उत्तर: गीता 4:8 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे साधुओं की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनः स्थापना के लिए युग-युग में अवतार लेते हैं। उनका अवतार लोककल्याण के लिए होता है।
🎯 गीता 4:8 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं
गीता 4:8 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे साधुओं की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए युग-युग में अवतरित होते हैं। उनका अवतार केवल दंड देने के लिए नहीं, बल्कि संतुलन, न्याय और आध्यात्मिक जागरण स्थापित करने के लिए होता है।
📈 जब भगवान न्याय के लिए स्वयं उतरते हैं
जब निर्दोष रोते हैं… जब अन्याय हँसता है… जब सत्य दब जाता है… तब क्या ईश्वर मौन रहते हैं?
गीता 4:8 उस मौन को तोड़ती है। भगवान स्वयं घोषणा करते हैं — वे आते हैं। साधुओं की रक्षा के लिए। दुष्टों के विनाश के लिए। और धर्म की पुनः स्थापना के लिए।
यह केवल एक धार्मिक वचन नहीं, बल्कि समस्त मानवता के लिए आशा का शाश्वत आश्वासन है।
🕉️ गीता अध्याय 4 श्लोक 8 (Geeta 4:8)
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
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| ईश्वर का अवतार धर्म की रक्षा और अधर्म के अंत के लिए होता है |
📖 गीता 4:8 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद
श्रीकृष्ण:
साधुओं की रक्षा के लिए,
श्रीकृष्ण:
दुष्टों के विनाश के लिए,
श्रीकृष्ण:
और धर्म की स्थापना के लिए,
मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।
अर्जुन:
हे माधव,
तो आपका अवतार
केवल दंड देने के लिए नहीं,
बल्कि रक्षा और संतुलन के लिए भी है?
श्रीकृष्ण:
हाँ अर्जुन।
मेरा अवतार
करुणा और न्याय
दोनों का प्रतीक है।
🛡️ रक्षा • विनाश • धर्म स्थापना
👉 जब संसार असंतुलित होता है, ईश्वर संतुलन बनाकर आते हैं।
📖 सरल अर्थ
भगवान कहते हैं — “साधुओं की रक्षा करने के लिए, दुष्ट कर्म करने वालों के विनाश के लिए और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।”
🧠 श्लोक का गहरा आध्यात्मिक अर्थ
यह श्लोक अवतार-तत्व की पराकाष्ठा है। यहाँ भगवान अपने अवतरण के तीन मुख्य उद्देश्य स्पष्ट करते हैं —
- साधुओं की रक्षा
- दुष्टों का विनाश
- धर्म की पुनः स्थापना
परंतु इन तीनों को केवल बाहरी घटनाओं के रूप में समझना अधूरा है। इनके भीतर गहरा आध्यात्मिक संकेत छिपा है।
🌟 1️⃣ “परित्राणाय साधूनाम्” – साधुओं की रक्षा
साधु कौन है? क्या केवल वह जो सन्यास ले ले? या वह जो भगवा वस्त्र धारण करे?
