उत्तर: गीता 4:7 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब वे स्वयं पृथ्वी पर अवतार लेते हैं। उनका उद्देश्य धर्म की पुनः स्थापना करना है।
🎯 गीता 4:7 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं
गीता 4:7 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब वे स्वयं पृथ्वी पर अवतरित होते हैं। उनका अवतार कर्म के बंधन से नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा और संतों के कल्याण के लिए होता है।
📈 जब भगवान स्वयं धरती पर आते हैं
जब अन्याय बढ़ जाता है… जब सत्य दबने लगता है… जब धर्म कमजोर पड़ जाता है… क्या तब भगवान केवल देखते रहते हैं? गीता 4:7 में श्रीकृष्ण स्वयं घोषणा करते हैं — “जब-जब धर्म की हानि होती है, तब मैं स्वयं अवतरित होता हूँ।” यह केवल एक वचन नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए आशा का दिव्य आश्वासन है।
🕉️ गीता अध्याय 4 श्लोक 7 (Geeta 4:7)
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
| धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर स्वयं प्रकट होते हैं |
📖 गीता 4:7 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद
श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन,
जब-जब
धर्म की हानि होती है,
श्रीकृष्ण:
और अधर्म की वृद्धि
होती है,
श्रीकृष्ण:
तब-तब
मैं स्वयं प्रकट होता हूँ।
अर्जुन:
हे माधव,
क्या आप हर युग में
धर्म की रक्षा के लिए आते हैं?
श्रीकृष्ण:
हाँ अर्जुन।
धर्म संतुलन बिगड़ने पर
मेरा अवतार
सृष्टि की रक्षा के लिए होता है।
⚖️ जब अधर्म बढ़ता है — तब भगवान अवतरित होते हैं
👉 ईश्वर मौन नहीं रहते, वे समय आने पर प्रकट होते हैं।
📖 सरल अर्थ
हे अर्जुन! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।
🧠 श्लोक का गहरा आध्यात्मिक अर्थ
यह श्लोक अवतार-तत्व का केंद्र है। भगवान यहाँ स्पष्ट करते हैं कि उनका अवतरण कोई संयोग नहीं, बल्कि एक दिव्य संकल्प है। वे तब आते हैं जब संसार संतुलन खो देता है।
🌟 1️⃣ “धर्मस्य ग्लानि” – धर्म की हानि क्या है?
धर्म केवल पूजा-पाठ नहीं है। धर्म का अर्थ है — सत्य, करुणा, न्याय, कर्तव्य और संतुलन। जब समाज में इन मूल्यों की कमी होने लगती है, जब लोभ, हिंसा और अन्याय बढ़ने लगते हैं — तब धर्म की ग्लानि होती है।
धर्म की हानि केवल बाहरी नहीं, आंतरिक भी होती है। जब मनुष्य अपने भीतर के सत्य को भूल जाता है, तब भी धर्म कमजोर पड़ता है।
🔥 2️⃣ “अधर्मस्य अभ्युत्थानम्” – अधर्म का बढ़ना
अधर्म केवल पाप या अपराध नहीं है। अधर्म वह है जो संतुलन को बिगाड़ दे, जो सत्य को दबा दे, जो स्वार्थ को सर्वोपरि बना दे।
जब अधर्म बढ़ता है, तब समाज में भय, असुरक्षा और अशांति फैलती है। ऐसे समय में मानवता को दिव्य मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है।
👑 3️⃣ “तदात्मानं सृजाम्यहम्” – भगवान का अवतार
यहाँ भगवान कहते हैं — “मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।” यह शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे किसी के द्वारा भेजे नहीं जाते, वे स्वयं निर्णय लेते हैं।
उनका अवतार कर्म के कारण नहीं, बल्कि करुणा के कारण होता है। वे धर्म की रक्षा के लिए आते हैं, न कि अपनी महिमा दिखाने के लिए।
🌊 अवतार का रहस्य
भगवान का जन्म साधारण जन्म नहीं है। वे प्रकृति के अधीन नहीं, बल्कि प्रकृति के स्वामी हैं। उनका अवतार एक लीला है — एक दिव्य खेल।
इतिहास में अनेक बार भगवान विभिन्न रूपों में प्रकट हुए — धर्म की स्थापना के लिए, संतों की रक्षा के लिए, और अधर्म के विनाश के लिए।
📌 जीवन में इस श्लोक का संदेश
1️⃣ आशा कभी मत छोड़ो
जब संसार में अन्याय बढ़े, तब निराश मत हो। भगवान का यह वचन हमें आश्वासन देता है कि सत्य अंततः विजयी होगा।
2️⃣ अपने भीतर धर्म स्थापित करो
धर्म केवल समाज में नहीं, हमारे भीतर भी स्थापित होना चाहिए। जब हम सत्य और करुणा का पालन करते हैं, तब हम भी धर्म की स्थापना में सहभागी बनते हैं।
3️⃣ संकट में विश्वास बनाए रखें
अंधकार चाहे कितना भी गहरा हो, प्रकाश अवश्य आता है। भगवान का अवतार उसी प्रकाश का प्रतीक है।
4️⃣ धर्म के पक्ष में खड़े हों
अर्जुन को भी युद्धभूमि में धर्म के लिए खड़ा होना पड़ा। केवल भगवान पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं, हमें भी अपना कर्तव्य निभाना होगा।
🌺 गहरी आध्यात्मिक अनुभूति
गीता 4:7 हमें यह अनुभव कराती है कि ईश्वर निष्क्रिय नहीं हैं। वे संसार की पीड़ा से अनभिज्ञ नहीं हैं। वे देखते हैं, प्रतीक्षा करते हैं, और उचित समय पर हस्तक्षेप करते हैं।
यह श्लोक केवल ऐतिहासिक घटनाओं की बात नहीं करता, बल्कि हर युग में लागू होता है। जब भी सत्य दबेगा, दिव्यता प्रकट होगी।
✨ निष्कर्ष
गीता 4:7 मानवता के लिए एक दिव्य आश्वासन है। जब-जब धर्म की हानि होगी, भगवान स्वयं अवतरित होंगे। उनका अवतार करुणा, न्याय और सत्य की पुनर्स्थापना के लिए है।
यह श्लोक हमें सिखाता है कि धर्म केवल भगवान की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हमारी भी है। जब हम अपने जीवन में धर्म को स्थापित करते हैं, तब हम भी उस दिव्य कार्य का हिस्सा बन जाते हैं।
जय श्री कृष्ण 🙏
📘 भगवद गीता 4:7 – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
🕉️ गीता 4:7 में श्रीकृष्ण क्या कहते हैं?
