃣ “अजोऽपि सन्” – भगवान अजन्मा हैं
अजन्मा का अर्थ है — जिनका कोई आरंभ नहीं। हमारा जन्म एक तिथि से जुड़ा है। परंतु भगवान काल से परे हैं। वे न कभी उत्पन्न हुए, न कभी नष्ट होंगे।
यह समझना कठिन है क्योंकि हमारी बुद्धि सीमित है। हम हर अस्तित्व को किसी न किसी शुरुआत से जोड़ते हैं। परंतु परम सत्य का कोई आरंभ नहीं होता।
🔥 2️⃣ “अव्ययात्मा” – अविनाशी स्वरूप
अव्यय का अर्थ है — जो कभी क्षीण न हो। हमारा शरीर बदलता है, मन बदलता है, विचार बदलते हैं। परंतु भगवान का स्वरूप सदा एक समान रहता है।
उनका ज्ञान, शक्ति और करुणा कभी कम नहीं होती। वे पूर्ण हैं — और पूर्ण ही रहते हैं।
👑 3️⃣ “भूतानाम् ईश्वरः” – सबके स्वामी
भगवान केवल एक महान आत्मा नहीं, बल्कि समस्त प्राणियों के ईश्वर हैं। वे सृष्टि के नियंता हैं। उनकी इच्छा के बिना कुछ भी संभव नहीं।
फिर भी वे मानव रूप में अवतरित होकर हमारे बीच आते हैं — यह उनकी करुणा का प्रमाण है।
🌺 4️⃣ “प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय” – प्रकृति पर अधिकार
जीव प्रकृति के अधीन है। भगवान प्रकृति के स्वामी हैं। जब वे जन्म लेते हैं, तो वे प्रकृति के नियमों से बंधे नहीं होते।
उनका शरीर दिव्य होता है — वह कर्मजन्य नहीं, बल्कि योगमाया से निर्मित होता है।
🔐 5️⃣ “सम्भवाम्यात्ममायया” – योगमाया से प्रकट होना
यहाँ “माया” का अर्थ भ्रम नहीं, बल्कि दिव्य शक्ति है। भगवान अपनी योगमाया से प्रकट होते हैं। उनका अवतार लीला है, बंधन नहीं।
वे जन्म लेते हुए भी जन्म के बंधन में नहीं आते। वे कर्म करते हुए भी कर्मफल से बंधते नहीं।
📌 जीवन में इस श्लोक का संदेश
1️⃣ ईश्वर को सीमित मत समझो
हम अक्सर भगवान को अपनी समझ के दायरे में बांध देते हैं। यह श्लोक हमें उस सीमा से बाहर सोचने के लिए प्रेरित करता है।
2️⃣ जीवन को दिव्य दृष्टि से देखें
यदि भगवान स्वयं धर्म की स्थापना के लिए आते हैं, तो हमारा जीवन भी धर्मपूर्ण होना चाहिए।
3️⃣ कर्म से ऊपर उठने की प्रेरणा
भगवान कर्म करते हुए भी बंधन में नहीं हैं। यह हमें सिखाता है कि कर्म करें, पर आसक्ति न रखें।
4️⃣ श्रद्धा को मजबूत करें
जब हम समझते हैं कि भगवान अजन्मा होते हुए भी अवतरित होते हैं, तब हमारी श्रद्धा गहरी हो जाती है।
🌊 गहरी आध्यात्मिक अनुभूति
गीता 4:6 हमें यह अनुभव कराती है कि दिव्यता केवल दूर आकाश में नहीं है। वह हमारे बीच आ सकती है। वह मानव रूप में हमारे साथ चल सकती है। परंतु वह फिर भी अनंत और असीम रहती है।
यह श्लोक हमें नम्र बनाता है। हम समझते हैं कि हमारा ज्ञान सीमित है, पर भगवान की लीला असीम है।
✨ निष्कर्ष
गीता 4:6 अवतार-रहस्य का मूल है। भगवान अजन्मा, अविनाशी और सर्वशक्तिमान होते हुए भी अपनी योगमाया से प्रकट होते हैं। उनका जन्म कर्म का परिणाम नहीं, बल्कि करुणा का प्रकट रूप है।
जब हम इस सत्य को हृदय से स्वीकार करते हैं, तब हमारा विश्वास केवल परंपरा नहीं, बल्कि अनुभव बन जाता है।
जय श्री कृष्ण 🙏
📘 भगवद गीता 4:6 – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
🕉️ गीता 4:6 में श्रीकृष्ण क्या बताते हैं?