साधु वह है जिसका हृदय शुद्ध है। जो सत्य का अनुसरण करता है। जो दूसरों का अहित नहीं चाहता। जो धर्म के मार्ग पर चलने का प्रयास करता है।
भगवान ऐसे हृदयों की रक्षा करते हैं। यह रक्षा केवल शारीरिक नहीं, आध्यात्मिक भी होती है।
कभी रक्षा साहस देकर होती है। कभी सही मार्ग दिखाकर। कभी भीतर की शक्ति जागृत करके।
अर्थात जब कोई व्यक्ति सत्य के मार्ग पर चलता है, तब वह अकेला नहीं होता। ईश्वर की शक्ति उसके साथ होती है।
🔥 2️⃣ “विनाशाय च दुष्कृताम्” – दुष्टों का विनाश
यहाँ “विनाश” शब्द का अर्थ केवल शारीरिक नाश नहीं है। दुष्कृत्य अर्थात अधर्म, अन्याय, अत्याचार, स्वार्थ और अहंकार।
जब अधर्म बढ़ता है, तो उसका अंत अवश्य होता है। ईश्वर उस संतुलन को पुनः स्थापित करते हैं।
दुष्टों का विनाश कई रूपों में होता है —
- अहंकार का पतन
- असत्य का उजागर होना
- अन्याय का अंत
यह संदेश हमें यह भी सिखाता है कि अधर्म स्थायी नहीं है। वह जितना भी शक्तिशाली दिखे, उसका अंत निश्चित है।
⚖️ 3️⃣ “धर्मसंस्थापनार्थाय” – धर्म की पुनः स्थापना
धर्म का अर्थ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। धर्म का अर्थ है — संतुलन, सत्य, न्याय, करुणा और कर्तव्य।
जब ये मूल्य कमजोर पड़ते हैं, तब समाज असंतुलित हो जाता है। भगवान का अवतार उस संतुलन को पुनः स्थापित करने के लिए होता है।
धर्म की स्थापना केवल युद्ध जीतने से नहीं होती। वह लोगों के हृदय में जागृति लाकर होती है।
⏳ 4️⃣ “सम्भवामि युगे युगे” – हर युग में अवतार
भगवान का कार्य एक बार का नहीं है। हर युग में जब भी आवश्यकता होती है, वे प्रकट होते हैं।
युग का अर्थ केवल कालखंड नहीं, बल्कि परिस्थिति भी है। जब-जब अंधकार बढ़ेगा, तब-तब प्रकाश प्रकट होगा।
🌊 बाहरी और आंतरिक अर्थ
🔹 बाहरी अर्थ
इतिहास में जब भी अधर्म बढ़ा, दिव्य शक्ति ने हस्तक्षेप किया। धर्म की रक्षा हुई, संतों की सुरक्षा हुई।
🔹 आंतरिक अर्थ
हमारे भीतर भी साधु और दुष्ट दोनों प्रवृत्तियाँ हैं। जब हम भीतर के अधर्म से लड़ते हैं, तब भगवान की कृपा हमारे भीतर जागृत होती है।
साधु की रक्षा का अर्थ है — हमारी सद्गुणों की रक्षा। दुष्टों का विनाश का अर्थ है — हमारे अहंकार और नकारात्मकता का अंत।
📌 जीवन में इस श्लोक का महत्व
1️⃣ आशा का शाश्वत वचन
यह श्लोक बताता है कि अन्याय स्थायी नहीं है।
2️⃣ धर्म के पक्ष में खड़े हों
केवल भगवान के अवतार की प्रतीक्षा न करें, स्वयं भी धर्म के मार्ग पर चलें।
3️⃣ आंतरिक शुद्धि
अपने भीतर के अधर्म को पहचानें और उसे समाप्त करें।
4️⃣ साहस और विश्वास
सत्य के मार्ग पर चलना कठिन हो सकता है, परंतु ईश्वर की शक्ति साथ होती है।
🌺 गहरी आध्यात्मिक अनुभूति
गीता 4:8 केवल ऐतिहासिक घोषणा नहीं है। यह एक जीवंत सत्य है।
जब भी संसार में अंधकार बढ़ता है, यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि प्रकाश अवश्य आएगा।
जब भी हमारे जीवन में अन्याय या कठिनाई आए, यह श्लोक हमें आश्वस्त करता है कि दिव्यता मौन नहीं है।
✨ अंतिम निष्कर्ष
गीता 4:8 अवतार-तत्व का हृदय है। भगवान साधुओं की रक्षा करते हैं। दुष्टों का विनाश करते हैं। और धर्म की पुनः स्थापना करते हैं।
यह श्लोक हमें सिखाता है कि सत्य कभी पराजित नहीं होता। धर्म कभी नष्ट नहीं होता। और ईश्वर कभी निष्क्रिय नहीं रहते।
जब हम इस सत्य को हृदय से स्वीकार करते हैं, तब भय समाप्त हो जाता है और विश्वास जन्म लेता है।
जय श्री कृष्ण 🙏
📘 भगवद गीता 4:8 – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
🕉️ गीता 4:8 में श्रीकृष्ण क्या कहते हैं?
