उत्तर: गीता 4:5 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि अर्जुन और उनके अनेकों जन्म हो चुके हैं। अंतर यह है कि श्रीकृष्ण उन सभी जन्मों को जानते हैं, जबकि अर्जुन उन्हें नहीं जानते।
🎯 भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते
गीता 4:5 में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हमारे और तुम्हारे अनेक जन्म हो चुके हैं। मुझे वे सब स्मरण हैं, परंतु तुम्हें नहीं। यह श्लोक भगवान के दिव्य स्वरूप और जीव की सीमित स्मृति के अंतर को स्पष्ट करता है तथा अवतार-रहस्य को उजागर करता है।
📈 जब भगवान ने जन्मों का रहस्य खोला
कुरुक्षेत्र की रणभूमि में अर्जुन का प्रश्न गूंज रहा था। वह समझ नहीं पा रहा था कि भगवान ने सूर्यदेव को प्राचीन काल में ज्ञान कैसे दिया। तब श्रीकृष्ण ने एक ऐसा उत्तर दिया जिसने केवल अर्जुन ही नहीं, पूरी मानवता की सोच बदल दी। उन्होंने कहा — “हम दोनों के अनेक जन्म हो चुके हैं। मुझे सब स्मरण हैं, पर तुम्हें नहीं।” यह उत्तर केवल जन्म की बात नहीं करता, यह आत्मा और परमात्मा के अंतर का रहस्य खोलता है।
🕉️ गीता अध्याय 4 श्लोक 5 (Geeta 4:5)
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप॥
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| ईश्वर सब जन्मों को जानता है, पर जीव भूल जाता है |
📖 गीता 4:5 – श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद
श्रीकृष्ण:
हे अर्जुन,
मेरे और तुम्हारे
अनेक जन्म हो चुके हैं।
श्रीकृष्ण:
मैं उन सभी जन्मों को
जानता हूँ,
परंतु तुम
उन्हें नहीं जानते।
अर्जुन:
हे माधव,
क्या आप अपने सभी जन्मों को
स्मरण रखते हैं?
श्रीकृष्ण:
हाँ अर्जुन।
मैं अजन्मा और दिव्य हूँ,
इसलिए मेरे लिए
भूत, वर्तमान और भविष्य
स्पष्ट हैं।
🌌 भगवान सर्वज्ञ हैं — जीव सीमित स्मृति वाला
👉 आत्मा शाश्वत है, पर दिव्यता सब कुछ जानती है।
📖 सरल अर्थ
भगवान कहते हैं — “हे अर्जुन! मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म हो चुके हैं। मुझे वे सब ज्ञात हैं, परंतु तुम्हें उनका ज्ञान नहीं है।”
🧠 श्लोक का गहरा आध्यात्मिक अर्थ
यहाँ भगवान श्रीकृष्ण एक अत्यंत महत्वपूर्ण सत्य प्रकट करते हैं। वे बताते हैं कि जीव और परमात्मा दोनों जन्म लेते हैं, परंतु दोनों के जन्म में मूलभूत अंतर है। जीव कर्म के बंधन में जन्म लेता है, जबकि भगवान अपनी इच्छा से अवतरित होते हैं।
🌟 1️⃣ जीव और परमात्मा का अंतर
अर्जुन और अन्य सभी जीवात्माएँ अपने पिछले जन्मों को भूल जाती हैं। इसका कारण है माया और कर्म का बंधन। जब आत्मा नया शरीर धारण करती है, तो पूर्व जन्म की स्मृतियाँ लुप्त हो जाती हैं।
लेकिन भगवान पर माया का प्रभाव नहीं होता। वे सर्वज्ञ हैं। उन्हें अपने सभी अवतारों और लीलाओं का स्मरण रहता है। यही अंतर जीव और ईश्वर के बीच दिव्यता की रेखा खींचता है।
⏳ 2️⃣ जन्म का वास्तविक अर्थ
हम सामान्यतः जन्म को शरीर की उत्पत्ति मानते हैं। परंतु भगवान के लिए जन्म का अर्थ है — दिव्य अवतरण। वे समय-समय पर धर्म की स्थापना के लिए प्रकट होते हैं। उनका जन्म कर्म के कारण नहीं, बल्कि करुणा के कारण होता है।
🔐 3️⃣ स्मृति और चेतना का रहस्य
स्मृति केवल मानसिक प्रक्रिया नहीं है, यह चेतना का स्तर भी दर्शाती है। हमारी चेतना सीमित है, इसलिए हमारी स्मृति भी सीमित है। भगवान की चेतना असीम है, इसलिए उनकी स्मृति भी असीम है।
📌 इस श्लोक से मिलने वाले जीवन संदेश
1️⃣ आत्मा अमर है
यह श्लोक संकेत देता है कि आत्मा का अस्तित्व एक जन्म तक सीमित नहीं है। हम केवल यह शरीर नहीं हैं।
2️⃣ कर्म का प्रभाव
हमारे जन्म कर्मों के अनुसार होते हैं। इसलिए वर्तमान जीवन में किए गए कर्म भविष्य को निर्धारित करते हैं।
3️⃣ ईश्वर सर्वज्ञ हैं
भगवान को सब ज्ञात है — हमारे अतीत, वर्तमान और भविष्य तक। इसलिए उन पर विश्वास करना सुरक्षित है।
4️⃣ विनम्रता का महत्व
अर्जुन ने स्वीकार किया कि वह सब नहीं जानता। यही सच्चे ज्ञान की शुरुआत है।
🌺 आध्यात्मिक चिंतन
जब भगवान कहते हैं कि उन्हें सब जन्म स्मरण हैं, तो यह केवल जानकारी का दावा नहीं है। यह हमें यह समझाने का प्रयास है कि दिव्यता समय और स्मृति की सीमाओं से परे है।
हम अपने जीवन की घटनाओं को ही पूरी सच्चाई मान लेते हैं, परंतु संभव है कि हमारी आत्मा की यात्रा बहुत लंबी रही हो। यह विचार ही हमारे अहंकार को कम कर देता है।
🔥 अवतार-रहस्य की शुरुआत
यह श्लोक अगले महान उद्घोष (4:7–4:8) की भूमिका तैयार करता है, जहाँ भगवान धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश के लिए अपने अवतार का उद्देश्य बताते हैं।
गीता 4:5 उस पुल की तरह है जो मानव दृष्टि को दिव्य दृष्टि से जोड़ता है।
✨ निष्कर्ष
गीता 4:5 हमें सिखाती है कि आत्मा की यात्रा अनंत है और ईश्वर सर्वज्ञ हैं। जीव सीमित है, भगवान असीम हैं। हम भूल जाते हैं, पर भगवान कभी नहीं भूलते। यही अंतर हमें श्रद्धा और समर्पण की ओर ले जाता है।
जब हम समझते हैं कि हमारा अस्तित्व केवल एक जन्म तक सीमित नहीं है, तब जीवन के प्रति हमारी दृष्टि बदल जाती है। यही इस श्लोक का गहरा संदेश है।
जय श्री कृष्ण 🙏
📘 भगवद गीता 4:5 – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
🕉️ गीता 4:5 में श्रीकृष्ण क्या कहते हैं?