श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब वे स्वयं प्रकट होते हैं।
⚖️ ‘धर्म की हानि’ का क्या अर्थ है?
धर्म की हानि का अर्थ है सत्य, न्याय और नैतिक मूल्यों का कमजोर होना।
🔥 ‘अधर्म की वृद्धि’ से क्या तात्पर्य है?
अधर्म की वृद्धि का अर्थ है अन्याय, पाप और अनैतिकता का बढ़ना।
🌌 क्या भगवान हर युग में अवतरित होते हैं?
गीता के अनुसार जब भी संसार में संतुलन बिगड़ता है, तब भगवान धर्म की स्थापना के लिए प्रकट होते हैं।
🕊️ गीता 4:7 का मुख्य संदेश क्या है?
ईश्वर धर्म की रक्षा के लिए समय-समय पर अवतार लेते हैं और संसार में संतुलन स्थापित करते हैं।
✍️ लेखक के बारे में
Bhagwat Geeta by Sun एक जीवन-दर्शन आधारित आध्यात्मिक मंच है, जहाँ श्रीमद्भगवद्गीता को मानव व्यवहार, आदत और आत्म-नियंत्रण से जोड़कर व्यावहारिक रूप में समझाया जाता है।
इस मंच का उद्देश्य गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि व्यक्तित्व विकास की गहरी मार्गदर्शिका के रूप में प्रस्तुत करना है।
यह लेख केवल शैक्षिक, आध्यात्मिक और आत्म-विकास के उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय, कानूनी या वित्तीय सलाह नहीं है। भगवद्गीता की व्याख्या विभिन्न परंपराओं और दृष्टिकोणों के अनुसार भिन्न हो सकती है। पाठक अपने विवेक का प्रयोग करें।
यह लेख केवल शैक्षिक, आध्यात्मिक और आत्म-विकास के उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय, कानूनी या वित्तीय सलाह नहीं है। भगवद्गीता की व्याख्या विभिन्न परंपराओं और दृष्टिकोणों के अनुसार भिन्न हो सकती है। पाठक अपने विवेक का प्रयोग करें।
Bhagavad Gita 4:6 – The Difference Between Divine Birth and Human Birth
If Krishna has many births, does that make him like everyone else? Bhagavad Gita 4:6 clarifies a powerful distinction between divine incarnation and ordinary rebirth.
Bhagavad Gita 4:6 – Shlok (English Letters)
Ajo ’pi sann avyayātmā
bhūtānām īśvaro ’pi san |
Prakṛtiṁ svām adhiṣṭhāya
sambhavāmy ātma-māyayā ||
Explanation
In Bhagavad Gita 4:6, Lord Krishna explains that although he appears to take birth, his nature is unborn and eternal. He is the Lord of all beings, yet he manifests through his own divine power.
This verse introduces the concept of divine incarnation. Ordinary beings are born due to past actions and karma. Krishna, however, is not bound by karma. He manifests voluntarily, through ātma-māyā — his own spiritual energy.
The distinction is crucial. Human birth is compulsory and conditioned. Divine manifestation is conscious and intentional. Krishna’s appearance is not forced by circumstances, but guided by purpose.
For a modern global audience, this verse addresses a central theological question: How can the eternal appear in time? Bhagavad Gita 4:6 suggests that ultimate reality is not limited by physical laws. Divinity can enter history without being confined by it.
Real-Life Example
Consider a global humanitarian leader who voluntarily enters crisis zones to restore stability. They are not trapped by the crisis, but choose to engage for a purpose. Similarly, Krishna explains that his manifestation is intentional, not karmically compelled.
The verse teaches that divine presence operates beyond ordinary limitations. Understanding this prepares the reader for the mission described in the next verse.
Frequently Asked Questions
It explains that Krishna’s birth is divine and voluntary, not karmically forced like human birth.
It refers to divine spiritual power through which Krishna manifests.
Human birth is driven by karma, while divine manifestation is intentional and free.
Yes. It addresses the nature of divinity and how eternal consciousness interacts with history.
An explanation of why divine incarnation occurs.
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