श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे साधुओं की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए युग-युग में प्रकट होते हैं।
🛡️ ‘साधुओं की रक्षा’ का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है धर्मपरायण और सत्य मार्ग पर चलने वाले लोगों की सुरक्षा करना।
⚔️ ‘दुष्टों के विनाश’ से क्या तात्पर्य है?
अधर्म और अन्याय फैलाने वाली शक्तियों का अंत करना।
⚖️ धर्म की स्थापना क्यों आवश्यक है?
धर्म समाज में संतुलन, न्याय और नैतिकता बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
🕊️ गीता 4:8 का मुख्य संदेश क्या है?
ईश्वर का अवतार करुणा और न्याय दोनों का प्रतीक है, जो संसार में संतुलन स्थापित करता है।
✍️ लेखक के बारे में
Bhagwat Geeta by Sun एक जीवन-दर्शन आधारित आध्यात्मिक मंच है, जहाँ श्रीमद्भगवद्गीता को मानव व्यवहार, आदत और आत्म-नियंत्रण से जोड़कर व्यावहारिक रूप में समझाया जाता है।
इस मंच का उद्देश्य गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि व्यक्तित्व विकास की गहरी मार्गदर्शिका के रूप में प्रस्तुत करना है।
यह लेख केवल शैक्षिक, आध्यात्मिक और आत्म-विकास के उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय, कानूनी या वित्तीय सलाह नहीं है। भगवद्गीता की व्याख्या विभिन्न परंपराओं और दृष्टिकोणों के अनुसार भिन्न हो सकती है। पाठक अपने विवेक का प्रयोग करें।
Bhagavad Gita 4:8 – The Purpose Behind Divine Incarnation
Why does the Divine enter human history? Is it symbolic — or purposeful? Bhagavad Gita 4:8 reveals the mission behind every divine appearance.
Bhagavad Gita 4:8 – Shlok (English Letters)
Paritrāṇāya sādhūnāṁ
vināśāya ca duṣkṛtām |
Dharma-saṁsthāpanārthāya
sambhavāmi yuge yuge ||
Explanation
In Bhagavad Gita 4:8, Lord Krishna clearly explains why divine incarnation takes place. He manifests to protect the righteous, to restrain destructive forces, and to re-establish dharma — the principle of order and balance.
This verse completes the thought begun in 4:6 and 4:7. Divine appearance is not random. It happens when moral imbalance becomes severe. Krishna emphasizes that this restoration occurs repeatedly — “yuge yuge” — age after age.
Protection here is not merely physical. It includes safeguarding values, truth, and ethical stability. Similarly, destruction of wrongdoing does not always mean violence. It may involve transformation, exposure of injustice, or correction of systems.
For a modern global audience, this verse speaks beyond mythology. Whenever societies drift toward corruption, extreme injustice, or moral confusion, forces of restoration emerge. Bhagavad Gita 4:8 reminds us that balance is a universal law. When harmony collapses, correction follows.
Real-Life Example
Consider global movements that arise to defend human rights or environmental balance. When exploitation becomes severe, leaders and reformers appear. Their role is not personal ambition, but restoration of justice. In a broader spiritual sense, this reflects the principle described in Bhagavad Gita 4:8.
The verse teaches that divine intervention is aligned with preservation of order, not favoritism. It reassures humanity that decline is never permanent. Restoration is inevitable.
Frequently Asked Questions
It explains that divine incarnation occurs to protect righteousness and restore dharma.
It means “age after age,” indicating repeated restoration across time.
Not necessarily. It can also mean correction, reform, or transformation of injustice.
It reassures that moral balance is eventually restored in society.
The purpose behind divine manifestation in history.

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