श्रीकृष्ण कहते हैं कि उनके और अर्जुन के अनेक जन्म हो चुके हैं, लेकिन वे उन सभी को जानते हैं जबकि अर्जुन उन्हें नहीं जानते।
🌌 श्रीकृष्ण अपने जन्मों को कैसे जानते हैं?
क्योंकि वे दिव्य और सर्वज्ञ हैं, उनके लिए भूत, वर्तमान और भविष्य स्पष्ट हैं।
♻️ क्या यह श्लोक पुनर्जन्म की बात करता है?
हाँ, यह श्लोक बताता है कि जीवात्मा के अनेक जन्म होते हैं।
🧠 अर्जुन अपने जन्मों को क्यों नहीं जानते?
क्योंकि सामान्य जीव सीमित स्मृति और अज्ञान के कारण अपने पूर्व जन्मों को स्मरण नहीं रख पाता।
🕊️ गीता 4:5 का मुख्य संदेश क्या है?
ईश्वर सर्वज्ञ हैं, जबकि जीव सीमित है; यही अंतर दिव्यता और मानवता के बीच है।
✍️ लेखक के बारे में
Bhagwat Geeta by Sun एक जीवन-दर्शन आधारित आध्यात्मिक मंच है, जहाँ श्रीमद्भगवद्गीता को मानव व्यवहार, आदत और आत्म-नियंत्रण से जोड़कर व्यावहारिक रूप में समझाया जाता है।
इस मंच का उद्देश्य गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि व्यक्तित्व विकास की गहरी मार्गदर्शिका के रूप में प्रस्तुत करना है।
यह लेख केवल शैक्षिक, आध्यात्मिक और आत्म-विकास के उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय, कानूनी या वित्तीय सलाह नहीं है। भगवद्गीता की व्याख्या विभिन्न परंपराओं और दृष्टिकोणों के अनुसार भिन्न हो सकती है। पाठक अपने विवेक का प्रयोग करें।
Bhagavad Gita 4:5 – The Mystery of Divine and Human Births
How could Krishna teach ancient wisdom before his visible birth? Bhagavad Gita 4:5 begins the revelation that transforms the entire dialogue.
Bhagavad Gita 4:5 – Shlok (English Letters)
Śrī-bhagavān uvāca |
Bahūni me vyatītāni
janmāni tava cārjuna |
Tāny ahaṁ veda sarvāṇi
na tvaṁ vettha parantapa ||
Explanation
In Bhagavad Gita 4:5, Lord Krishna responds directly to Arjuna’s doubt. He explains that both he and Arjuna have experienced many births. The difference is this: Krishna remembers them all, while Arjuna does not.
This verse introduces a profound spiritual principle — conscious continuity. Ordinary beings pass through cycles of birth and death without awareness of past lives. Krishna, however, possesses full knowledge of them. This distinction prepares the ground for understanding divine incarnation.
Krishna does not dismiss Arjuna’s question. Instead, he expands perspective. Human understanding is limited by memory and time. Divine consciousness is not. The verse begins shifting the conversation from historical logic to metaphysical reality.
For a modern global audience, this verse raises deep philosophical questions. Is consciousness limited to one lifetime? What defines identity across time? Bhagavad Gita 4:5 suggests that awareness is deeper than physical birth.
Real-Life Example
Consider advanced artificial intelligence systems that retain and recall vast historical data, while human memory fades over time. The difference is not existence, but continuity of awareness. Similarly, Krishna highlights that divine awareness is uninterrupted, while human memory is limited.
The verse teaches that understanding reality requires expanding beyond surface perception. What seems impossible may only reflect limited memory.
Frequently Asked Questions
He reveals that both he and Arjuna have had many births, but he remembers them all.
Krishna has full awareness of past births, while Arjuna does not.
Yes. It clearly suggests multiple births across time.
It prepares the understanding of divine incarnation in the next verses.
That consciousness may extend beyond one lifetime.

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