श्रीकृष्ण बताते हैं कि वे अजन्मा और अविनाशी होते हुए भी अपनी योगमाया से संसार में प्रकट होते हैं।
✨ ‘अजन्मा’ का क्या अर्थ है?
अजन्मा का अर्थ है जो वास्तव में जन्म नहीं लेता, अर्थात् जिसकी आत्मा अनादि और शाश्वत है।
🌌 योगमाया क्या है?
योगमाया भगवान की दिव्य शक्ति है, जिसके माध्यम से वे संसार में अवतरित होते हैं।
⚖️ भगवान का जन्म सामान्य मनुष्य जैसा क्यों नहीं है?
क्योंकि भगवान का अवतार बंधन से नहीं, बल्कि स्वेच्छा और दिव्य उद्देश्य से होता है।
🕊️ गीता 4:6 का मुख्य संदेश क्या है?
ईश्वर जन्म से बंधे नहीं होते; वे धर्म की स्थापना के लिए दिव्य रूप से प्रकट होते हैं।
✍️ लेखक के बारे में
Bhagwat Geeta by Sun एक जीवन-दर्शन आधारित आध्यात्मिक मंच है, जहाँ श्रीमद्भगवद्गीता को मानव व्यवहार, आदत और आत्म-नियंत्रण से जोड़कर व्यावहारिक रूप में समझाया जाता है।
इस मंच का उद्देश्य गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि व्यक्तित्व विकास की गहरी मार्गदर्शिका के रूप में प्रस्तुत करना है।
यह लेख केवल शैक्षिक, आध्यात्मिक और आत्म-विकास के उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय, कानूनी या वित्तीय सलाह नहीं है। भगवद्गीता की व्याख्या विभिन्न परंपराओं और दृष्टिकोणों के अनुसार भिन्न हो सकती है। पाठक अपने विवेक का प्रयोग करें।
Bhagavad Gita 4:6 – The Difference Between Divine Birth and Human Birth
If Krishna has many births, does that make him like everyone else? Bhagavad Gita 4:6 clarifies a powerful distinction between divine incarnation and ordinary rebirth.
Bhagavad Gita 4:6 – Shlok (English Letters)
Ajo ’pi sann avyayātmā
bhūtānām īśvaro ’pi san |
Prakṛtiṁ svām adhiṣṭhāya
sambhavāmy ātma-māyayā ||
Explanation
In Bhagavad Gita 4:6, Lord Krishna explains that although he appears to take birth, his nature is unborn and eternal. He is the Lord of all beings, yet he manifests through his own divine power.
This verse introduces the concept of divine incarnation. Ordinary beings are born due to past actions and karma. Krishna, however, is not bound by karma. He manifests voluntarily, through ātma-māyā — his own spiritual energy.
The distinction is crucial. Human birth is compulsory and conditioned. Divine manifestation is conscious and intentional. Krishna’s appearance is not forced by circumstances, but guided by purpose.
For a modern global audience, this verse addresses a central theological question: How can the eternal appear in time? Bhagavad Gita 4:6 suggests that ultimate reality is not limited by physical laws. Divinity can enter history without being confined by it.
Real-Life Example
Consider a global humanitarian leader who voluntarily enters crisis zones to restore stability. They are not trapped by the crisis, but choose to engage for a purpose. Similarly, Krishna explains that his manifestation is intentional, not karmically compelled.
The verse teaches that divine presence operates beyond ordinary limitations. Understanding this prepares the reader for the mission described in the next verse.
Frequently Asked Questions
It explains that Krishna’s birth is divine and voluntary, not karmically forced like human birth.
It refers to divine spiritual power through which Krishna manifests.
Human birth is driven by karma, while divine manifestation is intentional and free.
Yes. It addresses the nature of divinity and how eternal consciousness interacts with history.
An explanation of why divine incarnation occurs.
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